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नक्सलियों के गांधी कहे जाने वाले विजय आर्य ने दिखाया था दमखम, लालू यादव भी लोकप्रियता से घबरा उठे थे

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Saurav Singh Ranchi: एनआईए की छापेमारी के बाद नक्सलियों के गांधी कहे जाने वाले विजय आर्य एक बार फिर से चर्चा में हैं. विजय आर्य को झारखण्ड-बिहार में माओवादियों को मजबूत करने की जिम्मेवारी मिली थी. संगठन विस्तार के दौरान उन्हें बीते 12 अप्रैल 2022 को बिहार के रोहतास से पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. तब से वे पटना के बेउर जेल में बंद हैं. इससे पहले उन्हें 30 अप्रैल 2011 को उस समय गिरफ्तार किया गया था जब वो अपने सेंट्रल कमेटी के साथी सुब्रह्रणयम, पुलेंदु शेखर मुखर्जी के साथ कटिहार के बारसोई पहुंचे थे. अपने स्थानीय साथियों की लापरवाही से तीनों पुलिस के हत्थे चढ़ गये थे. उस समय विजय आर्य पर बिहार, झारखंड, ओड़िशा, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, पंजाब में नक्सली गतिविधियों के कुल 14 प्राथमिकी दर्ज थे. कानूनी लड़ाई के बाद विजय आर्य बीते 13 सितंबर 2018 को रिहा हो गये थे. उन्हें बिहार के सासाराम जेल से रिहा किया गया था. इसे भी पढ़ें-महंगाई">https://lagatar.in/congresss-ruckus-against-inflation-jharkhand-congress-leaders-are-taking-part-enthusiastically/">महंगाई

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नक्सली के टॉप कमांडर विजय आर्य

साल 2018 में जेल से रिहा होने के बाद टॉप नक्सली कमांडर में से एक विजय आर्या को झारखंड और बिहार के कई इलाको में संगठन को मजबूत करने की जिम्मेवारी सौंपी गई थी. जानकारी के मुताबिक माओवादियों के चाल्हो सब जोन को एक्टिवेट करने की जिम्मेदारी उसे सौंपी गई थी. चाल्हो जोन में गया, औरंगाबाद और पलामू के इलाके को रखा जाता है. इस जोन में माओवादी 2005 के बाद बेहद कमजोर हो गए थे. विजय आर्या बिहार के गया के रहने वाले हैं. साल 2018-19 में माओवादियो की बड़ी बैठक छकरबंधा में हुई थी. इस बैठक में एक करोड़ के इनामी माओवादी प्रशांत बोस ने भाग लिया था. इसी बैठक में विजय आर्य को कई इलाकों में माओवादियों को मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

जगदेव प्रसाद स्कूल के विद्यार्थी रहे हैं विजय आर्य

यादव जाति से संबंध रखने वाले विजय आर्य की पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीतिक रही है. उनके पिता रामजतन सिंह यादव समाजवादी थे. पहले डॉ. राम मनोहर लोहिया के अनुयायी थे. बाद में जब जगदेव प्रसाद ने नारा दिया- धन, धरती और राजपाठ में नब्बे भाग हमारा है... तो इस नारे से प्रभावित होकर रामजतन यादव जगदेव बाबू के आंदोलन में सक्रिय हो गये. वे दो बार गुरूआ विधानसभा क्षेत्र से चुनाव भी लड़े थे. एक बार तो नक्सलियों ने उन्हें धमकी दी थी कि यदि वे चुनाव लड़ेंगे तब उनका हाथ काट लिया जाएगा, लेकिन रामजतन यादव ने चुनौती स्वीकार करते हुए निर्दलीय चुनाव लड़ा था. उन्होंने कहा था कि जिसे जो करना है कर ले, वे चुनाव लड़ेंगे.

विजय आर्य लेक्चरर रह चुके हैं 

रामजतन यादव की सात संतानों (चार बेटियों और तीन बेटे) में चौथे विजय कुमार आर्य का जन्म पचास के दशक में गया जिले के कोच प्रखंड स्थित करमा गांव में हुआ था. जगदेव प्रसाद द्वारा गया जिले के परैया में स्थापित अशोक हाई स्कूल से उन्होंने 10वीं परीक्षा पास की. बाद में उन्होंने अनुग्रह मेमोरियल कॉलेज, गया से अर्थशास्त्र में पीजी किया. जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने गया जिले के लारी कॉलेज में बतौर लेक्चरर नौकरी की थी. इसे भी पढ़ें-रांची:">https://lagatar.in/ranchi-cid-will-now-investigate-the-badgai-land-scam-hemant-soren-instructed/">रांची:

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माओवादियों के शीर्ष बुद्धिजीवियों में एक हैं विजय आर्य

दारा सिंह की हत्या और अपने पिता की मौत के बाद विजय आर्य ने नब्बे के दशक में एमसीसी के ओपेन फ्रंट जन सुरक्षा संघर्ष मंच बनाकर व्यवस्था को चुनौती देना शुरू कर दिया था. गया, जहानाबाद, डालमिया नगर, धनबाद, रांची, हजारीबाग समेत कई शहरों में बड़ी-बड़ी जनसभाओं को संबोधित कर तत्कालीन बिहार सरकार को परेशानी में डाल चुके थे. विजय आर्य के संघर्ष से घबराई तत्कालीन बिहार सरकार ने जन सुरक्षा संघर्ष मंच को प्रतिबंधित कर दिया था. उनके सैकड़ों समर्थक जेल में डाल दिये गये. तब एक दौर ऐसा भी आया जब लगा कि अब विजय आर्य की राजनीति समाप्त हो जाएगी, लेकिन जिद्दी स्वभाव के विजय आर्य सरकार को धोखे में डालकर जन प्रतिरोध संघर्ष मंच बनाया और तीखा संघर्ष शुरू किया. माओवादियों ने स्ट्रगलिंग फोरम फॉर पीपुल्स रेसिस्टेंस बनाकर राष्ट्रीय पहचान बनायी. विजय आर्य इसके राष्ट्रीय कौंसिल के सह-संयोजक बनाये गये. अंतरराष्ट्रीय माओवादी संगठन रीम और कम्पोसा के निर्माण में उन्होंने महती भूमिका निभाई.

विजय आर्य की लोकप्रियता से घबराये थे लालू यादव

विजय आर्य की सक्रियता जहां एक ओर केंद्र सरकार को सकते में डाल रही थी, वहीं एमसीसी इस ताकतवर नेता के संघर्षों का कायल होने लगा. लालू प्रसाद उन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. साल 1997 में हुए लोकसभा चुनाव में बिहार के 54 सीटों में से केवल 7 सीटों पर उन्हें जीत मिली थी. इसकी बड़ी वजह लालू यादव वामपंथी संगठनों को मानते थे. तब विजय कुमार आर्य की लोकप्रियता शिखर पर थी. हालत यह थी कि लालू प्रसाद ने कहना शुरू कर दिया था कि असली नक्सली हम ही हैं. विजय आर्य के समर्थकों को बरगलाने के ख्याल से लालू प्रसाद ने एक चाल चली. गया जिले के अधिकांश चुनावी सभाओं ने लालू प्रसाद यादव ने कहना शुरू कर दिया था कि विजय आर्य और वर्तमान सरकार की नीतियां गरीबों के लिये काम कर रही है. विजय आर्य भी हमारे साथ चुनावी सभा को संबोधित करेंगे. इसके लिये लालू शेरघाटी, परैया की सभा के बाद गुरारू आये. दोनों की यहां मुलाकात हुई. लेकिन विजय कुमार आर्य ने लालू प्रसाद के साथ मंच साझा नहीं किया. उन दिनों दोनों के मुलाकात की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनी थी. [wpse_comments_template]
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