Ranchi News : घर में कैंसर पीड़ित पिता की सांसें अटकी हैं. दवा और इलाज का खर्च बेटे की आमदनी पर टिका था. लेकिन जेएसएससी सीजीएल के चयनित अभ्यर्थियों पर अचानक मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है.
कुछ ही महीनों में उनकी खुशियां छिन गईं. कोई पुरानी सरकारी नौकरी छोड़कर यहां आया था तो किसी के परिवार में पहली नौकरी लगी थी. जेएसएससी सीजीएल परीक्षा की नियुक्ति रद्द होने पर आए संकट ने युवाओं के पूरे परिवार को अंधकार में धकेल दिया है.

सत्येंद्र रजक, बीएसओ, पलामू
सत्येंद्र के कैंसर पीड़ित पिता के इलाज पर संकट
पलामू में प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी के पद पर कार्यरत सत्येंद्र रजक की स्थिति बेहद संवेदनशील है. हजारीबाग निवासी सत्येंद्र के पिता लंबे समय से कैंसर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और वर्ष 2019 से उनका इलाज चल रहा है. कच्ची मिट्टी का मकान और परिवार की दयनीय आर्थिक स्थिति के बीच सत्येंद्र ही पिता की दवाओं और छोटे भाई की पढ़ाई का एकमात्र सहारा थे. नियुक्ति पर संकट आते ही पूरे परिवार के सामने इलाज तक का संकट गहरा गया है.

श्याम सुंदर मंडल, एएसओ
श्याम की गृहस्थी बसते ही भविष्य अधर में
देवघर के रहने वाले श्याम सुंदर मंडल स्वास्थ्य विभाग में सहायक प्रशाखा पदाधिकारी (एएसओ) के पद पर तैनात थे. साधारण किसान परिवार से आने वाले श्याम सुंदर ने इस पद के लिए रेलवे की सुरक्षित नौकरी छोड़ी थी. दो-दो नौकरियां छोड़कर उन्होंने यह पद संभाला था और बीते अप्रैल माह में ही उनका विवाह हुआ था. नौकरी पर संकट आने से उनकी पूरी गृहस्थी और भविष्य अधर में लटक गया है.

अभिषेक सिंह, एएसओ
अभिषेक पुलिस और जेई की नौकरी छोड़ बने थे एएसओ
चतरा निवासी अभिषेक सिंह भी स्वास्थ्य विभाग में एएसओ के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे. अभिषेक ने इस पद को हासिल करने के लिए पुलिस और कनीय अभियंता (जेई) की दो सरकारी नौकरियां छोड़ दी थीं. अपनी पूर्व की सेवाएं त्यागकर तीसरी नौकरी में आए अभिषेक का कहना है कि वर्तमान अनिश्चितता ने उनके भविष्य के आगे पूरी तरह अंधेरा ला दिया है.

सोनू कुमार, बीएसओ
मजदूर पिता का सहारा सोनू के छलके आंसू
पलामू में पदस्थापित प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी सोनू कुमार हजारीबाग के एक अत्यंत साधारण परिवार से आते हैं. उनके पिता ईंट फैक्ट्री में मजदूरी करते हैं. आठ महीने तक नौकरी कर पिता का सहारा बने सोनू पर ही दो भाई-बहनों की पढ़ाई-लिखाई और पूरे घर के खर्च की जिम्मेदारी है. स्थिति की गंभीरता बताते हुए सोनू अपनी बेबसी पर आंसू नहीं रोक पा रहे हैं.
शादी की चल रही थी बात
गृह विभाग में जेएसए पद पर चयनित और वर्तमान में जेपीएससी कार्यालय में प्रतिनियुक्त हजारीबाग के अरुण गहरे सामाजिक दबाव में हैं. परिवार में उनकी शादी की बात चल रही थी. अरुण का कहना है कि जीवन अचानक पूरी तरह बेपटरी हो गया है और इस स्थिति में वापस गांव जाने पर समाज ताना मारेगी.
पिता के निधन के बाद मुकेश उठा रहे थे घर खर्च
शहरी विकास विभाग में सहायक प्रशाखा पदाधिकारी मुकेश कुमार राघव के लिए यह जीवन की पहली नौकरी थी. पिता के देहांत के बाद पूरे परिवार में कमाने वाले वह अकेले सदस्य हैं. परिवार का गुजारा चलाने के साथ-साथ छोटे भाई की पढ़ाई का सारा खर्च भी मुकेश के ही कंधों पर था, जिस पर अब अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं.
रोहित की मां का रो-रोकर बुरा हाल
चतरा के रहने वाले रोहित भी गृह विभाग में जेएसए के पद पर जेपीएससी में प्रतिनियुक्त थे. पिता के न होने के कारण घर चलाने का पूरा जिम्मा उन पर है. जब से नियुक्ति पर संकट की सूचना घर पहुंची है, तब से उनकी मां का रो-रोकर बुरा हाल है और पूरे परिवार में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ है.
सतीश के पिता लोहा फैक्ट्री में करते हैं काम
रामगढ़ के सतीश कुमार महतो के पिता लोहा फैक्ट्री में दैनिक मजदूरी करते हैं. अपने भाई की पढ़ाई और घर खर्च संभाल रहे सतीश का कहना है कि बिना स्पष्ट कारण और ठोस आधार के हजारों चयनित अभ्यर्थियों के भविष्य को अधर में धकेलना पूरी तरह अन्यायपूर्ण है.
बहनों की पढ़ाई व शादी की जिम्मेदारी प्रदीप पर
धनबाद के रहने वाले प्रदीप कुमार महतो के पिता एक छोटा सा किराना दुकान चलाकर परिवार का भरण-पोषण करते हैं. दो बहनों की पढ़ाई पूरी कराने और उनके विवाह की जिम्मेदारी प्रदीप के ही कंधों पर थी. उनका कहना है कि इस फैसले से रातों-रात मेहनत से संवारे गए करियर का गला घोंट दिया गया है.
Lagatar Media की यह खबर आपको कैसी लगी. नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय साझा करें