Priya Darshan
जीतू मुंडा की बहन कालरा मुंडा की मौत जनवरी में हो गई थी. उसके पहले उसने मवेशी बेचे थे. 19,400 रुपये ओडिशा ग्रामीण बैंक में जमा थे. जीतू मुंडा ने कोशिश की कि ये पैसा निकल जाए. बैंक ने कहा, बहन की मौत का कोई सबूत लाओ. जीतू मुंडा समझ नहीं पाया कि यह सबूत क्या होता है, उसके कागज कैसे होते हैं? जीतू के पास एक ही सबूत था- बहन का शव जो कब्र में था. उसने कंकाल हो चुका यह शव कब्र से निकाला. उसे कंधों पर लेकर वह बैंक पहुंच गया.
दुष्यंत कुमार का शेर है- 'माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है, वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है.'
जीतू मुंडा के माथे पर कोई चोट का निशान नहीं मिलेगा. चोट आत्मा पर होगी. इतनी गहरी होगी कि आत्मा सुन्न हो चुकी है. ये एक दिन की नहीं, बरसों से चली आ रही चोट है. हर कदम पर, हर सड़क पर, हर मोड़ पर, हर दुकान में, हर दफ़्तर में, हर बैंक में अपने छोटेपन और परायेपन का एहसास कराए जाने की चोट.
वह आदमी नहीं रह गया है. खुद भी एक लाश हो चुका है. और उसके कांधे पर जो है, वह उसकी बहन की लाश है. लाश नहीं, कंकाल है जिसे उसने कब्र से निकाला है.
क्यों निकाला है? क्योंकि बैंक के मैनेजर को वह यह कंकाल दिखाएगा तो मैनेजर मानेगा कि हां, उसकी बहन मर चुकी है. फिर वह बैंक में जमा बहन के करीब 20,000 रुपये उसे सौंप देगा.
अब तक उसने पैसे सौंप भी दिए होंगे- सबूत जो मिल गया, जो टीवी पर भी आ गया, जिसे देश ने देख लिया. वरना यह भी मुमकिन था कि उससे फिर सबूत मांगे जाते कि यह तुम्हारी बहन ही है. फिर कहा जाता कि तुम तो मुजरिम हो, किसी की लाश बैंक तक ले आए हो.
ऐसा लगता है, वह मैनेजर भी एक लाश ही है- एक जांबी, जिसने सबूत मांगे थे. और देखिए तो यह मुल्क ही जैसे मरता जा रहा है. कबीर ने 600 साल पहले कहा था- साधो ये मुरदों का गांव. इस मुर्दों के गांव में लाशें हंसती-बोलती, खबरें सुनती देखती हैं.
बीस हजार रुपये हममें से कई लोग एक पार्टी में खर्च कर देते हैं. बीस हज़ार रुपये हममें से कई लोग चुटकियों में कमा लेते हैं. ये बीस हजार रुपये लेने के लेकिन एक भाई अपनी बहन की कब्र खोदता है. उसका कंकाल हो चुका शव अपने कंधे पर लेता है.
वेताल विक्रमादित्य की कहानी याद है? विक्रमादित्य के कंधे पर वेताल सवार है. उससे एक मुश्किल सवाल पूछता है. कहता है, जवाब न देने पर उसके सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे. लेकिन यहां वेताल की जगह एक शव है. विक्रमादित्य से कोई सवाल नहीं है. हम सबके सिर के सौ टुकड़े नहीं होंगे. हमारे सिर शर्म से नहीं झुकेंगे. कोई कुछ नहीं कहेगा. सब खबरें देखेंगे, फिर अपने जाने-पहचाने खेल और खोल में घुस जाएंगे.
जीतू क्योंझर का आदिवासी है. वह पेड़ों को पहचानता है, जंगल को पहचानता है, नदियों को पहचानता है, कब्र को पहचानता है, कागज नहीं पहचानता. और आप उससे कागज मांगते हैं. इन दिनों इस देश में लाखों नहीं, करोड़ों लोगों से कागज मांगे जा रहे हैं. जिनके पास कागज नहीं हैं, वे यहां रहने के काबिल नहीं हैं, यहां वोट देने के काबिल नहीं हैं, वे अपनी या अपनों की लाश कांधे पर ढोते रहें.
डिस्क्लेमरः क्योंझर घटना पर लिखी यह टिप्पणी लेखक के सोशल मीडिया वॉल से लिया गया है.
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