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शिबू सोरेन और भाजपा के रिश्तों को समझना

Lagatar Desk :   शिबू सोरेन, जिन्हें 'दिशोम गुरु' के नाम से जाना जाता है, झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक और झारखंड की राजनीति के एक केंद्रीय चेहरा हैं. उनकी राजनीतिक यात्रा और झामुमो का इतिहास झारखंड के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य को समझने के लिए महत्वपूर्ण है. झामुमो और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच संबंधों का इतिहास जटिल और उतार-चढ़ाव भरा रहा है, जिसमें सहयोग, टकराव और वैचारिक मतभेदों का मिश्रण देखने को मिलता है.

 

शिबू सोरेन और झामुमो की स्थापना

शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को झारखंड (तत्कालीन बिहार) के हजारीबाग जिले के नेमरा गांव (अब रामगढ़ जिला) में एक आदिवासी परिवार में हुआ था. उनके पिता, सोबरन सोरेन की 1957 में हत्या ने उनके जीवन को बदल दिया. इस घटना ने उन्हें सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों की ओर प्रेरित किया. 1972 में, शिबू सोरेन ने विनोद बिहारी महतो और अन्य नेताओं के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की.

 

झामुमो का मुख्य उद्देश्य आदिवासियों और मूलवासियों के अधिकारों की रक्षा करना, जल-जंगल-जमीन के संरक्षण को बढ़ावा देना और महाजनी प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ाई लड़ना था. झामुमो ने शुरू में एक सामाजिक आंदोलन के रूप में काम किया, जो आदिवासियों और दलितों के हितों के लिए संघर्ष करता था. शिबू सोरेन ने 'धान काटो आंदोलन' और 'जंगल बचाओ आंदोलन' जैसे अभियानों के माध्यम से आदिवासियों को उनकी जमीन पर अधिकार दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 2000 में झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद, झामुमो एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा. 

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वैचारिक मतभेद और प्रारंभिक टकराव

झामुमो और भाजपा के बीच वैचारिक आधार पर शुरू से ही मतभेद रहे हैं. झामुमो का आधार आदिवासी और क्षेत्रीय अस्मिता पर केंद्रित है, जो सामाजिक न्याय, आदिवासी अधिकारों और झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को प्राथमिकता देता है. दूसरी ओर, भाजपा एक राष्ट्रीय पार्टी है, जो हिंदुत्व और आर्थिक उदारीकरण जैसे मुद्दों पर जोर देती है. यह वैचारिक अंतर दोनों दलों के बीच टकराव का कारण बना.

 

झारखंड के गठन के बाद, भाजपा ने राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए आदिवासी समुदायों के बीच पैठ बनाने की कोशिश की. हालांकि, शिबू सोरेन और झामुमो की मजबूत क्षेत्रीय पकड़ ने भाजपा के लिए यह काम चुनौतीपूर्ण बना दिया. उदाहरण के लिए, 2005 के जामा विधानसभा चुनाव में, भाजपा के सुनील सोरेन ने झामुमो के गढ़ को तोड़ते हुए शिबू सोरेन के बेटे दुर्गा सोरेन को हराया, जो दोनों दलों के बीच प्रतिस्पर्धा का प्रतीक था.

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सहयोग के दौर

वैचारिक मतभेदों के बावजूद, झामुमो और भाजपा ने कुछ मौकों पर गठबंधन और सत्ता साझेदारी के लिए एक-दूसरे का साथ दिया. 2000 के दशक में, जब झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता चरम पर थी, दोनों दलों ने मिलकर सरकार बनाने की कोशिश की. 2009 में शिबू सोरेन ने भाजपा के समर्थन से झारखंड में सरकार बनाई, हालांकि यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं टिका. यह गठबंधन अधिकतर अवसरवादी था, क्योंकि दोनों दलों को सत्ता में बने रहने के लिए एक-दूसरे की जरूरत थी.

 

इस गठबंधन का एक उदाहरण 2006-2008 का दौर है, जब शिबू सोरेन केंद्र में यूपीए सरकार में कोयला मंत्री थे. इस दौरान, झामुमो ने यूपीए के साथ गठबंधन किया, लेकिन भाजपा के साथ भी राज्य स्तर पर समझौते किए. हालांकि, यह सहयोग स्थायी नहीं रहा, क्योंकि दोनों दलों के कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच विश्वास की कमी थी.

 

तनाव और प्रतिस्पर्धा

हाल के वर्षों में, झामुमो और भाजपा के बीच संबंध और अधिक तनावपूर्ण हो गए हैं. 2022 में, झामुमो ने दावा किया कि भाजपा के 16 विधायक पार्टी छोड़ने की तैयारी में हैं, जिसे भाजपा ने 'हास्यास्पद' करार दिया. इसके जवाब में, भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि झामुमो के 21 विधायकों ने बगावत कर दी है और पार्टी 'खत्म होने की कगार पर' है. यह बयानबाजी दोनों दलों के बीच गहरे अविश्वास को दर्शाती है.

 

2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में, झामुमो के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन ने 56 सीटों के साथ शानदार जीत हासिल की, जबकि भाजपा गठबंधन को केवल 24 सीटें मिलीं. इस जीत ने झामुमो की स्थिति को और मजबूत किया और भाजपा के लिए चुनौती बढ़ा दी.

 

चंपाई सोरेन और सीता सोरेन

झामुमो और भाजपा के बीच संबंधों को समझने में कुछ प्रमुख नेताओं के दल-बदल की घटनाएं भी महत्वपूर्ण हैं. चंपाई सोरेन, जिन्हें 'कोल्हान टाइगर' के नाम से जाना जाता है, दशकों तक शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन के करीबी सहयोगी रहे. मुख्यमंत्री तक बनें.

 

हालांकि, 2024 में उन्होंने झामुमो छोड़कर भाजपा में शामिल होने का फैसला किया. यह कदम झामुमो के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि चंपाई ने आदिवासी समुदायों में मजबूत आधार रखा था.

 

इसी तरह, शिबू सोरेन की बड़ी बहू, सीता सोरेन ने भी 2024 में झामुमो छोड़कर भाजपा में शामिल होने का फैसला किया. हालांकि उनकी वापसी की अफवाहें भी थीं, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि वे भाजपा में ही रहेंगी, क्योंकि उन्हें वहां सम्मान मिला है.

 

इन दल-बदल की घटनाओं ने झामुमो और भाजपा के बीच तनाव को और बढ़ाया. यह दर्शाता है कि दोनों दलों के बीच व्यक्तिगत और राजनीतिक संबंधों में गहरी खटास है.

 

शिबू सोरेन का स्वास्थ्य और नेतृत्व में बदलाव

2025 में, शिबू सोरेन के स्वास्थ्य ने भी झामुमो की राजनीति को प्रभावित किया. स्वास्थ्य कारणों के कारण अप्रैल 2025 में, शिबू सोरेन ने 38 वर्षों तक झामुमो के अध्यक्ष रहने के बाद पार्टी की कमान अपने बेटे हेमंत सोरेन को सौंप दी. इस बदलाव ने झामुमो को एक नए युग में प्रवेश कराया. 

 

इस तरह इतिहास बताता है कि शिबू सोरेन, झामुमो और भाजपा के बीच संबंध एक जटिल और गतिशील कहानी रहा है. जहां एक ओर दोनों दलों ने अवसरवादी गठबंधनों के माध्यम से सत्ता साझा की, वहीं वैचारिक मतभेद और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं ने उनके बीच तनाव को बनाए रखा.

 

शिबू सोरेन की विरासत, जो आदिवासी अधिकारों और झारखंड की अस्मिता से जुड़ी है, झामुमो को एक मजबूत क्षेत्रीय शक्ति बनाती है. दूसरी ओर, भाजपा की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं और आदिवासी वोटों पर पकड़ बनाने की कोशिशें दोनों दलों के बीच प्रतिस्पर्धा को और गहरा करती है.

 

हाल के घटनाक्रम, जैसे चंपाई सोरेन और सीता सोरेन का भाजपा में शामिल होना, साथ ही झामुमो की 2024 की चुनावी जीत, यह दर्शाते हैं कि यह रिश्ता भविष्य में और अधिक जटिल हो सकता है. कुल मिलाकर, झामुमो और भाजपा के बीच संबंध सहयोग और संघर्ष का एक अनूठा मिश्रण हैं, जो झारखंड की राजनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है.

 

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