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पलायन के भंवरजाल में फंसा झारखंड का आदिवासी इलाका

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Praveen Kumar Ranchi: विश्व आदिवासी दिवस आदिवासी समुदाय के लिए समर्पित है. 9 अगस्त को दुनिया भर में इस मौके पर कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं जिसमें उनके हक की बातें की जाती है. इस मौके पर जल, जंगल और जमीन, आदिवासी समुदाय के सामाजिक, आर्थिक और न्यायिक संरक्षण पर जोर दिया जाता है. पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 1994 में आदिवासी दिवस मनाने का ऐलान किया था. वहीं साल 1982 में मानव अधिकारों के संवर्धन और संरक्षण पर संयुक्त राष्ट्र के कार्यकारी दल ने आदिवासी आबादी पर पहली बैठक की थी. इसे भी पढ़ें-रांची">https://lagatar.in/hearing-on-cm-hemant-case-will-now-be-held-in-eci-on-august-12-know-what-happened-today/">रांची

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झारखंड में पलायन सबसे बड़ी समस्या

झारखंड की बात करें तो आजीविका के सिमटते साधन के बीच में आदिवासी युवाओ को अपने गांव से पलायन करना पड़ रहा है. लाखों की संख्या में आदिवासी युवाक- युवती अपनी पेट की आग बुझाने के लिए राज्य के बाहर जाने को मजबूर हैं. झारखंड से किए जाने वाले पलायन और दूसरे राज्यों में होने वाले पलायन में एक बुनियादी अंतर यह है कि यहां के युवक- युवतियां पलायन कर अपना भूख मिटाते हैं, जबकि अन्य राज्यों से पलायन करने वाले श्रमिक अपने लिए और परिवार के लिये संसाधन जुटाते हैं. जैसे घर बनाने से लेकर दूसरे काम से पैसे कमाते हैं, झारखंड के ग्रामीण अंचल में खास कर आदिवासी और दलित इलाकों में युवा अमूमन मिलते नहीं. ग्रामीणों के मुताबिक युवा काम की तलाश में केरल, कर्नाटक, गोवा समेत महानगरों की ओर रूख करते हैं. यह स्थिति खूंटी जिला के सुदूरवर्ती गांव के कोचांग का हो या गढवा जिला के बरगड़ प्रखंड का या फिर दुमका जिला के आदिवासी गांवों की. सभी जगहों पर कमोबेश एक ही स्थिति है. इसे भी पढ़ें-पृथ्वी">https://lagatar.in/new-super-earth-planet-four-times-bigger-than-earth-found-claims-nasa/">पृथ्वी

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सत्ता में आते ही नहीं लेते सुधि

आदिवासी समुदाय की आवाज उठाने के लिए देश में आदिवासी प्रतिनिधि चुने जाते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही वे आदिवासी समुदाय की सुधि नहीं लेते. जनप्रतिनिधि अपनी जेब भरने में लग जाते हैं. आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए ट्राईबल सब प्लान के तहत प्रतिवर्ष करोड़ों का बजट आवंटित किया जाता है, अधिकांश राशि लैप्स हो जाता है या फिर दूसरे मदों में खर्च कर दिये जाते हैं. झारखंड के कई आदिवासी क्षेत्रों में आज भी ऐसी स्थिति है कि वहां अभी तक न तो सुलभ शौचालय की व्यवस्था है, न ही पक्की सड़क की. पीने के पानी के लाने के लिये लोगों को कोसों दूर जाना पड़ता है. बाजार जाने के लिए अभी भी पगडंडियों का इस्तेमाल करना पड़ता है. प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बनाये गये हैं लेकिन वहां चिकित्सक नहीं होते. आदिवासी दिवस पर आयोजित कार्यक्रमों में इनकी समस्याओं पर गहनता से विचार-विमर्श किया जाना चाहिए. सरकार के पास विकास के लिए पैसे की कमी नहीं है, जरूरत हैं इसे अमलीजामा पहनाने की. [wpse_comments_template]
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