
श्रीनिवास
बेशक बंगाल के चुनावी नतीजों को महज हेराफेरी नहीं कहा जाना चाहिए. ‘टीएमसी’/ ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ असंतोष रहा होगा, था. एक कारण तो यह भी रहा कि भाजपा विरोधी दलों को इतने वोट मिले, जो भाजपा और टीएमसी के बीच जीत के अंतर से काफी अधिक है.
भाजपा और टीएमसी के मतों मे बीच करीब पांच प्रतिशत मतों का अंतर है. उधर कांग्रेस (3) और माकपा (6) को कुल नौ प्रतिशत वोट मिले हैं! जरूरी नहीं कि ये सभी वोटर टीएमसी को ही वोट देते, फिर भी इसे एक फैक्टर माना जा सकता है!
एक और सच- बंगाल के 'भद्रलोक' को 'वामपंथी' होने का गुमान रहा है. शायद अब भी है. मगर ऐसा लगता है कि बंगाली सवर्ण भी बिहार-यूपी आदि के स्वजातियों के मार्ग पर चल पड़े हैं! टीएमसी को सिर्फ मुसलमान वोट देते हैं, यह तो मिथ्या दुष्प्रचार है ही, इस बार बंगाल में भी ‘हिंदू बनाम हिंदू’, यानी अगड़ा-पिछड़ा हुआ.
मगर सिर्फ इन कारणों से भाजपा को प्रचंड जीत मिल गयी, इसे स्वीकार नहीं कर पाने के अनेक अन्य कारण हैं! इसमें चुनाव आयोग सहित पूरे सिस्टम के योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता!
बकौल ‘दैनिक भास्कर’- हर सीट पर औसतन 30 हजार वोट हटे, 176 सीटों पर इतने ही मार्जिन से जीत. भाजपा ने 128 सीटें 30 हजार से कम मार्जिन पर जीतीं.
भाजपा और टीएमसी के मतों में सिर्फ 5% का अंतर है. भाजपा को 46% और टीएमसी को 41% वोट मिले हैं. इसका मतलब 54% मतदाताओं ने भाजपा को वोट नहीं दिया या वे भाजपा को नापसंद करते हैं. मगर वे अपनी ‘प्रचंड’ जीत पर इतरा रहे हैं!
जाहिर है कि इस परिवर्तन का श्रेय सिर्फ बंगालियों को नहीं है- ‘बंगाल फतह' किया गया! और इस फतह में तंत्र के सुनियोजित उपयोग की भी भूमिका रही, यह संदेह करने के पर्याप्त कारण हैं! संभव है, इस बात को अदालत में सिद्ध नहीं किया जा सके, मगर अदालत जिनको बेगुनाह मान लेती है, जरूरी नहीं कि वे सब सचमुच बेगुनाह हों!
क्या यह महज ‘संयोग’ है कि जिस भवानीपुर में ममता बनर्जी 15 हजार मतों से पराजित हुईं, वहां करीब पचास हजार वोटरों के नाम काटे गये! जिन वोटरों के नाम काटे गये थे, वे सभी 'घुसपैठिये’ थे?
गृह मंत्री सहित भाजपा के तमाम नेता दावा और घोषणा करते रहे हैं कि बंगाल में सरकार बनने पर 'घुसपैठियों’ को भगाया जाएगा! यह काम मूल रूप से केंद्र सरकार का है या राज्य सरकार का? सवाल यह है कि एसआईआर में 'घुसपैठियों’ की पहचान हुई या नहीं? हां, तो अब तक चुनाव आयोग ने यह बताया क्यों नहीं कि फर्जी तरीके से वोटर बन गये कुल कितने 'घुसपैठियों’ के नाम काटे गये?
यदि उनकी पहचान हो गयी है तो केंद्र सरकार ने अवैध रूप से भारत में रह रहे ऐसे लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की? या कि मकसद सिर्फ उतने वोटरों के नाम काटने का था, जिससे भाजपा की जीत सुनिश्चित हो सके?
हालांकि अब तो भाजपा के लोग, बड़े नेता भी जिस भाषा और अंदाज में बोल रहे हैं, उसका सीधा अर्थ यही है कि वे मुसलमानों को भारत का नागरिक ही नहीं मानते. इसलिए देर-सवेर उनको वोट देने के अधिकार से वंचित करने का उपक्रम हो, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा!
यदि बंगाल के मतदाताओं ने टीएमसी को नकार कर भाजपा को चुन लिया है, तो इस पर किसी को ऐतराज करने का अधिकार नहीं है, मगर अनेक ऐसे तथ्य हैं, जो संकेत करते हैं कि यह जनादेश मतदाताओं का नहीं है, इसमें ‘खेला’ हुआ है!
पुनश्च : इस चुनाव प्रणाली पर पुनर्विचार जरूरी
लगे हाथ ‘प्रचंड जनादेश’ के शोर के बीच कुछ तथ्यों पर गौर करें- 1967 के लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस को करीब 40 प्रतिशत मत मिले थे. उसने कुल 520 में से 283 सीटें जीतीं. वह कांग्रेस का तब तक का सबसे खराब प्रदर्शन था. तब कहा गया था- कांग्रेस किसी तरह बहुमत का आंकड़ा छू सकी.
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 31 प्रतिशत मत मिले, सहयोगी दलों को मिला कर कुल 38.5%, भाजपा को 282 सीट (67 में कांग्रेस को मिली सीटों से एक कम) और एनडीए को कुल 336. लेकिन उसे नरेंद्र मोदी और भाजपा के पक्ष में ‘प्रचंड जनादेश’ के रूप में प्रचारित किया गया, आज भी किया जाता है!
बंगाल के चुनाव में कम से कम सीटों के लिहाज से भाजपा की जीत को बड़ी सफलता कहा जा सकता है, पर मतों की दृष्टि से नहीं. उसे टीएमसी से महज पांच फीसदी अधिक (कुल 46 फीसदी) मत मिले हैं. मगर विधानसभा की 294 में से 217 सीट उसे मिल गयी! वोट प्रतिशत और सीटों में इतना अंतर हमारी चुनाव प्रणाली की एक बड़ी खामी है, जिस पर राजनीतिक दलों को गंभीरता से विचार करना चाहिए. एक विकल्प समानुपातिक प्रणाली भी है!
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