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इसी का नाम दुर्दशा है ममता जी!

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बैजनाथ मिश्र

देश में मानसून की रफ्तार धीमी है. लेकिन चार मई के बाद से बंगाल की खाड़ी में जो सियासी विक्षोभ चक्रवाती रुप धारण कर चुका है, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है. यह चक्रवात प्रलयंकारी बारिश कर रहा है. इसमें बंगाल तो हलकान हो ही गया है, दिल्ली में भी हलचल तेज हो गयी है. भारत के चुनावी इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी राज्य में पंद्रह साल राज करने वाली पार्टी एक पराजय में ही खत्म होने जा रही है. 

 

खबर है कि उसकी नेता ममता बनर्जी और उनके लेफ्टिनेंट यानी भाइपो अभिषेक बनर्जी कांग्रेस से गुहार लगा रहे हैं. वे कह रहे हैं- बचा लीजिए, अपने साथ ले लीजिए. हम आप ही के थे. ममता इसी कांग्रेस को पचा डोबा यानी सड़ा तालाब बता रही थीं. अब उसी में नहाने की अर्जी लगा रही हैं. राहुल गांधी कह रहे हैं- विलय करना हो तो बिना शर्त करो. ममता चाहती हैं कि उन्हें कम से कम राज्य सभा में बैठने का जुगाड़ कर दीजिए. हो सके तो खरगे जी की जगह नेता प्रतिपक्ष बनवा दीजिए ताकि मैं भाजपा को अपना पराक्रम दिखा सकूं अपनी लड़ाकू छवि का र्पुनप्रदर्शन कर सकूं. लेकिन कांग्रेस ऐसा क्यों चाहेगी और चाहे भी तो इंतजाम कैसे होगा? 

 

इसलिए सोनिया गांधी ने संकेत दिया है कि पार्टी का विलय कीजिए और उपाध्यक्ष बन जाइए. ममता पता नहीं यह समझ क्यों नहीं पा रही हैं कि राजनीति में वैसाखियां ली जाती हैं, दी नहीं जाती और वह भी उसे जो धूर्त और अहंकारी हो. कांग्रेस भी जानती है कि ममता के पास पार्टी बची ही नहीं है. विधायकों ने अलग गुट बना लिया है. लोकसभा में अलग गुट के लिए अर्जी दे दी गयी है. राज्य सभा में इस्तीफे हो रहे हैं. पार्टी की स्थानीय इकाइयों से लेकर प्रदेश इकाइयां तक टूट रही हैं. इन्हें सत्ता से मिलने वाला लाभ और गुंडावाहिनी का डर जोड़े हुए था. 

 

सत्ता रही नहीं और गुंडों की अर्द्धनग्न परेड निकल रही है. कोई साड़ियों में छिप रहा है, कोई खाट और चौकी के नीचे. कोई नेपाल बोर्डर से धरा रहा है तो कोई ओडिशा के होटल से. तालाबों और खेतों में छिपाये गये हथियार बरामद हो रहे हैं. एनआईए को एक टीएमसी नेता के यहां से परमाणु रसायन तक मिला है. 

 

तलाशी अभियान में नोटों के पहाड़ मिल रहे हैं. घरों में छिपाकर रखी गयी राहत सामग्री की खेप बरामद हो रही है. निकायों में चुने गये पार्षद, मेयर, अध्यक्ष वगैरह धड़ाधड़ इस्तीफे दे रहे हैं. आये दिन कोई न कोई पूर्व मंत्री, पूर्व विधायक और अभिषेक के डायमंड हार्बर मॉडल का कोई शोहदा गिरफ्तार हो रहा है. कट मनी और भयादोहन करने वाले रोज पीटे जा रहे हैं.

 

बंगाल में सड़े अंडे महंगे हो गये हैं. ये गिरफ्तार किये गये महानुभावों के स्वागत में बरसाये जा रहे हैं. जब काबा मदीना वाली सयोनी घोष साथ छोड़ दें और कल्याण बनर्जी घोषणा कर दें कि अभिषेक और मुझमें किसी एक को चुन लें तो बचेगा कौन? यानी ममता का घमंड चूर हो गया है. वह बेबस, लाचार हैं. वह निहत्था हैं. कोई आंसू पोंछनेवाला नहीं है और इसी का नाम दुर्दशा है. इसके लिए कोई और नहीं, ममता खुद जिम्मेदार हैं. 

 

आये दिन बंगाल के अखबारों की जो सुर्खियां बन रही हैं, वे बयां करती हैं कि बंगाल एक अशासित, निरंकुश प्रदेश बन चुका था या सत्ता के लोभ में बना दिया गया था. अब तो यह भी सवाल उठने लगा है कि यदि इस बार भी ममता जीत जातीं तो क्या बचा-खुचा बंगाल भी बच पाता? बावजूद इसके आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं हैं जो भाजपा की जीत पर मातमी स्वर में कठदलीलें पेश कर रहे हैं. वे यह समझने के लिए तैयार ही नहीं हैं कि ममता अपनी लोकप्रियता और कार्यक्रमों के बूते नहीं जीतती थीं. वे जीतती थीं हत्या, बलात्कार, आगजनी और दहशत के सहारे. इस बार वह सब नहीं हो पाया तो वह हार गयीं. बंगाल बच गया. आम जनता को खुलकर बोलने और अपनी भावनाओं के इजहार का मौका मिल गया. 

 

खैर, अब सवाल यह है कि जब पार्टी में कोई बचेगा ही नहीं, तो विलय की शर्त मानेगा कौन? कहा जा रहा है कि जो सांसद-विधायक अलग होकर नया गुट बना चुके हैं, उन्हें किसी न किसी पार्टी में विलय करना होगा. अन्यथा दो तिहाई या उससे अधिक संख्या होने के बावजूद उनकी सदस्यता चली जाएगी. दलबदल कानून की दसवीं अनुसूची में यही लिखा है. लेकिन अलग हुए सांसद-विधायक खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बता रहे हैं. उनका मानना है कि पार्टी का समानांतर विभाजन हो गया है. यानी वे खुद को असली तृणमूल बता रहे हैं और इसे साबित करने के लिए उनके पास आवश्यक संख्या बल भी है. इसका मतलब यह है कि वे पार्टी के नाम और सिम्बल पर कब्जे की योजना बना रहे हैं. 

 

असली-नकली का फैसला चुनाव आयोग करेगा और चुनाव आयोग संख्या को प्रमाण मानेगा. इस संख्या की गणना विधायकों-सांसदों को मिले वोटों के आनुपातिक योग से होगा. जरूरत पड़ी तो निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों के समर्थन की चिट्ठी भी नत्थी कर दी जाएगी. संभव है, इसमें राज्य सरकार भी अनुकूल या अपेक्षित सहयोग कर दे. तब ममता कैसे कहेंगी कि वह ही असली तृणमूल हैं. 

 

भाजपा ने इतना जरुर कहा है कि वह तृणमूल के सांसदों-विधायकों, कार्यकर्ताओं और स्थानीय प्रतिनिधियों के लिए अपना दरवाजा नहीं खोलेगी. लेकिन उसने यह नहीं कहा है कि वह ममता-अभिषेक को बर्बाद करने में सहयोग नहीं करेगी. महाराष्ट्र में जिस जुगाड़ से शिवसेना-एनसीपी टूटी और एकनाथ शिंदे तथा अजित पवार ने उन पार्टियों के झंडे-डंडे पर कब्जा कर खुद को असली पार्टी का मुखिया साबित कर दिया, वैसा बंगाल में क्यों नहीं हो सकता हैं? शायद यही कारण है कि बागी विधायक-सांसद भाजपा या किसी अन्य दल में विलय की पेशकश नहीं कर रहे हैं. 

 

लोकतंत्र में किसी भी लड़ाई में जीतता वही है जिसके पास बहुमत होता है और ममता पार्टी हो या विधायक दल या फिर संसदीय दल, बहुमत खो चुकी हैं. बागी नेता ममता को ठीक वैसे ही नेता मान रहे हैं जैसे शिवसेना (शिंदे) और एनसीपी (अजित) क्रमशः बाला साहेब ठाकरे और शरद पवार को नेता मानते हुए भी अलग हो चुके हैं. 

 

रही बात सुप्रीम कोर्ट की, तो वह 2023 से महाराष्ट्र मसले की सुनवाई ही कर रहा है. तीन साल बीत चुके हैं. और कितना समय लगेगा, कहना मुश्किल है. यही हाल तृणमूल विवाद में नहीं होगा, यह कौन कह सकता है? 

 

अभी तो खबर यह भी पसर रही है कि शिवसेना उद्धव गुट के सात लोकसभा सदस्य शिंदे के संपर्क में हैं. यह खिचड़ी पक गयी तो वे एक मंत्री पद लेकर वे शिंदे की पार्टी या भाजपा में विलय कर सकते हैं. इसी बीच शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले के समधी देवेंद्र फडनवीस और नितिन गडकरी की कृपा से एमएलसी बन गये हैं. मतलब वहां से भी आमद की गुंजाइश बन रही है. 

 

बहरहाल ममता कांग्रेस में विलय के लिए इसलिए बेचैन हैं कि वे बागियों से पहले अपनी चाल चल दें. दूसरा यह कि वह अपने भतीजे के साथ इतने मामलों में फंस चुकी हैं कि उन्हें महंगे वकीलों की जरूरत पड़ेगी और सरकार नहीं होने से उसकी व्यवस्था कांग्रेस के भरोसे ही हो सकेगी. देखना है कि खेला होबे तो कैसा और होबे ना तो क्यों? लेकिन बंगाल में जहां उनके इशारे पर दिन निकलता था और रात होती थी, वह जमाना लद गया है. अभी तो कालीघाट वाले उनके घर पर "निसदिन बरसत नैन हमारे" का अखंड पाठ चल रहा है. 

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