
बैजनाथ मिश्र
करीब साल भर पहले मुंबई हाईकोर्ट ने एक घुसपैठिये की जमानत याचिका खारिज करते हुए कह दिया था कि आधार कार्ड, वोटर आईडी और पैन कार्ड नागरिकता के प्रामाणिक दस्तावेज नहीं हैं. एसआईआर के मुद्दे पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट कह ही चुका है कि आधार कार्ड के आधार पर किसी की नागरिकता साबित नहीं की जा सकती. यानी आधार कार्ड पहचान, निवास स्थान (पता), बैंक में खाता खुलवाने से लेकर पैन कार्ड से सम्बद्धता, मोबाइल फोन तथा नंबर लेने और गैस कनेक्शन लेने में तो काम आ सकता है, लेकिन वह हमारी नागरिकता का प्रमाण नहीं है. ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलाने, वोटर आईडी वोट डालने भर के लिए हैं.
अब भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि उसके द्वारा जारी किया गया पासपोर्ट महज अंतरराष्ट्रीय यात्राओं के लिए है, उसके आधार पर किसी की नागरिकता साबित नहीं की जा सकती है.
गौरतलब यह है कि पासपोर्ट अधिनियम के अनुसार पासपोर्ट उन्हें ही मिलेंगे, जो भारत के नागरिक होंगे, लेकिन नयी घोषणा से यह अधिनियम बेमतलब हो गया है. सवाल यह है कि क्या अब पासपोर्ट के लिए पुलिस की जांच अनिवार्य नहीं रहेगी? यह भी कि यदि कोई गजटेड ऑफिसर किसी को भी पासपोर्ट देने के लिए अनुशंसा कर दे तो क्या उसके विरूद्ध कार्रवाई नहीं होगी?
बहरहाल 2019 में केंद्र सरकार की ओर से एक प्रेस नोट जारी कर कहा गया था कि जन्म स्थान और जन्म तिथि के बारे में कोई दस्तावेज पेश कर नागरिकता साबित की जा सकती है. लेकिन क्या नागरिकता का निर्णय प्रेस विज्ञप्तियों और बयानों के आधार पर हो सकता है? इसके लिए सरकार को एक सर्कुलर जारी करना होगा और बताना होगा कि जन्म स्थल तथा जन्म तिथि के प्रमाणन के लिए कौन-कौन से कागजात या दस्तावेज मान्य होंगे. लेकिन ऐसा लगता है कि इस बारे में सरकार भी उलझन में है. यही कारण है कि नागरिक पंजीयन का घोषित अभियान अभी अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो पाया है.
तथ्य यह है कि जन्म पंजीयन की अनिवार्यता 1970 के बाद शुरु हुई थी. और उसके कार्यान्वयन की निगरानी के लिए भी कोई त्रुटिहीन व्यवस्था नहीं हुई. अगर स्कूलों में दर्ज जन्म तिथि को ही गवाह बनाया जाये तो हमें अपनी साक्षरता दर पर भी गौर करना होगा. मतलब यह कि जिन लोगों ने स्कूल-कॉलेज का मुंह नहीं देखा है, उनकी जन्म तिथि का निर्धारण शैक्षणिक प्रमाण पत्रों के आधार पर कैसे होगा?
जहां तक जमीन जायदाद के मालिकाना हक के आधार पर नागरिकता सिद्ध करने की बात है, तब भी भूमिहीनों की नागरिकता का सवाल मुंह बाय खड़ा रहेगा. 1955 के नागरिकता कानून के मुताबिक 1950 के बाद भारत में पैदा हुआ कोई भी व्यक्ति भारत का नागरिक है. तो क्या उससे पहले जन्मा कोई भारतीय देश का नागरिक नहीं हो सकता है? यदि हां, तब तो लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी से लेकर मल्लिकार्जुन खरगे तक भारत के नागरिक नहीं हो सकते.
दरअसल यह भ्रांति है. नागरिकता पैतृक परम्परा से आगे बढ़ती है. यानी यदि किसी के माता-पिता भारतीय थे और वह भारत में पैदा हुआ है तो वह भारत का नागरिक होगा. लेकिन सवाल यह है कि यह नागरिकता सिद्ध करने के लिए हमारे हाथ में कोई कार्ड या दस्तावेज क्यों नहीं है जिसे मानने से अदालतें भी इनकार न कर सकें? सरकार एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स) की चर्चा तो करती है और चुनावी फसल काटने के लिए उसे उछालती भी है, लेकिन हकीकत यह है कि नागरिकता के मानकों को लेकर वह भ्रम में है. इसीलिए उसके घुसपैठिया विरोधी अभियान की डुगडुगी कोई खास उम्मीद पैदा नहीं करती है.
विरोधाभासी स्थिति यह है कि अदालतें और निर्वाचन आयोग जिन कागजात को नागरिकता का प्रमाण नहीं मानते हैं, उन्हीं के आधार पर हमारे नेता विधानमंडलों तथा संसद के चुनावों में पर्चा भरते हैं और उन्हें भारत का नागरिक मान लिया जाता है या मानना पड़ता है, क्योंकि चुनाव वही लड़ सकता है जो भारत का नागरिक हो. सवाल यह है कि जो दस्तावेज हमारे सांसदों-विधायकों की नागरिकता को प्रमाणिक बनाते हैं, वही दस्तावेज आम लोगों को भारत की नागरिकता के लिए वैध प्रमाण क्यों नहीं है? इस आधार पर कहें तो यह प्रक्रियागत असमानता जनता और नेताओं को अलग करती है और जनता को उसके अधिकारो से वंचित करती है.
पाखंड की पराकाष्ठा यह है कि जिन दस्तावेजों के आधार पर चुनाव जीतकर संसद और विधानमंडलों में पहुंचे हमारे प्रतिनिधि हमारे लिए ही कानून बनाते हैं वे ही कागजात जनता के लिए वैध नागरिकता के प्रमाण नहीं हैं.
दूसरा उदाहरण देखिए. विदेश मंत्रालय जिस पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण नहीं मानता है, उसे ही दुनिया भर के देशों की सरकारें भारत की नागरिकता का प्रमाण मानती हैं. नहीं मानतीं तो विभिन्न देशों में हमारे राजदूत, हाई कमिश्नर, प्रतिनिधि वगैरह को मान्यता कैसे मिलती है? क्या पासपोर्ट के राजनयिक हो जाने भर से यानी पासपोर्ट की किताब का रंग बदल जाने से उसकी हैसियत नागरिकता तय करने की हो जाती है?
हम 1947 में आजाद हुए. 1950 से हमारा संविधान भी लागू है. 1952 से लगातार चुनाव भी हो रहे हैं. लेकिन इन आठ दशकों में किसी भी सरकार ने इस मूल समस्या यानी भारतीय है कौन के समाधान के लिए कुछ खास नहीं किया. हमारी सरकारें संविधान में करीब सवा सौ संशोधन कर चुकी हैं, लेकिन इस मुद्दे पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया कि नागरिकता तय करने के मानक स्पष्ट और संदेह से परे हों.
नागरिकता के मुद्दे पर चर्चा इस समय इसलिए गर्म है कि एसआइआर के कारण विपक्ष चिल्ला रहा है. लेकिन वह भी कोई सुझाव नहीं दे रहा है. क्या हमारे सांसद अब भी नागरिकता को सुपरिभाषित करने और मानक तय करने के लिए ईमानदारी से तैयार हैं? यदि हां तो फिर संसद से एक ऐसा कानून पास कराने की सामूहिक मांग क्यों नहीं हो रही है कि अमुक कागजात के आधार पर नागरिकता तय होगी. यह दुर्भाग्य नहीं तो क्या है कि हम मतदाता तो हैं, हम सरकारें बनातें हैं, लेकिन हम कानूनन वैध नागरिक नहीं हैं. और हैं भी तो हमारे हाथ में उसका प्रमाण नहीं है. फिर भी हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं.
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