Search

 
 
 

EXCLUSIVE: माओवादियों के सफाये के लिए बने TPC, JJMP और PLFI संगठन! फिर पुलिस ने सभी का किया अंत...

Ranchi News : इन संगठनों को लेकर परिजनों, स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे कि माओवादी प्रभाव को कमजोर करने के लिए टूटे हुए कैडरों को अलग संगठन खड़ा करने में सुरक्षा एजेंसी और पुलिस की मदद मिली. पुरानी मीडिया रिपोर्टों में पुलिस सूत्रों के हवाले से हथियार, पैसे, खुफिया सूचनाओं और ऑपरेशन के दौरान कथित सहयोग तक के दावे दर्ज हैं. हालांकि पुलिस अधिकारियों ने इन आरोपों और ऐसे किसी संबंध से इनकार किया है.
 
प्रतीकात्मक चित्र

Ranchi News : झारखंड के जंगलों में माओवादियों के खिलाफ चली लड़ाई की एक ऐसी कहानी भी है, जो बंदूक की नाल से निकली गोलियों के बीच कहीं दब गई. यह कहानी सिर्फ पुलिस बनाम माओवादी संघर्ष की नहीं, बल्कि उन बागी बंदूकों की भी है, जो कभी माओवादी संगठन से अलग होकर निकलीं और बाद में उसी जंगल में अपनी अलग ताकत बन गईं. TPC, JJMP और PLFI ने अलग-अलग दौर में माओवादियों के खिलाफ मोर्चा खोला, उनके मजबूत इलाकों में घुसे और देखते ही देखते कई क्षेत्रों में समानांतर दबदबा कायम कर लिया.

 

इन संगठनों को लेकर परिजनों, स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे कि माओवादी प्रभाव को कमजोर करने के लिए टूटे हुए कैडरों को अलग संगठन खड़ा करने में सुरक्षा एजेंसी और पुलिस की मदद मिली. पुरानी मीडिया रिपोर्टों में पुलिस सूत्रों के हवाले से हथियार, पैसे, खुफिया सूचनाओं और ऑपरेशन के दौरान कथित सहयोग तक के दावे दर्ज हैं. हालांकि पुलिस अधिकारियों ने इन आरोपों और ऐसे किसी संबंध से इनकार किया है. 

 

लेकिन वर्षों की घटनाओं को एक साथ रखकर देखें तो एक सिलसिला जरूर दिखाई देता है—माओवादी संगठन से टूट, अलग संगठन का गठन, माओवादियों के खिलाफ संघर्ष, अपना प्रभाव और नेटवर्क, फिर वही संगठन सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती और उसके बाद शीर्ष नेतृत्व पर कार्रवाई कर सफाई किया गया.

 

TPC : माओवादी संगठन से टूटकर बनी पहली बड़ी चुनौती

जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2002 में MCC के तत्कालीन प्लाटून कमांडर बृजेश गंझू के पुलिस के संपर्क में आने के बाद घटनाक्रम बदला. एक पुलिस अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया कि बृजेश के पिता के इलाज के दौरान पुलिस उसके करीब पहुंची और बाद में बृजेश ने संगठन छोड़ दिया. इसके बाद पुलिस से मदद मांगने की बात सामने आई.  

 

सूत्र के अनुसार, बृजेश को एक वरिष्ठ अधिकारी से मिलवाया गया, करीब 80 हजार रुपये दिए गए और कुछ अधिकारियों ने राइफलों का इंतजाम किया. दावा यह भी था कि MCC के करीब 140 कैडर बृजेश के साथ चले गए और TPC का शुरुआती ढांचा तैयार हुआ. 

 

रिपोर्ट में एक पुलिस सूत्र ने यह भी दावा किया था कि TPC और पुलिस एक-दूसरे की लोकेशन की जानकारी रखते थे, ताकि ऑपरेशन के दौरान क्रॉस फायरिंग न हो. जरूरत पड़ने पर TPC पुलिस की मदद मांगता था और कुछ मौकों पर TPC ने पुलिस या CRPF को भी जानकारी दी. लेकिन इस मामले में तत्कालीन DGP राजीव कुमार ने पुलिस और TPC के बीच किसी तरह के संबंध से इनकार किया था.

 

उनका कहना था कि TPC माओवादी संगठन से निकला गुट है और पुलिस उसे दूसरे उग्रवादी संगठनों की तरह ही देखती है. यानी TPC के जन्म को लेकर एक तरफ पुलिस सूत्रों के गंभीर दावे थे, तो दूसरी तरफ पुलिस मुख्यालय का आधिकारिक इनकार.

 

इसके बाद TPC ने चतरा से निकलकर पलामू और लातेहार तक अपना प्रभाव बढ़ाया. मार्च 2013 में लावालोंग इलाके में TPC के हमले में 10 माओवादी मारे गए. उस समय संगठन माओवादी प्रभाव के खिलाफ बड़ी सशस्त्र ताकत बन चुका था. 

 

धीरे-धीरे TPC का अपना इलाका, नेटवर्क और प्रभाव बनता गया. उस पर लेवी और अन्य आपराधिक गतिविधियों के आरोप भी लगने लगे. यानी जिस संगठन का शुरुआती चेहरा माओवादी विरोध था, वह आगे चलकर खुद एक अलग सशस्त्र शक्ति बन गया.

 

बृजेश गंझू : 80 हजार से 30 लाख के इनाम तक

TPC की इस कहानी का सबसे बड़ा चेहरा बृजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह भोगता था. जिस नाम के साथ कभी संगठन के गठन और कथित पुलिस संपर्क की कहानी जुड़ी, वही बाद में सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ा वांछित उग्रवादी बन गया.

 

20 सितंबर 2026 को वाराणसी के रामनगर इलाके में UP पुलिस के साथ मुठभेड़ में बृजेश गंझू मारा गया. पुलिस के मुताबिक वह मोटरसाइकिल से जा रहा था और रोकने की कोशिश के दौरान गोलीबारी हुई. उसके खिलाफ करीब 50 मामले होने की जानकारी सामने आई है. झारखंड सरकार ने उसकी गिरफ्तारी की सूचना पर 25 लाख रुपये और NIA ने 5 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था. यानी उसके सिर पर कुल 30 लाख रुपये का इनाम था. 

 

जिस बृजेश के नाम से TPC के शुरुआती दौर की कहानी शुरू होती है, उसी बृजेश की कहानी 30 लाख रुपये के इनामी कमांडर और पुलिस मुठभेड़ में मौत पर जाकर खत्म हुई.

 

JJMP : माओवादियों के खिलाफ खड़ा दूसरा चेहरा

TPC के बाद कहानी JJMP यानी झारखंड जनमुक्ति परिषद तक पहुंचती है. इसके गठन को भी माओवादी संगठन से टूटे कैडरों से जोड़ा गया है. शुरुआती दौर में संजय यादव उर्फ मंजीत का नाम सामने आता है. बाद में पप्पू लोहरा JJMP का प्रमुख चेहरा बन गया.

 

JJMP को लेकर आरोप और भी गंभीर रहे. हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के हवाले से दावा किया गया था कि संजय यादव के अलग होने के बाद उसका संगठन कमजोर पड़ गया था और बाद में खुफिया एजेंसियों ने पूर्व माओवादी कमांडर पप्पू लोहरा को सक्रिय कर संगठन को फिर खड़ा किया और उसे माओवादियों के खिलाफ इस्तेमाल किया.

 

उसी रिपोर्ट में पुलिस और JJMP के कथित गठजोड़ और हथियारों की मदद के आरोप भी सामने आए थे. तत्कालीन ADG एसएन प्रधान ने आरोपों से इनकार करते हुए जांच के लिए तैयार रहने की बात कही थी. 

 

2018 में इस कहानी को एक तस्वीर ने फिर गर्म कर दिया. पप्पू लोहरा और उसके सहयोगी सुशील उरांव की सुरक्षा बलों के जवानों के साथ तस्वीर वायरल हुई. इसे माओवादी विरोधी अभियान के दौरान का बताया गया. तस्वीर के बाद पुलिस और JJMP के कथित संबंधों को लेकर सवाल उठे. पुलिस ने तस्वीर की सत्यता पर सवाल किया और CRPF ने भी इसकी प्रामाणिकता पर संदेह जताया. 

 

फिर समय ने करवट ली

जिस JJMP को कभी माओवादियों के खिलाफ सक्रिय संगठन के रूप में देखा गया था, वही खुद पुलिस के ऑपरेशन में निशाने पर आने लगा. मई 2025 में लातेहार में सुरक्षा बलों के अभियान में JJMP सुप्रीमो पप्पू लोहरा मारा गया. पुलिस के मुताबिक उसके सिर पर 10 लाख रुपये का इनाम था. उसके साथ प्रभात गंझू, जिस पर 5 लाख रुपये का इनाम था, भी मारा गया. मुठभेड़ के बाद पुलिस ने INSAS राइफल समेत अन्य सामान बरामद करने की बात कही. 

 

इसके बाद भी JJMP के खिलाफ अभियान जारी रहा. बाद की एक कार्रवाई में तीन JJMP कैडरों के मारे जाने की पुलिस ने जानकारी दी और पुलिस ने संगठन को लगभग खत्म होने की स्थिति में बताया.  

 

PLFI : माओवादी विरोध से अलग बना सबसे बड़ा नेटवर्क

PLFI की कहानी TPC और JJMP से अलग है, लेकिन इसकी जड़ें भी माओवादी संगठन की टूट से जुड़ती हैं.

PLFI से पहले दिनेश गोप ने अपना नेटवर्क खड़ा किया था. उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उसका शुरुआती संगठन Jharkhand Liberation Tigers यानी JLT के नाम से सक्रिय था. जुलाई 2007 में CPI-Maoist के वरिष्ठ कमांडर मसीह चरण पूर्ति अपने कुछ समर्थकों के साथ माओवादी संगठन से अलग हुआ. इसके बाद दिनेश गोप और मसीह चरण पूर्ति साथ आए और PLFI का ढांचा तैयार हुआ. संगठन ने खुद को CPI-Maoist का विरोधी बताया. 

 

PLFI का विस्तार रांची, खूंटी, सिमडेगा, गुमला, लातेहार, चतरा और पलामू तक हुआ. 2013 के झारखंड पुलिस के एक सर्वे में PLFI के 264 कैडर होने का अनुमान लगाया गया था—रांची में 82, खूंटी में 55, सिमडेगा में 44, चतरा में 44, गुमला में 17, पलामू में 14, लोहरदगा में 5 और लातेहार में 3. 

 

PLFI पर लेवी, हत्या, अपहरण और धमकी समेत कई आपराधिक गतिविधियों के आरोप लगते रहे. बाद के वर्षों में संगठन सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बन गया.

 

फिर आया दिनेश गोप के अंत का दौर

दिनेश गोप पर भी 30 लाख का इनाम था. दिनेश गोप करीब दो दशक तक सुरक्षा एजेंसियों से बचता रहा. 2023 में NIA और झारखंड पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में उसे गिरफ्तार किया गया. उस समय उसके सिर पर कुल 30 लाख रुपये का इनाम था—झारखंड पुलिस की ओर से 25 लाख और NIA की ओर से 5 लाख रुपये. NIA के अनुसार उसके खिलाफ 100 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज थे. 

 

NIA के मुताबिक PLFI से जुड़े मामलों में हत्या, अपहरण, धमकी, रंगदारी और संगठन के लिए धन जुटाने के आरोप शामिल थे. गिरफ्तारी के बाद भी संगठन की गतिविधियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं. बाद के दौर में उसके दूसरे शीर्ष कमांडरों पर कार्रवाई जारी रही.

 

यानी PLFI का सफर भी माओवादी विरोध से निकली एक ताकत से शुरू होकर अपने स्वतंत्र नेटवर्क और प्रभाव तक पहुंचा और फिर सुरक्षा एजेंसियों की लगातार कार्रवाई के दौर में दाखिल हुआ.

तीनों संगठनों की कहानी में सबसे बड़ा सवाल

TPC, JJMP और PLFI को एक ही सांचे में रखना उचित नहीं होगा. तीनों की परिस्थितियां, गठन और नेतृत्व अलग रहे. यह भी उपलब्ध रिकॉर्ड से निर्णायक रूप से कहना उचित नहीं होगा कि पुलिस ने ही तीनों संगठनों को बनाया.

लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता.

परिजनों और स्थानीय लोगों के आरोप कुछ और कहानी बताते हैं. पुरानी मीडिया रिपोर्टों में पुलिस सूत्रों ने कथित मदद और संपर्क की बातें कहीं. कुछ मामलों में सुरक्षा बलों के साथ तस्वीरें सामने आईं. दूसरी तरफ पुलिस ने इन आरोपों को खारिज किया.

इसलिए असली कहानी सिर्फ यह नहीं है कि किसके हाथ में कौन सी बंदूक थी.

असली सवाल यह है कि माओवादी संगठन से टूटे लोगों को अलग-अलग समय में किस तरह ताकत मिली, वे माओवादियों के खिलाफ कितने प्रभावी हुए, उनका अपना नेटवर्क कैसे बना और जब वही संगठन राज्य के लिए चुनौती बन गए तो उनके खिलाफ ऑपरेशन कैसे शुरू हुए.

एक तरफ TPC का बृजेश गंझू है, जिसके शुरुआती दौर को लेकर पुलिस मदद के दावे सामने आए और जिसकी मौत 2026 में 30 लाख के इनाम वाले कमांडर के रूप में हुई.

दूसरी तरफ JJMP का पप्पू लोहरा है, जिसकी सुरक्षा बलों के साथ तस्वीर ने सवाल खड़े किए और जिसकी मौत 2025 में 10 लाख के इनामी कमांडर के रूप में पुलिस अभियान में हुई.

तीसरी तरफ PLFI का दिनेश गोप है, जिसने माओवादी विरोधी नेटवर्क को बड़ा सशस्त्र संगठन बनाया और जिस पर गिरफ्तारी से पहले 30 लाख रुपये का इनाम था.

यानी कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट बंदूक बदलने का नहीं, निशाना बदलने का है.

माओवादी प्रभाव को चुनौती देने वाली बागी ताकतें एक दौर में अपने-अपने इलाकों में मजबूत हुईं. फिर वही संगठन पुलिस की फाइलों में वांछित नाम बने. उनके नेताओं पर लाखों रुपये के इनाम घोषित हुए. उनके खिलाफ अभियान चले और शीर्ष नेतृत्व एक-एक कर गिरफ्तार या मुठभेड़ों में मारा गया.

यही झारखंड के उग्रवाद की उस विवादित परत की कहानी है, जिसमें TPC, JJMP और PLFI सिर्फ तीन संगठन नहीं, बल्कि माओवादी आंदोलन के भीतर हुई टूट, उससे पैदा हुई बागी ताकत और बाद में उन्हीं ताकतों के खिलाफ राज्य की कार्रवाई के तीन अलग-अलग अध्याय हैं.

 

Lagatar Media की यह खबर आपको कैसी लगी. नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय साझा करें.

Comments
Leave a Comment
Follow us on WhatsApp

Lagatar Media

Lagatar Media App
बेहतर न्यूज़ अनुभव
Lagatar Media App
ब्राउज़र में ही