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कुरमी जाति की मांग के विरोध में एकजुट होने लगे आदिवासी

Ranchi: वृहद झारखंड के कुरमी समाज के लोग अपनी मांग को लेकर अनिश्चितकालीन रेल रोको आंदोलन कर रहे हैं. अब यह मांग और आंदोलन बहुत तेज हो चुका है. मगर इसके साथ ही इस मांग के विरोध में आदिवासी नेता और संगठन एकजुट होने लगे हैं. इसको लेकर रविवार रांची के प्रमुख आदिवासी नेताओं और संगठनों की पाही पैलेसे मोरहाबादी में बैठक हुई. बैठक में एक सिरे से कुरमी जाति की एसटी सूची में मांग का खारिज कर दिया गया. इस मांग का विरोध किया गया. इसे भी पढ़ें –लातेहार">https://lagatar.in/latehar-social-media-will-be-closely-monitored-in-durga-puja-sdo/">लातेहार

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आंदोलन तेज करने का फैसला

बैठक में अब इस मांग के विरोध में आंदोलन तेज करने का निर्णय लिया गया. इसकी शुरूआत 27 सितंबर को रांची के मोरहाबादी मैदान में एक दिवसीय उपवास से शुरू होगा. बैठक में कहा गया कि अगर यह आंदोलन नहीं रुका तो वे लोग भी सड़क पर उतर सकते हैं. आंदोलन तेज करने के लिए आदिवासी अधिकार रक्षा मंच का भी गठन किया गया. आदिवासी विकास परिषद की प्रदेश अध्यक्ष व पूर्व मंत्री गीताश्री उरांव ने कहा कि केवल मांग करने से कुछ नहीं होगा. यह शोध का विषय है. आदिवासियों की नस्ल और कुरमियों की नस्ल में काफी अतंर है. हम जहां रूढ़ीवादी परंपरा को मानते हैं जबकि कुरमी सनातनी को मानता है. पर्व-त्योहार, शादी-विवाह में हम आदिवासी की अपनी रूढ़ीवादी परंपरा से संचालित होती है. यहां तो कोल तेली भी एसटी सूची में शामिल होने की मांग करते हैं. केवल साथ रह लेने से कोई आदिवासी नहीं हो सकता है.

कुरमी समाज की मांग गलत-अजय टोप्पो

आदिवासी नेता लक्ष्मी नारायण मुंडा ने कहा कि इस लोकतांत्रिक देश में किसी को भी कोई भी मांग करने का अधिकार है. मगर कौन क्या मांग रहा है. यह समझने की जरूरत है. ये यही लोग हैं जो पेसा के तहत पंचायत राज में आदिवासियों के आरक्षण का विरोध करते हैं. कभी ये लोग पिछड़ा वर्ग आरक्षण को लेकर आंदोलन करते हैं. कभी ये लोग शिवा जी के वंशज कहलाने पर गर्व महसूस करते हैं. ये लोग एसटी की पात्रता कैसे रखेंगे. आदिवासी नेता अजय टोप्पो ने कहा कि कुरमी समाज की मांग पूरी तरह से गलत है. पहले ही टीआरई ने इनकी मांग खारिज कर दिया है. ये लोग पात्रता रखते ही नहीं हैं. केवल राजनीतिक लाभ लेने और आदिवासियों की हकमारी के लिए यह मांग कर रहे हैं. अगर इन्हें एसटी का दर्जा दे दिया गया तो आदिवासी विलुप्त ही हो जाएंगे. इसे भी पढ़ें –जमशेदपुर">https://lagatar.in/jamshedpur-jnac-removed-illegal-banner-poster-from-main-road-in-sakchi/">जमशेदपुर

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राजनीति लाभ के लिए मांग- पीसी मुर्मू

आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के अध्यक्ष पीसी मुर्मू ने कहा कि आखिरकार इन्हें 1950 में आदिवासी सूची से हटाया गया होगा तो सोच-समझ और विचार करके ही किया गया होगा. जनजातीय शोध संस्थान भी इनकी मांग को खारिज कर चुके हैं. इसके बावजूद केवल राजनीति लाभ के लिए यह मांग की जा रही है. यह मांग कभी पूरी होने वाली नहीं है. जय आदिवासी विकास परिषद की प्रदेश अध्यक्ष निरंजना हेरेंज टोप्पो ने कहा कि अर्जुन मुंडा ने 2004 में राजनीतिक फायदे के लिए इन्हें एसटी सूची में शामिल करने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेज तो दिया. मगर यह होना नहीं था. यह बात अर्जुन मुंडा भी जानते थे. टीआरआई ने अपना सुझाव और मंतव्य केंद्र को उसी समय भेज दिया. इसके बावजूद इसको लेकर मांग करना कहीं न कहीं राजनीति से प्रेरित है. [wpse_comments_template]

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