Ranchi News : झारखंडी भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और विकास की मांग को लेकर मंगलवार को राजधानी रांची में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा मार्च निकाला गया. इसमें बड़ी संख्या में आदिवासी समाज और झारखंडी समुदाय के लोग शामिल हुए.
विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों, स्नातकोत्तर विद्यार्थियों और भाषाविदों ने भी मार्च में हिस्सा लिया. राज्य की पांच जनजातीय और चार क्षेत्रीय भाषाओं समेत कुल नौ मान्यता प्राप्त भाषाओं के अस्तित्व को बचाने के लिए लोगों ने आवाज बुलंद की.
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मार्च में शामिल लोग पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में नजर आए. हाथों में तख्तियां लेकर उन्होंने झारखंडी भाषाओं के संरक्षण और विकास की मांग की. अलग-अलग जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर लोगों में खासा उत्साह देखने को मिला. मार्च में पूर्व मंत्री एवं कांग्रेस नेता बंधु तिर्की ने भी भाषाओं के संरक्षण का मुद्दा प्रमुखता से उठाया.
बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड की पहचान यहां की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी हुई है. राज्य गठन की लड़ाई में इन भाषाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इसके बावजूद इनके संरक्षण और संवर्धन के लिए अपेक्षित प्रयास नहीं किए जा रहे हैं. भाषाओं को बचाने के लिए केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं. इसके लिए ठोस नीति बनाने के साथ बजटीय प्रावधान भी करना होगा.
विश्वविद्यालयों में पढ़ाई और शिक्षकों की कमी पर चिंता
मार्च में शामिल लोगों ने कहा कि झारखंड की कई जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई विश्वविद्यालयों में पर्याप्त रूप से नहीं हो रही है. इसका असर नई पीढ़ी पर पड़ रहा है और युवा धीरे-धीरे अपनी मातृभाषाओं से दूर होते जा रहे हैं. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि जब इन भाषाओं की पढ़ाई और रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं होंगे, तो इनके संरक्षण और संवर्धन की कल्पना करना मुश्किल होगा.
आंदोलनकारियों ने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषाओं के शिक्षकों और व्याख्याताओं के नए पद सृजित करने तथा नियमित नियुक्ति की मांग की. उनका कहना था कि पुराने शिक्षकों के सेवानिवृत्त होने के बाद कई भाषाओं का पठन-पाठन प्रभावित हो रहा है.
भाषा नीति में विशेषज्ञों से परामर्श की मांग
आंदोलनकारियों ने राज्य सरकार की भाषा नीतियों पर भी सवाल उठाए. उनका आरोप था कि हाल के दिनों में लागू की गई क्लस्टर आधारित भाषा नीति तैयार करने में स्थानीय भाषाविदों और विशेषज्ञों से पर्याप्त परामर्श नहीं लिया गया. उन्होंने मांग की कि भाषा से संबंधित नीतियां बनाने और लागू करने से पहले संबंधित भाषा समुदायों, शिक्षाविदों और विशेषज्ञों की राय ली जाए.
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि झारखंड का गठन अपनी अलग भाषा, संस्कृति और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर हुआ था. ऐसे में यदि झारखंडी भाषाओं का संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में राज्य अपनी मूल पहचान खो सकता है. भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समाज के इतिहास, परंपरा और पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
पारंपरिक सांस्कृतिक प्रतीकों के संरक्षण पर जोर
मार्च के दौरान भाषाओं के साथ उनसे जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं और प्रतीकों को बचाने की मांग भी उठाई गई. इसमें कुड़ुख का डंडा काटा, मुंडा का ससनदिरी, खोरठा का घोड़ा नाच और नागपुरी के पारंपरिक सांस्कृतिक प्रतीकों के संरक्षण तथा व्यापक प्रचार-प्रसार पर जोर दिया गया. वक्ताओं ने कहा कि भाषा और संस्कृति एक-दूसरे से जुड़ी हैं. इसलिए भाषाओं को बचाने के लिए उनकी सांस्कृतिक विरासत को भी संरक्षित करना जरूरी है.
प्रदर्शनकारियों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें प्रशासनिक कार्यों और आम लोगों से संवाद में स्थानीय भाषाओं के इस्तेमाल की आवश्यकता पर जोर दिया गया था.
अल्बर्ट एक्का चौक से बिरसा मुंडा समाधि स्थल तक निकला मार्च
जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा मार्च अल्बर्ट एक्का चौक से शुरू होकर भगवान बिरसा मुंडा के समाधि स्थल तक पहुंचा. वहां सभा के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ. आंदोलनकारियों ने बताया कि पिछले छह महीनों में दीक्षांत मंडप में आयोजित भाषा सम्मेलन, जनजातीय अनुसंधान संस्थान (टीआरआई) में संवाद और विशेषज्ञों के साथ हुई बैठकों के आधार पर एक विस्तृत सुझाव पत्र तैयार किया गया है.
इस सुझाव पत्र को जल्द ही मुख्यमंत्री को सौंपा जाएगा. आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि झारखंडी भाषाओं का संरक्षण केवल सरकारी अधिकारियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. इसके लिए सरकार, शिक्षाविदों, भाषाविदों और संबंधित समुदायों को मिलकर काम करना होगा. उन्होंने भाषाओं को शिक्षा और रोजगार से जोड़ने के साथ इनके विकास के लिए ठोस बजटीय और नीतिगत व्यवस्था करने की मांग की.
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