Ranchi News : नेपाल में आई अचानक बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते आपदा जोखिम को लेकर चिंता बढ़ा दी है. विशेषज्ञों ने कहा है कि हिमालय में केवल आपदा की पूर्व चेतावनी जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि चेतावनी मिलने के बाद समय रहते प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी है. इससे आपदाओं में होने वाले जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
इसी मुद्दे पर सोमवार को सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड (सीयूजे), एनआईटी रायपुर और आईआईटी रुड़की के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में नेपाल में आई अचानक बाढ़ से मिले सबक और हिमालयी क्षेत्र में भविष्य की आपदाओं से निपटने की रणनीतियों पर विशेषज्ञों ने चर्चा की. पीएसजी हिमालयन एक्सपर्ट ग्रुप और आईएसआरएन, नई दिल्ली ने भी कार्यक्रम में सहयोग किया.
वेबिनार के संयोजक सीयूजे के भू-सूचना विज्ञान विभाग के डॉ. चंद्रशेखर द्विवेदी रहे. कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. अरविंद चंद्र पांडे ने की. सीयूजे के कुलपति प्रो. सारंग मेधकर ने हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बदल रही परिस्थितियों को समझने के लिए वैज्ञानिक शोध और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया. आईएसआरएन के सीईओ संतोष गुप्ता ने उद्घाटन संबोधन किया.
नेपाल सरकार के जल और मौसम विज्ञान विभाग के बाढ़ पूर्वानुमान प्रभाग के प्रमुख डॉ. बिनोद पराजुली ने नेपाल में बाढ़ की निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली से जुड़े अनुभव साझा किए. उन्होंने कहा कि आपदा के खतरे को कम करने के लिए सटीक सूचना समय पर लोगों तक पहुंचाना बेहद जरूरी है.
विशेषज्ञों ने बताया कि बाढ़, भूस्खलन, अत्यधिक बारिश, ग्लेशियरों और हिमनदीय झीलों में होने वाले बदलाव जैसे खतरे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. ऐसे में हिमालयी क्षेत्र में अलग-अलग खतरों की निगरानी के बजाय इनके संयुक्त प्रभावों को ध्यान में रखते हुए समग्र निगरानी प्रणाली विकसित करने की जरूरत है.
वेबिनार में उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों, जमीन पर स्थापित निगरानी उपकरणों और मौसम व जल विज्ञान से जुड़े रियल टाइम आंकड़ों को एकीकृत करने पर जोर दिया गया. विशेषज्ञों ने ग्लेशियरों और हिमनदीय झीलों की नियमित निगरानी को भी जरूरी बताया, ताकि संभावित खतरों की पहचान समय रहते की जा सके.
विशेषज्ञों ने कहा कि हिमालय में सड़क, जलविद्युत परियोजनाओं, पर्यटन और अन्य विकास कार्यों की योजना बनाते समय क्षेत्र की भौगोलिक एवं पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखना चाहिए. विकास परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले आपदा जोखिम का वैज्ञानिक आकलन किया जाना जरूरी है.
स्थानीय समुदायों को भी आपदा प्रबंधन की प्रक्रिया में भागीदार बनाने पर जोर दिया गया. विशेषज्ञों ने कहा कि स्थानीय लोगों के अनुभव और पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक जानकारी के साथ जोड़ने से आपदा प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है. पूर्व चेतावनी तभी कारगर होगी, जब वह समय पर गांवों और प्रभावित समुदायों तक पहुंचे और लोग उसके आधार पर तत्काल आवश्यक कदम उठा सकें.
आईआईटी रुड़की के पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रो. संदीप सिंह ने वेबिनार के प्रमुख निष्कर्षों और भविष्य के शोध की दिशा पर प्रकाश डाला. पर्यावरण संरक्षण विशेषज्ञ गोपाल आर्या ने समापन टिप्पणी की, जबकि एनआईटी रायपुर के प्रो. डीसी झारिया ने धन्यवाद ज्ञापन किया.
विशेषज्ञों ने निष्कर्ष के रूप में कहा कि हिमालय को भविष्य की आपदाओं से सुरक्षित बनाने के लिए पूर्व चेतावनी के साथ समय पर कार्रवाई, वैज्ञानिक निगरानी, सुरक्षित विकास और पर्यावरण संरक्षण पर एक साथ काम करना होगा.
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