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झारखंड बीजेपी कार्यसमिति की बैठक में नितिन नबीन के शामिल होने के राजनीतिक मायने क्या हैं?

झारखंड बीजेपी प्रदेश कार्यसिमिति की रांची में 24-25 अक्टूबर को होने वाली बैठक को लेकर पार्टी के नेता, कार्यकर्ता उतासहित है. वजह साफ है. इस बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन भी शामिल होंगे.
 
Nitin Nabin

झारखंड बीजेपी प्रदेश कार्यसिमिति की रांची में 24-25 अक्टूबर को होने वाली बैठक को लेकर पार्टी के नेता, कार्यकर्ता उतासहित हैं. वजह साफ है. इस बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन भी शामिल होंगे. राष्ट्रीय अध्यक्ष 23 अक्टूबर को ही रांची पहुंच रहे हैं. वैसे राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नबीन का झारखंड में यह दूसरा दौरा है, पर प्रदेश में मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के बीच पार्टी की कार्यसमिति की बैठक में उनके शामिल होने के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे. 


राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे और राजनीतिक मायने पर बात से पहले इसकी चर्चा प्रासंगिक है कि इसी महीने के पहले हफ्ते झारखंड बीजेपी ने दो अहम बदलाव देखे हैं. नये संगठन महामंत्री पवन साय ने दो अक्टूबर को अपना कार्यभार संभाला है. वे छत्तीसगढ़ से आए हैं. उन्होंने कर्मवीर सिंह की जगह ली है. जबकि कर्मवीर सिंह को संगठन महामंत्री के तौर पर छत्तीसगढ़ भेजा गया है. पवन साय की नियुक्ति के बाद कर्मवीर सिंह की कार्य क्षमता और झारखंड में संगठन के हाल पर सोशल मीडिया पर कई सवाल खड़े किए गए थे.  

 

पवन साय के कार्यभार संभालने के ठीक तीन दिनों बाद, पांच अक्टूबर को झारखंड बीजेपी के झारखंड के नये प्रभारी गजेंद्र पटेल रांची दौरे पर पहुंचे. नये सह प्रभारी निवेदिता सिंह और सौरभ सिंह भी आए. जाहिर तौर पर पार्टी में संगठन महामंत्री और नये प्रभारियों का गर्मजोशी से स्वागत हुआ. इन नेताओं ने प्रदेश के नेताओं के साथ कई बैठकें कीं. संगठन में धार चढ़ाने के लिए मंत्र भी फूंके. भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री सौदान सिंह भी 20 से 22 अक्टूबर तक झारखंड में हुआ. और अब राष्ट्रीय अध्यक्ष आए हैं. 

 

गौरतलब है कि पवन साय और गजेंद्र सिंह दोनों आदिवासी समुदाय से आते हैं. जाहिर तौर पर पार्टी नेतृत्व ने उम्मीदों के साथ आदिवासी नेता और मध्यप्रदेश में खरगोन सीट से सांसद गजेंद्र पटेल और छत्तीसगढ़ में संगठन महामंत्री रहे पवन साय को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के साथ झारखंड में क्रमशः प्रभारी और संगठन महामंत्री के तौर पर नियुक्त किया है.

 

इसके संकेत साफ हैं कि झारखंड में हाथ से सत्ता निकलने और खासकर आदिवासी इलाकों में खोयी जमीन को लेकर भाजपा की कसक वाकई में गहरी है. पार्टी की सीधी नजर खोयी इस जमीन को वापस पाने और संगठन पर धार चढ़ाने पर है. साथ ही हेमंत सोरेन से सत्ता छीनने की नये सिरे से कवायद भी.

 

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झारखंड में लगातार हार की कसक गहरी है

 

गौर कीजिये, दो अक्टूबर को रांची स्थित भाजपा कार्यालय में गहमागहमी के बीच गर्मजोशी से स्वागत और अभिनंदन समारोह के बीच नये संगठन महामंत्री पवन साय अपने संबोधन में यह कहते हुए कार्यकर्ताओं से नारे लगवाते हैं- ‘2029 में हमरे जीतब’ (हम जीतेंगे).


जबकि पांच अक्टूबर को अपने पहले दौरे पर नये प्रभारी गजेंद्र पटेल नेताओं, कार्यकर्ताओं में जोश भरने के अंदाज में संबोधन के दौरान कहते हैं, “सिर्फ कदम बढ़ाने की जरूरत है. 2029 में झारखंड फतह करने से कोई रोक नहीं सकता. जब हमने दृढ़ संकल्प के साथ पश्चिम बंगाल में जीत का झंडा गाड़ा, दिल्ली फतह किया है, तो झारखंड क्यों नहीं जीत सकते. झारखंड में तो हम पहले कई बार सरकार बना चुके हैं.”

 

वरिष्ठ पत्रकार चंदन मिश्र कहते हैं, “झारखंड में बीजेपी की जो हालत है उसे आलाकमान भी अच्छी तरह से समझने लगा है कि हेमंत सोरेन के सामने सभी प्रमुख आदिवासी नेताओं के कद छोटे पड़ गए हैं. और सांगठनिक धार भी कमजोर पड़ी है. राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यसमिति की बैठक में शामिल होने के संकेत भी यही हैं कि झारखंड में पार्टी को गियरअप किया जाए. सांगठनिक स्तर पर कमजोर कड़ियों को कसा जाए. शीर्ष नेतृत्व ने पवन साय और गजेंद्र पटेल को हालत बेहतर करने की मंशा से ही यहां महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है. साय और पटेल प्रदेश के नेताओं में ऊर्जा भरने की कोशिशों में जुटे हैं कि सत्ता में वापस लौटना मुमकिन है, इसके लिए काम करने होंगे. वैसे चुनाव में अभी तीन साल का वक्त है, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि नेतृत्व की सीधी नजर झारखंड पर है. इन सबके केंद्र में एक बात अहम है कि अगर प्रदेश में बड़े नेताओं के बीच कई ध्रुवों को पाटने व जमीन पर काम करके दिखाने में रणनीतिकार सफल हुए तो परिस्थितियां बदल भी सकती हैं.”

 

प्रदेश महामंत्री अमर बाउरी ने पहले ही कहा है, “प्रदेश बीजेपी के लिए यह बैठक एक अवसर भी है, जब राष्ट्रीय अध्यक्ष के संबोधन से प्रदेश के पार्टी पदाधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं को संगठन को मजबूत बनाने, कार्यकर्ताओं की भूमिका तथा पार्टी के कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने जैसे विषयों पर मार्गदर्शन प्राप्त होगा. इस बैठक में संगठन के कार्यों की समीक्षा तो होगी ही, साथ ही आगामी राजनीतिक और संगठनात्मक गतिविधियों का पूरा खाका तैयार किया जाएगा.”


हिंदी पट्टी और पूर्वोत्तर के राज्यों में 


नितिन नबीन बिहार से आते हैं. नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री रहे हैं. झारखंड की राजनीति और समीकरणों को परखते रहे हैं. बिहार में अब भाजपा सरकार का नेतृत्व कर रही है. देश के अलग-अलग हिंदी पट्टी इलाकों में भाजपा का शासन कायम है. और पूर्वोत्तर के राज्यों में भी भाजपा का की पैठ बढ़ी है. छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश, असम जैसे राज्यों में आदिवासी सीटों पर भाजपा को चुनावों में बेहतर नतीजे मिल रहे हैं. लेकिन झारखंड में आदिवासी  इलाकों में भाजपा कमजोर पड़ती जा रही है. राष्ट्रीय अध्यक्ष भरसक चाहते हों कि झारखंड में भी भाजपा अपनी पुरानी साख को हासिल कर सके. 

 

चिंता की असली वजहें क्या हैं

 

2014 में 37 सीटों पर जीत हासिल करने वाली और सत्ता पर काबिज हुई बीजेपी को 2019 में 24 सीटों पर जीत मिली थी. जबकि 2014 में जेएमएम में 18 विधायक थे. 2019 में जेएमएम ने 30 सीटों पर जीत दर्ज कर कांग्रेस, राजद, भाकपा माले के साथ सत्ता पर कब्जा जमाया.


भाजपा के हाथ से सत्ता फिसलने की बड़ी वजह आदिवासी सीटों पर हार बनी. विधानसभा में आदिवासियों के लिए रिजर्व 28 सीटो में से 2019 के चुनाव में सिर्फ दो सीटों पर पार्टी को जीत मिली. और 2024 के चुनाव में यह संख्या घटकर एक एक हो गई. सरायकेला से अकेले चंपाई सोरेन जीते. यानी 27 सीटों पर  जेएमएम- कांग्रेस ने जीत का रिकॉर्ड कायम किया. अलबत्ता 2024 के चुनाव में 34 सीटों पर जीत के साथ जेएमएम सबसे बड़ा दल होकर उभऱा. 2024 के लोकसभा चुनाव में ही आदिवासियों के लिए रिजर्व सभी पांच सीटों पर बीजेपी की हार हो गयी.

 

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भाजपा के रणनीतिकारों को भान है


अगर गठबंधन की बात करें तो 2024 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को 24  सीटों पर जीत मिली, जबकि उसके वोट शेयर 38.14 प्रतिशत थे. दूसरी तरफ जेएमएम गठबंधन ने 56 सीटें जीती और वोट शेयर 44.33 प्रतिशत रहे. सीटों पर जीत की स्ट्राइक रेट में भी बीजेपी और उसकी सहयोगी आजसू को जेएमएम गठबंधन की तुलना में करारा झटका लगा है.

 

भाजपा के रणनीतिकारों को इसका भी बखूबी अहसास है कि अगले चुनाव में उसके सामने अगर सत्ता में वापसी की चुनौती है, तो हेमंत सोरेन की नजर गठबंधन में रहकर भी अकेले दम पर 41 सीटों पर जीतने पर रहेगी. दूसरा- हेमंत सोरेन आदिवासियों के  बीच सर्वमान्य और बड़े कद के नेता के तौर पर उभरे हैं. 


शीर्ष स्तर पर झारखंड को लेकर बीजेपी ने जो एक्सरसाइज शुरू की है, उसके नतीजों को लेकर अभी देखा जाना बाकी है. गिरिडीह में होने वाले उपचुनाव में भी इस एक्सराइज का छोटा सही, लिटमस टेस्ट हो जाएगा. 

 

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सामान्य सीटों और शहरी इलाके में भी पिछड़ने की मुश्किलें

 

81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में अनुसूचित जाति के लिए 9 सीटें रिजर्व हैं. इनमें सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा- कांग्रेस-राजद के पास पांच और बीजेपी गठबंधन के पास चार सीटें हैं.


दूसरी तरफ जेएमएम-कांग्रेस ने सामान्य और शहरी इलाके की सीटों पर भी बीजेपी को सकते में डाला है. 2024 के चुनाव में बोकारो, भवनाथपुर, सारठ, सिंदरी, निरसा की सीट भाजपा ने गंवा दी. गिरिडीह में जेएमएम का लगातार दूसरी बार झंडा लहरा.


हालिया शहरी निकायों के चुनावी नतीजे और हेमंत की नजरें इशारे करती हैं कि उन्होंने एक खाका खींच रखा है कि कैसे 34 से आंकड़े को अकेले दम पर 41 पर पहुंचाया जाए. इन सबके बीच अपने सहयोगी दलों को भी साधे रखना चाहते हैं.


नौ नगर निगमों में देवघर और गिरिडीह में जेएमएम समर्थित मेयर, डिप्टी मेयर बने हैं. जबकि तीन नगर निगमों में ही बीजेपी समर्थित उम्मीदवारों की जीत हुई. छह नगर निगम में मेयर के पद पर बीजेपी समर्थित उम्मीदवारों की हार से समीकरण बदलते दिखे और संगठन की कमजोरियां भी सामने आईं.


जाहिर तौर पर भाजपा के सामने अपने कोर वोट बैंक को समेटने, संगठन की कमजोर कड़ियों को कसने, सत्ता पक्ष से लड़ने और क्षेत्रीय दलों से गठबंधन अथवा अकेले लड़ने के सवाल पर रणनीतिक बिसात बिछाने की चुनौतियां हैं.

 

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