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Three Of Us Review: वक़्त, रिसते और यादें (तीन जीवन की कहानी)

hree of Us' ऐसी ही एक संवेदनशील और सशक्त कहानी है, जो यादों की धुंध, अधूरे रिश्तों, और खोती पहचान की पड़ताल करती है. फ़िल्म की मुख्य किरदार शैला (शैफाली शाह), एक साधारण मध्यमवर्गीय महिला, जो  अपनी ज़िंदगी के उस मोड़ पर खड़ी है जहां वह शुरुआती डिमेंशिया की स्थिति से जूझ रही है .
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Vaibhav 

 

Lagatar desk : 'Three of Us' ऐसी ही एक संवेदनशील और सशक्त कहानी है, जो यादों की धुंध, अधूरे रिश्तों, और खोती पहचान की पड़ताल करती है. फ़िल्म की मुख्य किरदार शैला (शैफाली शाह), एक साधारण मध्यमवर्गीय महिला, जो  अपनी ज़िंदगी के उस मोड़ पर खड़ी है जहां वह शुरुआती डिमेंशिया की स्थिति से जूझ रही है . बीमारी से पहले, वह अपने अतीत के उन उन गलियों में लौटना चाहती है जहाँ उसकी अधूरी यादें और अनकहे रिश्ते अब भी बसे हैं

 

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वह अपने पति के साथ अपने बचपन के उस कस्बे लौटती है, जहां ज़िंदगी ने कभी चुपचाप करवट ली थी. यह सिर्फ़ एक यात्रा नहीं, बल्कि स्मृतियों में लौटने की एक कोशिश है -और इस यात्रा में साथ हैं तीन लोग: वह खुद, उसका पति, और उसका अतीत

 

 

यह फ़िल्म तेज़ घटनाओं या नाटकीय मोड़ों पर नहीं टिकी है, बल्कि उन छोटे-छोटे क्षणों में जीती है जहां मौन भी बहुत कुछ कहता है. यह एक ऐसी कहानी है जो किसी रफ्तारभरी कहानी की तरह नहीं भागती, बल्कि धीरे-धीरे अपने उद्गम की ओर लौटती है. शैला की यादें भले ही अब धुंधली होने लगी हैं, लेकिन उसके भीतर अब भी वह पुराना शहर, पुराना प्रेम और पुरानी पहचान जीवित है- अपने उसी उद्गम स्थल में सांस लेते हुए.

 

स्मृतियों की टूटी-फूटी गलियों में, जहां बचपन की धूल अब भी महकती है, वहां लौटती है शैफाली शाह की 'शैला'-एक ऐसी स्त्री जो धीरे-धीरे अपनी पहचान खो रही है, पर फिर भी चाहती है कि कुछ बचे हुए टुकड़े समेट ले, कुछ अधूरे गीत दोबारा गुनगुना सके

 

 यह तो एक भाव है, एक धीमी-सी आहट, जो बिना शोर किए सीधे दिल को छू जाती है. हर फ्रेम एक ठहरी हुई सांझ की तरह है, और हर दृश्य जैसे किसी पुरानी डायरी का वो पन्ना जिसे आंसूओं ने भिगो दिया हो, पर उसकी ख़ुशबू अब भी बाकी है. यह फ़िल्म एक अंतर्मन की यात्रा है, जहां संवाद कम हैं और सन्नाटे ज़्यादा बोलते हैं. तीन किरदार हैं, लेकिन तीन आवाज़ें नहीं -बल्कि तीन सन्नाटे

 

यह कहानी किसी क्लाइमेक्स पर नहीं पहुंचती, न ही यह भावनाओं को चीख़-चीख़ कर कहती है. यह तो गिरते पत्तों की तरह धीरे-धीरे बिखरती है - और दर्शक चुपचाप उसे देखता है, जैसे वह किसी अपनी ही भूली हुई दास्तान को जी रहा हो

 

क्यों देखें ये फ़िल्म?

‘Three of Us’ कोई साधारण फ़िल्म नहीं, बल्कि एक एहसास है- एक आत्मिक यात्रा, जो दिल को बस छूती नहीं, बल्कि उसमें कहीं ठहर जाती है.यह उन दर्शकों के लिए है, जो फ़िल्म को सिर्फ़ आंखों से नहीं, मन से महसूस करते हैं

 

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