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हजारीबाग: वैश्वीकरण के दौर में विदेशी भाषा का प्रयोग जरूरी : प्रो. योगेंद्र

Hazaribagh: विनोबा भावे विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर इतिहास विभाग में विभागाध्यक्ष डॉ. विकास कुमार की अध्यक्षता में विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया. इसमें अरविंद महिला कॉलेज, पटना से विशेष आमंत्रित प्रो. डॉ. योगेंद्र कुमार ने प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय की भारतीय शिक्षा के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में शिक्षा गुरुकुल में दी जाती थी, समाज द्वारा स्वापोषित एवं सबके लिए एक समान शिक्षा की व्यवस्था थी. गुरुकुल शहर, नगर एवं अरण्य में स्थापित होते थे एवं बच्चों का प्रवेश द्वार पंडित से वार्तालाप के बाद होता था. बच्चों को पढ़ने से पहले उनका उपनयन संस्कार होता था. बच्चों को गुरुजी के साथ अरण्य में रहना पड़ता था तथा बच्चों को जीवन से संबंधित सारा व्यवहारिक ज्ञान दिया जाता था. जहां 10000 छात्र और 1000 शिक्षक होते थे उन्हें विश्वविद्यालय कहा जता था. उस समय प्रमुख विश्वविद्यालयों में नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला, वल्लभी विश्वविद्यालय थे. कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय में देश-विदेश से लोग आकर धर्म, चिकित्सा, दर्शन इत्यादि की शिक्षा ग्रहण करते थे. आज की तरह उस समय भी विश्वविद्यालय में कुलपति होते थे, जिन्हें निदेशक /अधिष्ठाता कहा जाता था. उस समय उपाधी आज की तरह परीक्षा लेकर नहीं बल्कि एकेडमिक काउंसिल द्वारा साक्षात्कार लेकर दिया जाता था. उस समय विस्तृत पाठ्यक्रम हुआ करते थे. पुराणों में 64 प्रकार के कोर्स का वर्णन मिलता है. बच्चों को सर्वप्रथम अक्षर ज्ञान, व्याकरण इत्यादि की शिक्षा दी जाती थी उसके बाद उनके ज्ञान के आधार पर स्कूल या संकाय में प्रवेश लेते थे. प्राचीन काल में शिक्षक दो प्रकार के होते थे - श्रमजीवी जो शिक्षण कार्य के बदले कुछ मेहनताना लेते थे, दूसरे समाजसेवी जो समाज कल्याण हेतु शिक्षण कार्य करवाते थे. प्राचीन शिक्षा व्यवस्था पूर्णतः स्वायत थी. उस समय के शासकों द्वारा कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाता था, बल्कि उनके द्वारा आर्थिक सहायता प्रदान की जाती थी. प्राचीन कालीन शिक्षा का उद्देश्य मुक्ति था अर्थात सुख दुख के चक्र से मुक्ति.

आधुनिक शिक्षा की शुरुआत 18वीं सदी में हुई

प्रो. कुमार ने बताया कि आधुनिक शिक्षा की शुरुआत 18वीं सदी में अंग्रेजों के आगमन के पश्चात हुई. जब तक केंद्रीय सत्ता मजबूत थी अंग्रेज तब तक विनम्र बने रहे, परंतु जैसे ही उन्हें अवसर मिला शासन और शोषण करना प्रारंभ कर दिया. उन्होंने शिक्षा का पश्चात्यकरण किया, उनके द्वारा अंग्रेजी शिक्षा पर बल दिया जाने लगा, उनके द्वारा एक ऐसा वर्ग तैयार करने का प्रयास किया जाने लगा जो रंग और रूप से भारतीय हो परंतु व्यवहार, विचार से अंग्रेज. इसके लिए उनके द्वारा 1813 में शिक्षा पर 1 लाख, 1833 में 10 लाख तथा 1857 में तीनों प्रेसीडेंसी बंगाल, मद्रास, बंबई में विश्वविद्यालय की स्थापना अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु की गई. उस समय पाश्चात्य शिक्षा का समर्थन राजा राममोहन राय एवं अन्य कई भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा किया गया था. अंग्रेजों द्वारा अंग्रेजी को बढ़ावा देने के लिए कंपनी में नौकरी के लिए अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया गया. परिणाम स्वरूप प्राचीन शिक्षण पद्धति का स्थान पाश्चात्य शिक्षण पद्धति ने ले लिया. प्रो. कुमार ने कहा कि स्वतंत्रता के पश्चात आधुनिक शिक्षा के विकास हेतु कई आयोग का गठन किया गया राधाकृष्णन आयोग, मुदालियर आयोग, कोठारी आयोग के द्वारा प्राचीन शिक्षण पद्धति की सिफारिश की गई परंतु भारत की तात्कालिक ब्यूरोक्रेट्स के द्वारा इसको लागू नहीं करवाया गया. इसके कई कारण थे जिसमें यहां की नौकरशाही अंग्रेजी माध्यम पर आधारित होना, बाजार वाद वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर आधारित होना इत्यादि. उन्होंने कहा कि अगर शिक्षा में मातृभाषा को महत्व नहीं दिया गया तो भारत विश्व गुरु नहीं बन सकता है वर्तमान समय में एनईपी 2020 में इस पर जोर दिया गया है जिसमें प्रारंभिक शिक्षा को मातृभाषा में पढ़ाने की बात कही गई है, परंतु यह भी बताया गया कि वैश्वीकरण के दौर में विदेशी भाषा का प्रयोग भी जरूरी है. इस विशेष व्याख्यान में इस विभाग के वरीय प्राध्यापक डॉ. अशोक कुमार मंडल, डॉ. हितेंद्र अनुपम उपस्थित थे. विभाग के रिसर्च स्कॉलर भैरव यादव, प्रभात कुमार साहा, प्रीति कुमारी, सुमित कुमार, अमरेंद्र कुमार आजाद, पुरुषोत्तम द्विवेदी, सनी मेहता, मोनिका बक्शी, प्रियंका एवं द्वितीय समसत्र 2023-25 के छात्र-छात्राएं उपस्थित थे, जिनके द्वारा भारतीय शिक्षा से संबंधित प्रश्नों को पूछ कर अपनी जिज्ञासाओं को पूर्ण किया गया. इसे भी पढ़ें - कृष्ण">https://lagatar.in/shahi-eidgah-dispute-case-eligible-for-hearing/">कृष्ण

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