
श्रीनिवास
किसी को लगता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) नामक संस्था अब भी ‘जीवित’ है, सुरक्षा परिषद भी? अमेरिका-इजराइल की बेखौफ रंगदारी के आगे जिन देशों की बोलती बंद है या जो उनके साथ खड़े हैं, (स्वार्थ से या भय से) ऐसे देशों की कोई संस्था विश्व शांति के लिए काम करने का दावा करे, यह हास्यास्पद ही है.
पहले भी यह संस्था परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों (या महाबलियों, सीधी भाषा में कहें तो वैश्विक गुंडों) की मर्जी के अनुकूल फैसला लेने को एक लाचार संस्था थी. उनको ‘वीटो’ जैसा ब्रहमास्त्र मिला हुआ है. महासभा में या सुरक्षा परिषद में उनके खिलाफ कोई फैसला हो भी जाये, तो वह लागू नहीं हो सकता. पांच से कोई भी अपने वीटो का इस्तेमाल कर उस फैसले को कूड़ेदान में डाल सकता था, सकता है. फिर भी शायद एक लिहाज बचा हुआ था. महाशक्ति देश भी विश्व जनमत का थोड़ा खयाल रखते थे.
कहा जा सकता है कि संप्रभु देशों का एक अनुशासन में बंध कर चलना कठिन है, खास कर देशों के बीच आर्थिक व सामरिक विषमता के साथ उनके निजी हित को देखते हुए. इसलिए ‘बड़े’ देशों को कुछ विशेषाधिकार दिये बिना ऐसी संस्था का चलना लगभग नामुमकिन होता, होगा. मगर कथित बड़े देश यदि विश्व शांति के उद्देश्य और दो देशों के विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने के मकसद से गठित इस संस्था का इस्तेमाल अपने हितों को पूरा करने के लिए ही करने लगें, अपने मित्र (या अनुगामी) देशों का गिरोह बना कर प्रतिद्वंद्वी देशों को सबक सिखाने के लिए करने लगें, तो ऐसी संस्था का कोई मतलब भी क्या रह जायेगा! और यही हुआ है.
ईरान पर हुए अकारण हमले के बाद मेरी जानकारी में यूएनओ की महासभा की बैठक नहीं हुई. यानी इसकी जरूरत भी नहीं समझी गयी. मगर उसकी सबसे ताकतवर संस्था सुरक्षा परिषद ने बुधवार 12 मार्च को खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों की निंदा करने वाला प्रस्ताव पास किया. प्रस्ताव में ईरान से खाड़ी देशों पर हमले बंद करने की मांग की गयी. यह मांग करते हुए परिषद को जरा भी लज्जा नहीं आनी चाहिए थी? उसने अमेरिका और इजराइल से अपील कि वे कम से कम ईरान के नागरिक ठिकानों पर हमला नहीं करें? लड़कियों के स्कूल पर हमला हुआ, एक सौ से अधिक बच्चियां मारी गयीं और आप ईरान से अपील कर रहे हैं! नेतन्याहू धमकी दे रहा है कि बेरूत को ‘गाजा’ बना देंगे- यह भी सुनाई नहीं पड़ा!
सुरक्षा परिषद के 15 में से 13 सदस्य देशों ने गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल (ओजीसी) द्वारा स्पांसर किये गये प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया, जिसे संयुक्त राष्ट्र के 135 अन्य सदस्य देशों ने भी को-स्पांसर किया था. सिर्फ दो देशों-रूस और चीन- ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया! रूस और चीन के भी अपने स्वार्थ होंगे. अमेरिका से सीधे पंगा लेने से बचने की नीति भी हो सकती है, फिर भी ईरान की एकतरफा निंदा से अलग रह कर दोनों ने समझदारी का, शायद साहस की भी, परिचय दिया है. एक अलग स्टैंड तो लिया!
वोटिंग के बाद परिषद में बोलते हुए, यूएनओ में रूस के राजदूत, वासिली नेबेंजिया ने कहा कि उनके देश ने ड्राफ्ट प्रस्ताव पर वोटिंग से खुद को दूर रखा, क्योंकि यह बहुत ज्यादा असंतुलित था और “इंटरनेशनल शांति और सुरक्षा को पूरा करने” का मकसद पूरा नहीं करेगा.
चीन के राजदूत झांग जून ने कहा कि इस लड़ाई की “न तो कोई लेजिटिमेसी है और न ही कोई कानूनी आधार और अमेरिका और इजराइल को इलाके की स्थिति को और बिगड़ने से रोकने के लिए अपने हमले बंद कर देने चाहिए. ईरान के राजदूत अमीर-सईद इरावानी ने प्रस्ताव पास होने पर स्वाभाविक ही गहरा अफसोस जताया.
इरावानी का यह कहना गलत नहीं है कि ‘यह सिक्योरिटी काउंसिल और इंटरनेशनल कम्युनिटी के लिए बहुत दुख का दिन है. आज का प्रस्ताव पास होना काउंसिल की क्रेडिबिलिटी के लिए एक बड़ा झटका है और इसके रिकॉर्ड पर एक हमेशा रहने वाला दाग है.’ उन्होंने अमेरिका पर “ईरानी लोगों के खिलाफ बर्बर युद्ध और ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की हत्या समेत लड़ाई शुरू करने का आरोप लगाया. इरावानी ने बताया कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के हमले के बाद से 1,348 से ज्यादा आम लोग मारे गये हैं और 17,000 से ज्यादा घायल हुए हैं, जिसमें ‘मिनाब’ में 170 स्कूली लड़कियों का नरसंहार” भी शामिल है.
ये बातें अब अन्य स्रोतों से भी पुष्ट हो चुकी हैं. ‘पेंटागन’ ने भी स्कूल पर हुए हमले को स्वीकार कर लिया है. यूएनओ से ही संबद्ध संस्था है- यूनेस्को. उसका लोगो या आप्त वाक्य ही है- Delivery for people in crisis. वह ऐसे काम करती भी रही है. यूनेस्को द्वारा युद्ध के कारण लेबनान से विस्थापित हुए लोगों को मानवीय आधार पर सहायता पहुंचाने का प्रयास करने का दावा (या दिखावा) करने की खबर आती रहती है. इस बीच उसने भी ईरान से खाड़ी देशों के असैनिक ठिकानों पर हमला न करने की अपील की है! बीते कोई दो वर्ष से ‘गाजा’ और पूरे फिलस्तीन के बाशिंदों को जिस तरह मारा जाता रहा है, बम गिरा कर, बुलडोजर और टैंकों से जिस तरह उनका आशियाना तबाह किया जाता रहा है, भोजन, पानी और दवा के बिना तड़प-तड़प कर मौत के मुंह में धकेला जा रहा है और उन तक अंतरराष्ट्रीय सहायता पहुंचने में भी रुकावटें डाली जाती रही हैं. यूनेस्को और यूएनओ ने क्या किया? और आज ईरान में क्या कर रहा है? यदि वह ट्रंप की मंजूरी के बिना कुछ भी नहीं कर सकते, तो उसके होने का क्या औचित्य है!
इन हालातों में यूएनओ नामक मरी हुई बंदरी को जिंदा मान कर छाती से चिपकाये रखने का नाटक अब बंद होना चाहिए. बेहतर होगा कि आखिरी बार महासभा की बैठक बुला कर इसके कथित संप्रभु सदस्य देश सर्वसम्मति से महाबली डोनाल्ड ट्रंप को दुनिया का सम्राट घोषित कर अपनी दुकान बंद करने की घोषणा कर दें. साथ में कहें- विश्व शांति का मसीहा आ गया है, अब किसी लुंज-पुंज संस्था की जरूरत नहीं रही.
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