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शिक्षा, संस्कृति और संघर्ष के प्रतीक डॉ. रामदयाल मुंडा की जयंती आज, RU सहित कई संस्थानों में होंगे कार्यक्रम

Ranchi :   महान शिक्षाविद, भाषाविद, आदिवासी समाज के सशक्त स्वर और पद्मश्री से सम्मानित डॉ. रामदयाल मुंडा की आज 86वीं जयंती मनाई जा रही है. इस अवसर पर रांची विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जायेंगे, जिसकी तैयारी पूरी कर ली गई है.  

 

डॉ. रामदयाल मुंडा की जयंती पर रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय भाषा विभाग में शिक्षाविद और छात्र उनके संघर्ष, बलिदान और समर्पण को याद करेंगे. वहीं मोरहाबादी स्थित डॉ. रामदयाल शोध संस्था में भी मुंडारी साहित्य परिषद रूमबुल के बैनर तले विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिसमें उनकी साहित्यिक और सांस्कृतिक यात्रा पर चर्चा की जाएगी. 

देवड़ी गांव में हुआ था डॉ. रामदयाल मुंडा का जन्म

महान शिक्षाविद डॉ. रामदयाल मुंडा का जन्म 23 अगस्त 1939 को रांची के तमाड़ प्रखंड स्थित देवड़ी गांव में हुआ था. शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में उनका योगदान अतुलनीय रहा है. डॉ. मुंडा ने न सिर्फ अकादमिक जगत में गहरी छाप छोड़ी, बल्कि आदिवासी अस्मिता, भाषा, साहित्य और संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई. 

 

विद्यार्थी से विद्वान तक का सफर

डॉ. मुंडा की प्रारंभिक शिक्षा लूथरेन मिशन स्कूल, अमलेषा, तमाड़ से हुई थी. उन्होंने रांची विश्वविद्यालय से मानव विज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) में एमए और अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय से भाषाविज्ञान में एमए व पीएचडी की उपाधियां प्राप्त कीं. 

 

उनकी शैक्षणिक यात्रा की शुरुआत शिकागो विश्वविद्यालय में रिसर्च असिस्टेंट (1963–70) के रूप में हुई. इसके बाद वे अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा में साउथ एशियन स्टडीज के असिस्टेंट और एसोसिएट प्रोफेसर (1970–81) रहे.

 

भारत लौटने के बाद डॉ. मुंडा ने रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के प्रोफेसर (1981–99) के रूप में कार्य किया. उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया.डॉ रामदयाल मुंडा 1983 में ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी (कैनबरा) और 2001 में टोकियो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज में विजिटिंग प्रोफेसर भी रहेय 

 

संस्कृति, समाज और संघर्ष के पुरोधा

डॉ. मुंडा ने अपने जीवन में आदिवासी समाज की संस्कृति, भाषा और संगीत को संरक्षित कर उसे वैश्विक पहचान दिलाई. वे न केवल एक शैक्षणिक व्यक्तित्व थे, बल्कि जनजातीय अधिकारों और पहचान की आवाज भी थे.

 

उन्होंने पारंपरिक आदिवासी ज्ञान और आधुनिक शिक्षा के बीच एक सार्थक सेतु का निर्माण किया. उन्हें 31 मार्च 2010 में  भारत सरकार द्वारा पद्म श्री और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. 

 

आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा

डॉ. रामदयाल मुंडा का जीवन और कार्य आज भी आदिवासी अस्मिता, भाषा और संस्कृति के संरक्षण की दिशा में प्रेरणा का स्रोत है. वे एक ऐसे व्यक्तित्व थे, जिन्होंने आदिवासी समाज को न केवल शब्द दिए, बल्कि उसे मंच और मंचन भी दिया. आज उनकी जयंती पर पूरा झारखंड और देश उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन कर रहा है. 

 

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