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ऑपरेशन सिंदूर के तीन माहः पाक से क्रिकेट, तुर्किए से व्यापारिक रिश्ते बहाल, चीन के साथ तो..

जम्मू-कश्मीर के गलवान घाटी में पर्यटकों की हत्या के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था. ऑपरेशन सिंदूर. फिर सीजफायर. ऑपरेशन सिंदूर के वक्त और उसके बाद क्या-क्या कहा गया था और आज क्या किया जा रहा है, इसे जानना दिलचस्प होगा.
 

जम्मू-कश्मीर के गलवान घाटी में पर्यटकों की हत्या के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था. ऑपरेशन सिंदूर. फिर सीजफायर. ऑपरेशन सिंदूर के वक्त और उसके बाद क्या-क्या कहा गया था और आज क्या किया जा रहा है, इसे जानना दिलचस्प होगा.

 

खून, पानी और क्रिकेट


तब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते. इसके बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान की तरफ जाने वाली नदियों का पानी रोक दिया था. अब पानी भी जा रहा है और भारतीय क्रिकेट टीम को पाकिस्तान के साथ मैच खेलने की इजाजत भी केंद्र सरकार ने दे दी है.


तुर्किए से संबंध


ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्किए ने पाकिस्तान की खुल कर मदद की थी. भारत में तुर्किए के खिलाफ जनभावनाओं का ज्वार खड़ा किया गया. मीडिया ने बड़ी भूमिका निभायी. देशभक्ति की भावना को उबाल देते हुए भारत सरकार ने तुर्किए से व्यापारिक रिश्ते को खत्म कर दिया था. 


अब खबर है कि भारत सरकार ने तुर्किए से व्यापारिक रिश्ते बहाल करने शुरु कर दिये हैं. तुर्किए की कंपनी टर्किस कैरियर, जो कि भारत में हवाई अड्डों पर काम करने वाली सबसे बड़ी कंपनी है, उसे फिर से काम करने की इजाजत देने का फैसला लिया जा रहा है.


चीन के साथ तो..


ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने भी पाकिस्तान की खुल कर मदद की थी. देशभर में चीन के खिलाफ आक्रोश तो था, लेकिन भारत सरकार की तरफ से चीन के खिलाफ कभी कुछ नहीं कहा गया. अब तो हिन्दी-चीनी भाई-भाई जैसे हालात बनाये जा रहे हैं. जो मीडिया पहले मोदी-ट्रंप की मीटिंग से जिनपिंग को दहशत में बता रहा था, वही अब भारत-चीन के रिश्ते से अमेरिका को परेशान बता रहा है. 


दरअसल, गलवान घाटी में आतंकियों द्वारा पर्यटकों की हत्या करने की घटना के बाद भी बहुत सारे विशेषज्ञ और लोग युद्ध के खिलाफ थे. पर, केंद्र में बैठी सरकार राष्ट्रवाद के नाम पर हमेशा इतनी आगे बढ़ जाती है कि बाद में वापसी करने पर असहज स्थिति उत्पन्न होती है. जबकि हर कोई यह जानता है कि युद्ध समस्या हल नहीं है, युद्ध खुद एक समस्या है. 


बहरहाल, बदलती परिस्थितियों में लोगों को यह जानने का अधिकार तो है ही कि भारत सरकार ने इन देशों से क्या आश्वासन लिया है? भविष्य में भी वे भारत के खिलाफ खड़े नहीं होंगे, इसे लेकर क्या बात हुई है? और क्या सच में इन देशों पर भरोसा किया जा सकता है?

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