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जिस SIR को ज्ञानेश कुमार शुद्धिकरण बता रहे थे, उससे तीन में से दो चुनाव आयुक्त असहमत रहे

चुनाव आयोग ने आरोपों को नकारा, कहा- सारे फैसले सर्वसम्मति से लिए गए

Lagatar Desk

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस की उस खबर पर अपना पक्ष जारी किया, जिसमें दो चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) द्वारा SIR (मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण) और अन्य फैसलों पर आपत्तियां जताए जाने का दावा किया गया था. आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि सारे फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं. विचारों में मतभेद होना किसी भी संस्था के लिए सामान्य बात है.

आयोग की तरफ़ से आगे कहा गया है कि वह संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत काम करता है और अपने संवैधानिक कर्तव्यों को पूरी ईमानदारी से निभाने के लिए प्रतिबद्ध है. ECINet जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म सख्त डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत चलते हैं. 

मुख्य बिंदु

  • सभी फैसले (SIR समेत) पिछले एक साल में पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं.
  • लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-पड़ताल सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं. ये अंतिम फैसले से पहले चर्चा का हिस्सा माने जाते हैं, औपचारिक असहमति नहीं.
  • विचारों का मतभेद किसी भी संस्था में सामान्य बात है. न सिर्फ तीनों आयुक्त, बल्कि आयोग के हर अधिकारी को सुझाव देने का अधिकार है ताकि चुनावी प्रक्रिया बेहतर हो.
  • कुछ चुनिंदा आंतरिक नोट्स को उजागर करना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता. आयोग ने कई फैसले लिए, निर्देश जारी किए और करीब 40 नई पहल शुरू की हैं. 
  • आयोग ने हाल में बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में प्रमुख चुनावों तथा इस अवधि के दौरान विभिन्न निर्वाचन संबंधी कार्यों का सफलतापूर्वक संचालन किया है. इन कार्यों में व्यापक प्रशासनिक एवं परिचालन तंत्र के साथ-साथ आयोग द्वारा अनेक अनुमोदन एवं निर्देश जारी किए गए.

मोदी के चहेते ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग में अपनी मनमर्जी चला रहे हैंः कांग्रेस

Lagatar Desk: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ हुए खुलासों के बाद देश की विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने कहा कि मोदी के चेहेते ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग में अपनी मनमर्जी चला रहे हैं.  इस बारे में खुद दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने में 14 बार शिकायत की है. यह साफ हो गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को महत्वपूर्ण फैसलों की जानकारी नहीं दी जाती थी. उनसे सलाह नहीं ली जाती. उनसे बिना पूछे या बताए हुए फैसले लिए जा रहे हैं.

पार्टी ने आगे कहा है कि जो 14 शिकायतें हैं, उनमें एसआइआर, फॉर्म-6 में बदलाव, नए वोटर का रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट से नाम हटाना और जोड़ना, नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपील, वोटर लिस्ट की सुरक्षा और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर है. इन शिकायतों से साफ होता है कि तीन सदस्यों वाले चुनाव आयोग में सिर्फ ज्ञानेश कुमार की ही चल रही है.

कांग्रेस पार्टी ने आगे कहा कि ज्ञानेश अपने बॉस मोदी की तरह तानाशाही कर रहे हैं और मोदी को खुश करने के लिए 'वोट चोरी' का काम कर रहे हैं. हम पहले भी कहते आए हैं कि मोदी ने चुनाव आयोग पर कब्जा कर रखा है. ज्ञानेश कुमार मोदी के हाथ की कठपुतली हैं. मोदी और ज्ञानेश ने मिलकर देश के लोकतंत्र को बहुत नुकसान पहुंचाया है. लेकिन ये बात याद रखना कि वक्त आने पर सबका हिसाब होगा, जवाबदेही तय होगी. इस अपराध की सजा जरूर मिलेगी.

वोट चोरी का खेल कर रहा है चुनाव आयोगः दीपिका पांडेय सिंह

मंत्री दीपिका पांडेय सिंह की फ़ाइल फोटो.

Ranchi: झारखंड सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा है कि चुनाव आयोग की सह पर वोट चोरी का खेल चल रहा है. देश में संगठित तरीके से वोट चोरी का खेल चल रहा है. राहुल गांधी बहुत पहले से यह कहते रहे हैं, आज वही सच साबित हो रहा है. आज हुए खुलासे ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. जब चुनाव आयोग के अंदर से ही फैसलों पर 14 बार आप्तित दर्ज हुई तो फिर देश के मतदाताओं से सच्चाई क्यों छिपाई जा रही है?

उन्होंने कहा कि वोट चोरी सिर्फ चुनावी घोटाला नहीं है. यह संविधान और लोकतंत्र के साथ किया गया गंभीर विश्वासघात है. 10 महीनों में 14 आपत्तियां. वोटर रजिस्ट्रेशन, वोटरों का नाम काटना, वोटरों को शामिल करना और इलेक्ट्रॉल रोल डाटा बेस को केंद्रीयकृत करना, सबकुछ सवालों के घेरे में है. उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब चुनाव आयोग के भीतर ही वोटर लिस्ट और उसके कंट्रोल को लेकर इतनी गंभीर आपत्तियां उठ रही हों, तो यह सिर्फ प्रशासनिक विवाद नहीं है.  यह लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ है. मोदी सरकार और CEC ज्ञानेश कुमार के दौर में अगर चुनावी व्यवस्था पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं, तो देश चुप नहीं बैठेगा.

जानना जरुरी है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने क्या-क्या आपत्तियां की! क्या विपक्ष का वोट चोरी के आरोपों में दम है!

Lagatar Desk

अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस ने की 23 सितंबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट ने देश भर में हंगामा खड़ा कर दिया है. साथ ही देश के चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को कटघरे में खड़ा कर दिया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि आयोग के दो दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की. उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में लिए गए कई फैसलों और निर्देशों को अनाधिकृत (unauthorised) और गैर-कानूनी (illegal) बताया.

ये आपत्तियां मुख्य रूप से स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने-काटने, नए वोटर पंजीकरण और आईटी सिस्टम से जुड़ी थीं. ऐसे में विपक्ष का उस आरोप में दम नजर आने लगा है, जिसमें वह वोट चोरी का आरोप आयोग पर लगा रहा है. 

मुख्य आपत्तियां और गैर-कानूनी बताए गए काम

पहली- फॉर्म 6 में बिना प्रक्रिया के बदलाव

जुलाई 2026 में नए वोटर रजिस्ट्रेशन वाले फॉर्म-6 में एक नया सवाल जोड़ा गया कि आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछले SIR में दर्ज थे या नहीं. दो आयुक्तों की लिखित सलाह के खिलाफ यह बदलाव किया गया. सुखबीर सिंह संधू ने 13 अगस्त 2026 को रिकॉर्ड पर लिखा कि यह कदम “अनाधिकृत और गैरकानूनी” है और इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए. सरकार की अनुमति के बिना नियमों में संशोधन और गजट नोटिफिकेशन के बिना यह बदलाव किया गया.

दूसरी- वोटर लिस्ट पर स्थानीय अधिकारियों का अधिकार छीनना

ECINet सॉफ्टवेयर के जरिए वोटर डेटाबेस का नियंत्रण दिल्ली के आईटी विभाग (DG IT) के पास केंद्रित कर दिया गया. नतीजतन, कानूनन जिम्मेदार Electoral Registration Officer (ERO), DEO और CEO को पूरी पहुंच और फैसला लेने की आजादी नहीं दी गई. दोनों आयुक्तों ने लिखित में कहा है कि यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और Registration of Electors Rules, 1960 का उल्लंघन है, क्योंकि वोटर लिस्ट तैयार करने और नाम जोड़ने-काटने का अधिकार स्थानीय अधिकारियों का है, न कि दिल्ली के आईटी अधिकारी का. DG (IT) को यह अधिकार सीमित करने का कानूनी अधिकार नहीं है. तीसरी- आयोग की सर्वसम्मति/बहुमत की प्रक्रिया का उल्लंघन

तीसरी- बहुमत के बदले मनमाना फैसला

2023 के कानून (धारा 18) के अनुसार आयोग के काम जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होने चाहिए, मतभेद होने पर बहुमत से फैसला होना चाहिए. संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत तीनों आयुक्त बराबर हैं, मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले फैसला नहीं ले सकते. संधू और जोशी ने शिकायत की कि कई निर्देश और अपीलें आयोग के नाम पर उनकी जानकारी के बिना जारी की गईं. उन्होंने कहा कि ऐसे संचार में “आयोग” की मंजूरी नहीं थी.

चौथी- आईटी सिस्टम और काम के बंटवारे में बदलाव

जुलाई 2026 में एक अधिकारी (मनीष गर्ग) ने आयोग की सहमति के बिना आईटी विभाग की निगरानी का कामकाज बदला. दोनों आयुक्तों ने 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखकर इसे कानून का “स्पष्ट उल्लंघन” (clear violation) बताया और कार्रवाई की मांग की. बाद में उन्होंने खुद उस आदेश को रद्द कर दिया.

पांचवीं- अन्य प्रक्रिया संबंधी आपत्तियां

  • पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों द्वारा शामिल किए गए वोटरों के खिलाफ आयोग की तरफ से अपीलें दायर करने पर सवाल (किसने और किस अधिकार से दायर कीं).
  • गोवा में सॉफ्टवेयर की कमी के कारण योग्य वोटरों के नाम दर्ज न हो पाना. 
  • नए आईटी मॉड्यूल बिना आयोग को बताए बनाना. -
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त डॉ विवेक जोशी व डॉ सुखबीर सिंह संधु.

जिस विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार “शुद्धिकरण” बताते रहे थे, उससे तीन में से दो चुनाव आयुक्त असहमत थे. तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने अपनी असहमति लिखित रुप से जतायी थी. इसके बाद भी एसआइआर जारी रखा गया. पश्चिम बंगाल में 27 लाख लोग मतदान से वंचित रह गए. देश के 13 करोड़ से अधिक लोग रोज परेशान हो रहे हैं. नोटिस मिल रहा है, लोग लाईन में लग रहे हैं.

Lagatar Desk

जिस विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार “शुद्धिकरण” बताते रहे थे, उससे तीन में से दो चुनाव आयुक्त असहमत थे. तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने अपनी असहमति लिखित रुप से जतायी थी. इसके बाद भी एसआइआर जारी रखा गया. पश्चिम बंगाल में 27 लाख लोग मतदान से वंचित रह गए. देश के 13 करोड़ से अधिक लोग रोज परेशान हो रहे हैं. नोटिस मिल रहा है, लोग लाईन में लग रहे हैं.

 

अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले 10 महीनों में 14 बार दो चुनाव आयुक्तों डॉ विवेक जोशी और डॉ सुखबीर सिंह संधु ने प्रक्रिया के तरीकों पर आपत्ति दर्ज की थी. जिसे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने नजरअंदाज कर दिया. उनका कहना है कि जो भी फैसले लिये गए, उनकी जानकारी के बिना लिए गए और आदेश जारी किए गए.

 

इस खुलासे के बाद एसआइआर की प्रक्रिया को लेकर विपक्ष एक बार फिर से हमलावर हो गया है. विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि ज्ञानेश कुमार ख़ास पार्टी के हिसाब से एसआइआर प्रक्रिया चला रहे हैं, ताकि इसका लाभ भाजपा को मिले. विपक्ष पश्चिम बंगाल का उदाहरण भी दे रहा है, जहां 27 लाख लोगों को वोट करने से वंचित कर दिया गया.

 

उल्लेखनीय है कि अब तक आम लोग परेशान हो रहे थे. लेकिन हालिया घटनाओं में दिल्ली के मुख्यमंत्री से लेकर देश भर में बड़े पदों पर काम कर चुके, सेना में काम कर चुके लोगों व कई नामचीन लोगों को भी एसआइआर के लिए नोटिस जारी किया गया है. इसके बाद से एसआइआर की प्रक्रिया को लेकर सवाल बड़े हो गए हैं.

 

आम लोग भी सवाल उठा रहे हैं साल 2003 में भी एसआइआर हुआ था, तब किसी को पता तक नहीं चला था. क्योंकि तब वह एक सामान्य प्रक्रिया के तहत हुआ था. इस बार सत्ताधारी दल को लाभ पहुंचाने के लिए प्रक्रिया को कठिन बनाया गया. इस कारण इतनी समस्याएं सामने आ रही हैं. करोड़ों लोग परेशान हो रहे हैं और चुनाव आयोग इसे शुद्धिकरण बता रहा है. 

 

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