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तो ऐसी सियासत पर थूकने को जी चाहता है

Anand kumar

इस बार कोरोना कहर बन कर टूटा है. अफ्रीका, ब्राजील और ब्रिटेन का स्ट्रेन लेकर लौटा यह वायरस अब और ताकतवर है. संक्रमण से पीड़ितों की संख्या हर दिन लगातार बढ़ रही है. 13 मार्च के दिन भारत में कुल 12194 नये कोरोना केस आये थे. 12 अप्रैल को 161736 केस दर्ज हुए. अभी जो रफ्तार है, उसके हिसाब से यह आंकड़ा जल्दी ही दो लाख तक पहुंच जायेगा.

झारखंड की बात करें, तो 29 मार्च से 11 अप्रैल के बीच 14 दिनों में 16449 नये मामले आये थे. 12 अप्रैल को अकेले रांची में 787 और नये मामले मिले. मरनेवालों की तादाद बढ़ती जा रही है. रांची, जमशेदपुर जैसे बड़े शहरों में सरकारी और निजी अस्पतालों में बैठने तक की जगह नहीं है. लोग भरती होने के इंतजार में अस्पतालों के गेट, स्ट्रेचरों और एंबुलेसों में दम तोड़ रहे हैं. शवदाह गृहों और कब्रिस्तानों में लाशों को जलाने और दफनाने में सुबह से रात हो जा रही है. ऐसा भयावह नजारा तो पिछले साल भी नहीं था. पिछली बार सरकारों ने कम समय और अनुभव नहीं होने के बावजूद कोरोना से लड़ने के लिए व्यापक इंतजाम किये थे. क्वारेंटीन सेंटर, आइसोलेशन सेंटर, कंटेनमेंट जोन, राज्य और जिलों की सीमाओं पर चेकिंग जैसे कदम उठाये गये थे. इलाज के लिए अस्पतालों के अलावा स्कूलों और अन्य जगहों पर व्यापक इंतजाम किये गये थे.

आपात स्थिति होने के बावजूद ऑक्सीजन, वेंटीलेटर और दवाओं की बहुत ज्यादा कमी नहीं होने दी गयी थी. केंद्र हो या राज्य, सभी इस बीमारी को लेकर संजीदा थे. लोगों में भी डर था. लोग खुद भी एहतियात बरत रहे थे. दूरी बना रहे थे. तरह-तरह का काढ़ा और योग जैसे तरह-तरह के नुस्खे आजमा रहे थे. और इस तरह बिना किसी पूर्व अनुभव के सरकार और नागरिकों ने कोरोना की पहली लहर का सामना किया. केंद्र और राज्य सरकारों ने इसका क्रेडिट लेने और अपनी पीठ थपथपाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी.

इसी तरह वैक्सीन को लेकर खूब वाहवाही लूटी गयी. सबसे जल्दी और सबसे तेज वैक्सीन देने के दावे किये गये. अब हालात यह है कि देश में वैक्सीन की भारी कमी है. पहली और दूसरी डोज के बीच पहले 28 दिनों का अंतर था, जिसे अब बढ़ा कर 40 से 56 दिन कर दिया गया है. कई राज्यों में वैक्सीन उपलब्ध नहीं है. लोग टीकाकरण केंद्रों से लौट रहे हैं. कोरोना के गंभीर मामलों में इस्तेमाल की जानेवाली रेमडेसिविर दवा कई राज्यों में उपलब्ध नहीं है.

लेकिन केंद्र सरकार को इन सब की कोई चिंता नहीं है. उसका पूरा फोकस चुनावों पर है. वह भी विशेष रूप से बंगाल और असम चुनाव पर. देश के मीडिया में इन्हीं चुनावों की चर्चा है. अमित शाह बंगाल में लगातार रोड शो कर रहे हैं. प्रधानमंत्री हर चरण के चुनाव के दिन उससे सटे किसी इलाके में चुनावी सभा में दीदी ओ दीदी का गीत गाते हैं. वैसे चुनाव तो तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी में भी हो रहे हैं, लेकिन वहां भाजपा के लिए कोई खास संभावना है नहीं, सो राष्ट्रीय मीडिया की चुनावी चर्चा से ये राज्य बाहर हैं. एक तरफ केंद्र सरकार कोरोना की दूसरी लहर पर काबू पाने में विफल साबित हुई है, तो दूसरी ओर केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी की चुनावी रैलियों में लाखों की भीड़ जुटाई जा रही है.

झारखंड में भी एक सीट पर उपचुनाव हो रहा है. बाबा वैद्यनाथ की नगरी देवघर से 40 किमी दूर यह इलाका पहले बंगाली रईसों की कोठियों के कारण मशहूर था. हालांकि इस उपचुनाव में जीत-हार से न तो सत्तारूढ़ जेएमएम को फर्क पड़नेवाला है, न ही विपक्षी दल भाजपा को. लेकिन दोनों ही ने इसे मूंछ की लड़ाई बना दिया है. मुख्यमंत्री समेत लगभग पूरी सरकार फिलहाल मधुपुर में बैठी है. बीजेपी के प्रदेश स्तर के सभी बड़े नेता भी वहीं जमे हैं. कोरोना विस्फोट के बीच चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा हिंदू-मुसलमान है. जाहिर है, भारत हो या झारखंड, सरकारों, राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को जान से ज्यादा चुनाव की चिंता है.

जिस राज्य में रोजाना 2000 से ज्यादा लोग संक्रमित हो रहे हो. प्राइवेट अस्पतालों में पैरवी के बाद भी बेड नहीं मिलते हों और सरकारी अस्पतालों में भर्ती होने के इंतजार में मरीज दम तोड़ रहे हों, वैसे हालात में सरकार और विपक्ष एक विधानसभा सीट की बेमकसद लड़ाई में उलझा है. इन सबके बीच रांची के सदर अस्पताल में परिजन डॉक्टर-डॉक्टर पुकारते रह जाते हैं, और एक मरीज तड़प-तड़प कर मर जाता है... ऐसी सियासत पर थूकने को जी चाहता है.

 

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