आदिवासी संस्कृति धर्म, परंपरा व धुमकुड़िया से ही बचा सकते
आदिवासी समाज अन्य धर्मों की नकल कर बाजार केंद्रीत होता जा रहा है. आज उरांव समाज में धार्मिक डंडा कटना चिह्न को तरह-तरह से बनाकर मनगढ़ंत व्याख्या किया जा रहा है. बाजार की मांग के अनुरूप अदि चाला अयंग या सरना मां का चित्र, फोटो फ्रेम और मूर्ति बनाये, बेचे और खरीदे जा रहे हैं. आज प्रकृति को अंगिकार करने की जरूरत है. तभी समाज को बचाया जा सकता है. आदिवासी संस्कृति धर्म, परंपरा धुमकुड़िया से ही बचा सकते हैं.आदिवासी समाज का धार्मिक अगुवा पाहन होता है
सरना समिति से संजय कुजूर ने कहा कि उरांव समाज में जो मान्यताएं होती हैं वह संस्कार से होता है. धर्म को निभाने के लिए आचरण, लेग नियम को निभाया जाता है. आदिवासी समाज का धार्मिक अगुवा पाहन होता है. आज पाहन अपना कर्तव्य सही ढंग से नहीं निभा रहा है. वर्तमान पीढ़ी समाज को सुधार नहीं पाया तो आने वाले पीढ़ी को बचाना मुश्किल हो जाएगा. समाज के लिए जो निर्धारित होता है. वह सामाजिक रुप से होना चाहिए. आदिवासी समाज के युवाओं को निस्वार्थ भाव से प्रशिक्षण करने की जरूरत है. आकृति को छोड़कर प्रकृति के साथ चलने की जरूरत है. तभी आदिवासी समाज को मजबूत औऱ सशक्त बनाया जा सकता है. इसे भी पढ़ें - सरकार">https://lagatar.in/the-government-pocketed-rs-2812-crore-of-the-treasury-remained-silent-when-asked-for-an-accounting-babulal/">सरकारने ट्रेजरी के 2,812 करोड़ अपनी झोली में डाले, हिसाब मांगने पर साधी चुप्पी : बाबूलाल [wpse_comments_template]
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