
श्रीनिवास
‘साहेब’ गुस्से में हैं! चुनाव आयोग के कथित पक्षपात, एसआईआर में गड़बड़ी सहित अन्य मुद्दों पर आंदोलन कर रहे लोगों पर आरोप लगाया है कि ये ‘रिजीम चेंज’ करना चाहते हैं! अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने जवाब में कहा- ‘हां, हम ‘रिजीम चेंज’ करना चाहते हैं!’ उन्होंने गलत क्या कहा है?
संयोग देखिए कि निर्वाचित विधानसभा और सरकार को भंग करने की मांग सबसे पहले दिसंबर 1973 में गुजरात में शुरू हुए नवनिर्माण आंदोलन में ही उठी थी! अहमदाबाद के एक इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रावास के मेस बिल में मामूली वृद्धि के खिलाफ शुरू हुए छात्र आंदोलन में तमाम विपक्षी दल कूद पड़े.
वह भारत का पहला सफल आंदोलन भी साबित हुआ, जिसके चलते विधानसभा भंग हुई. 9 फरवरी 1974 को मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल ने इस्तीफा दिया. उसी दिन राष्ट्रपति शासन लगा, विधानसभा निलंबित कर दी गयी.
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी विधानसभा भंग नहीं करना चाहती थीं. मोरारजी देसाई ने आमरण अनशन शुरू कर दिया. जेपी ने भी समर्थन किया. आखिरकार 15 या 16 मार्च 1974 को गुजरात विधानसभा भंग हो गयी!
उस वक्त बिहार में नारा लगा- गुजरात की जीत हमारी है, अब बिहार की बारी है! बिहार में भी आंदोलन छात्रों ने शुरू किया, विधानसभा भंग करने की मांग हुई, विपक्षी दल शामिल हो गये. मगर सरकार नहीं झुकी. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उस मांग असंवैधानिक मांग बताया! जेपी ने कहा- यह मांग असंवैधानिक हो सकती है, अलोकतांत्रिक नहीं है!
उन आंदोलनों में ‘जनसंघ’ (वही आज भाजपा है) और आरएसएस शामिल था! फिर जो हुआ, सब जानते हैं! इमरजेंसी लगी. हजारों नेता-कार्यकर्ता और आंदोलनकारी गिरफ्तार हुए!
अंततः 1977 में लोकसभा चुनाव हुए और पहली बार कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हो गयी! जी हां, वह आंदोलन ‘रिजीम चेंज’ के लिए भी था, जिसमें मौजूदा सत्तारूढ़ लोग शामिल थे. अब यदि लोग ‘रिजीम चेंज’ की बात करते हैं, तो गलत कर रहे हैं?
12 साल सत्ता में रहने के बाद आप 2047 में ‘विकसित भारत’ का सपना दिखा रहे हैं! यानी जनता 21 साल और इंतजार करे! इस बीच जो आपके पिछले वेदों के बारे में सवाल करे, वह देशद्रोही है?
आपका फ्रेंड’ ट्रंप हजारों किलोमीटर दूर ईरान में ‘रिजीम चेंज’ की बात करता रहा, एक देश के राष्ट्रपति को किडनैप कर अमेरिका ले आया, वहां अपनी पिट्ठू सरकार बिठा दी, आपको बुरा लगा? आपने आलोचना की? या वह सब सही था?
1974 के उस आंदोलन का देशव्यापी फैलाव नहीं हुआ होता, उस समय की बौरायी सरकार ने उसे दबाने का प्रयास नहीं किया होता, उस आंदोलन के पीछे ‘विदेशी साजिश’ का बेहूदा इल्जाम नहीं लगाया होता, इंदिरा गांधी के चाटुकारों ने ‘इंडिया इज इंदिरा एंड इंडित इज इंडिया जैसे जुमले नहीं उछाले होते, तो जनता में उतना आक्रोश कैसे होता? नहीं होता तो ‘रिजीम चेंज’ कैसे होता?
बेशक अंततः मतदाता ही फैसला करेंगे, लेकिन मतदाताओं को जिस जहालत में फंसा दिया गया है, समाज का एक बड़ा हिस्सा जिस धर्मांधता की गिरफ्त में है, उसे उस जकड़न से निकालने के लिए ऐसे आंदोलनों की जरूरत पड़ती है!
आप हिंदू-मुसलमान करके वोट का जुगाड़ कर रहे हैं. ‘मंत्र घुसपैठिया’ का जाप कर रहे हैं, सरकारी खजाने से रेवड़ी बांट कर वोट खरीदने का प्रयास कर रहे हैं, चुनाव आयोग का सहयोग हासिल है ही. तो जो सत्ता में नहीं हैं, वे भी अपने ढंग से जनता को अपने पक्ष में गोलबंद करने का प्रयास कर रहे हैं, तो आपको इतना कष्ट क्यों हो रहा है? आपको विश्वास है कि पब्लिक आपके साथ है, तो इतनी घबराहट क्यों? ये लोग हथियार के बल पर सत्ता पलटने की कोशिश तो नहीं कर रहे.
वैसे 'रिजीम चेंज' बिना चुनाव के, चुनाव के पहले भी हो सकता है. 1977 में जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार थी, ढाई साल में ही गिर गयी! तब पार्टी टूट गयी थी, यह सरकार तो बैशाखियों पर टिकी है. क्या पता, अपने अंतर्विरोधों से ही…
उस समय दुष्यंत कुमार ने लिखा था- ‘तुम्हारे पांव के नीचे जमीन नहीं, गजब यह कि फिर भी तुमको यकीन नहीं..!’
आपका यह गुस्सा, दरअसल आपकी घबराहट इस बात का संकेत तो नहीं कि आपको एहसास होने लगा है कि आपके पैरों के नीचे से धीरे-धीरे जमीन खिसक रही है!
यह भी याद कर लें कि 1977 में केंद्र की जनता पार्टी सरकार ने इस तर्क के आधार पर कि जहां लोकसभा में कांग्रेस बुरी तरह हारी है, वहां उसकी राज्य सरकार का भी जनादेश खत्म हो गया है, धारा 356 का इस्तेमाल कर कांग्रेस शासित नौ राज्यों (बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, ओडिशा और पश्चिम बंगाल) की सरकारें बर्खास्त कर विधानसभा भंग कर दी थीं, 'रिजीम चेंज' हो गया था.
बाद में यही तर्क से 1980 में इंदिरा गांधी ने केंद्र में लौटते ही बदले में जनता पार्टी की 9 राज्यों की सरकारें बर्खास्त कर दीं. तो 'रिजीम चेंज' कोई अनोखी और अलोकतांत्रिक भी नहीं है!