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वक्त अभी काफी है, लंबा सफर बाकी है…

Neeraj Sisodia `मैं अपने बच्चों को भीख मांगते देख लूंगी लेकिन मैं कभी राजनीति में कदम नहीं रखूंगी`... ये शब्द कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के हैं. बात उन दिनों की है जब भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी और कांग्रेस राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रही थी. उस वक्त सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष के पद को अस्वीकार कर दिया था. वह अपनी बात पर कायम भी रहीं और लंबे समय तक कांग्रेस से दूर रहीं. उनकी दुनिया सिर्फ राहुल और प्रियंका तक ही सिमट कर रह गई थी. उस दौर में लगा था कि कांग्रेस से गांधी परिवार का नाता अब खत्म हो चुका है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सोनिया गांधी ने नेहरू परिवार की राजनीतिक विरासत संभाली. वर्ष 2004 में वह 16 दलीय गठबंधन की नेता चुनी गईं मगर पीएम नहीं बन सकीं. कांग्रेस का राजनीतिक संकट दूर हो चुका था और दस साल तक कांग्रेस ने शासन किया. अब एक बार फिर सोनिया गांधी आक्रामक मोड में नजर आ रही हैं. ऐसा नहीं है कि पिछले आठ वर्षों में वह हमलावर नहीं रहीं. वह लगातार सरकार के खिलाफ हमलावर रहीं, लेकिन उनका विरोध उन ऊंचाइयों को हासिल नहीं कर पा रहा था जो पार्टी में नई जान फूंक सके. हाल ही में कुछ ऐसे राजनीतिक घटनाक्रम हुए जिन्होंने न सिर्फ कांग्रेस वरन् समूचे विपक्ष में नई जान फूंक दी है. इनमें सबसे अहम बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश का एनडीए से नाता तोड़ना और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा हैं. ये दोनों ही घटनाक्रम दम तोड़ते विपक्ष के लिए संजीवनी साबित हो रहे हैं. एक और ध्यान देने योग्य बात सोशल मीडिया पर कांग्रेस की मजबूती है. शायद यही वजह है कि सोनिया गांधी ने लंबे समय बाद आक्रामक रुख अपनाया है और उनके इस रुख को लोगों ने हाथों-हाथ लिया है. उन्होंने मोदी सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि पिछले आठ वर्षों में देश की सत्ता मुट्ठी भर राजनेताओं और व्यापारियों में केंद्रित होकर रह गई है. उनका सीधा निशाना पीएम नरेंद्र मोदी, अमित शाह, अंबानी और अडाणी पर ही था. उन्होंने कहा कि चुनावी लाभ के लिए मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने के लिए सामाजिक सद्भाव के बंधन को तोड़ा जा रहा है. संवैधानिक मूल्यों और सिद्धांतों पर हमला किया जा रहा है. सांप्रदायिकता को लेकर सोनिया गांधी के ये तेवर कार्यकर्ताओं में भी नया उत्साह जगा रहे हैं. सिर्फ सोनिया गांधी ही नहीं, सम्पूर्ण विपक्ष को इसी तेवर की ही जरूरत थी. सोनिया ने उद्योग, रोजगार और जनहित से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर भी सरकार को आईना दिखाया. ईडी और सीबीआई का मुद्दा भी उठाया. कुछ इसी तरह के हमले वर्ष 2014 से पूर्व भाजपा ने भी कांग्रेस पर किए थे. उस वक्त भाजपा ने सीबीआई को सरकार का `मिट्ठू तोता` तक की संज्ञा दे डाली थी. निश्चित तौर पर परिस्थितियां अब 2014 वाली नहीं रहीं. हालांकि, पिछले दिनों हुए राजनीतिक घटनाक्रम और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के आगाज के बाद पूरा देश चुनावी मोड में आ चुका है. बंगाल में ममता बनर्जी मोर्चा संभाले हुए हैं तो दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने भगवा दल को नाकों तले चने चबवाए हैं. यूपी में भी समाजवादियों का उत्साह कम नहीं हुआ है. हाल ही में जिस तरह विधानसभा और भाजपा मुख्यालय के बाहर सपा ने विरोध प्रदर्शन किए उसने भी विपक्ष की मजबूती के संकेत दे दिए हैं. भाजपा का क्रेज अब कम होता जा रहा है, लेकिन सवाल अब भी विकल्प पर आकर अटक जाता है. कांग्रेस ने पहला पड़ाव पार कर लिया है. भाजपा को अब छोटी-छोटी चीजों पर वह हाईप मिलनी बंद हो गई है, जो पहले मिला करती थी. सवालों के घेरे में आने के बाद मीडिया ने भी काफी हद तक खुद को संतुलित करना शुरू कर दिया है. विपक्ष भी अब सुर्खियां बटोरने लगा है. आठ वर्षों के शासन काल में केंद्र सरकार कई मुद्दों पर आमजन के निशाने पर आई है. महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों के साथ ही सबसे अधिक किरकिरी ईडी-सीबीआई की छापेमारी और जोड़-तोड़ की राजनीति को लेकर हो रही है. खास तौर पर ईडी के समक्ष सोनिया गांधी की पेशी ने एक बार फिर कांग्रेस के प्रति सहानुभूति को जन्म दिया है. याद कीजिये वर्ष 1999 का वह दौर जब राजीव गांधी की मौत पर सहानुभूति की लहर चली और मृतप्राय कांग्रेस फिर से जीवंत हो उठी थी. कांग्रेस यह अच्छी तरह जानती है कि हिन्दुस्तानी अवाम बेहद भावुक है. इन्हीं भावनाओं को वोटों में बदलने के लिए राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान गरीब बच्चों के कंधे में हाथ डालकर सेल्फी लेते नजर आ रहे हैं. सत्ता पर काबिज होने से पहले भाजपा ने भी जनता की इन्हीं भावनाओं को जगाया था. कालाधन लाने का सपना, हर साल दो करोड़ रोजगार देने का वादा इन्हीं भावनाओं का ही तो हिस्सा है. सोनिया गांधी द्वारा सरकार पर जो हमले किए जा रहे हैं, उनमें भी ये भावनाएं स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही हैं. आर्थिक असमानता पर सोनिया का प्रहार और मनरेगा की दुहाई भी आम आदमी की भावनाओं को ही दर्शाते हैं. विपक्ष के लगातार हमलों से केंद्र सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी का माहौल तैयार हो रहा है. अन्य विपक्षी दलों ने भी सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं. अगर विपक्ष इस लहर को 2024 तक बरकरार रखने में कामयाब होता है तो भगवा ब्रिगेड के लिए 2024 की राह आसान नहीं होगी. बहरहाल, विपक्ष के पास अभी काफी वक्त है. उसका सफर अभी शुरू हुआ है. अभी लंबा सफर बाकी है. [wpse_comments_template]

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