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"आप" का क्या होगा जनाब-ए-आली

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बैजनाथ मिश्र

अपने देश में एक अलबेली पार्टी है. नाम है आम आदमी पार्टी यानी आप. यह बनी थी जिन आदर्शों और उसूलों की कसमें खाकर उन्हें चबा गयी है. यह बनी थी आम के लिए, लेकिन बन गयी है खासमखास. इसे व्यवस्था के किसी भी अंग पर भरोसा नहीं है सिवा अपनी सरकार पर. गणतंत्र दिवस परेड को फालतू बता चुकी यह पार्टी अब न्यायपालिका के विरूद्ध सत्याग्रह अभियान चला रही है, वह भी गांधी के नाम पर. शायद उसका मन आंबेडकर और भगत सिंह से खट्टा हो गया है. 

 

मामला यह है कि इस पार्टी के खुदमुख्तार अरविंद केजरीवाल और उनके दो दर्जन संगी साथियों को ट्रायल कोर्ट ने शराब घोटाला मामले में इस आधार पर मुक्त कर दिया है कि दाखिल चार्जशीट के आधार पर इनके विरूद्ध प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है. इसके विरूद्ध सीबीआई हाईकोर्ट पहुंच गयी. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने यह केस जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के कोर्ट में सुनवाई के लिए भेज दिया. लेकिन केजरीवाल ने एक आवेदन देकर मांग रख दी कि यह मामला जस्टिस शर्मा को न दिया जाय. चीफ जस्टिस ने कहा कि इस बाबत आपको जो कुछ कहना है उसी कोर्ट में कहें. 

 

फिर केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा की अदालत में एक अर्जी लगा दी कि वह इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लें. स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल को रिक्युजल (स्वयं को अलग करने) के लिए दलील पेश करने की अनुमति दे दी. आज कल मुख्यमंत्री अदालतों में खुद पैरवी करने लगे हैं. ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में अपने पक्ष में दलील दे चुकी थीं. अब केजरीवाल की बारी थी. उन्होंने मौखिक ही नहीं, लिखित भी दलील पेश की. 

 

केजरीवाल का कहना था कि उन्हें इस कोर्ट से न्याय मिलने की अपेक्षा नहीं है या न्याय न मिलने की आशंका है. इसके लिए उन्होंने मूलतः तीन कारण बताये. एक यह कि यह अदालत उनके विरूद्ध फैसले देती रही है. दूसरा यह कि न्यायाधीश के बेटे-बेटी सरकारी वकीलों की पैनल लिस्ट में शामिल हैं. तीसरा यह कि वह अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में भाग लेती रही हैं और यह संस्था संघ से संबंधित है. लेकिन इस अधिवक्ता परिषद के सम्मेलनों ने तो सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत से लेकर कई न्यायमूर्ति शामिल होते रहे हैं. तो क्या उन्हें केंद्रीय जांच एजेंसियों के मुकदमों से खुद को अलग कर लेना चाहिए? 

 

जहां तक स्वर्णकांता या किसी अन्य जज के फैसलों की बात है तो उनके खिलाफ शीर्ष अदालत या बड़ी बेंच का दरवाजा खटखटाया जा सकता है. रही बात किसी जज के परिजनों के सरकारी वकीलों के पैनल में शामिल होने की, तो यह उनका पेशा भी है, अधिकार भी है और यह किसी जज के किसी मामले से अलग होने का आधार नहीं है. भारत में रिक्युजल का आधार स्पष्ट है. सवाल यह है कि क्या एक सामान्य और समझदार व्यक्ति के मन में किसी जज के पक्षपाती होने का भाव संचरित होता है? 

 

केजरीवाल समझदार तो हैं. समझदार नहीं होते तो एक से एक वकील, कविराज, प्रोफेसर, टेक्नोक्रेट, पत्रकार व अन्य प्रोफेशनल को बाहर का रास्ता दिखाकर खुद कुंडली मारे पार्टी पर नहीं बैठ जाते? लेकिन वह सामान्य नहीं, असमान्य हैं. अदालतों ने बार-बार कहा है कि आशंका ठोस तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए. रिक्युजल के दूसरे आधार हैं आर्थिक हित, संबंधित मामले में पूर्व सहभागिता या किसी पक्ष के साथ निजी संबंध. 

 

बहरहाल, कुछ जज स्वयं ही कुछ मामलों से अलग हो जाते हैं. स्वर्णकांता चाहतीं तो स्वेच्छा से यह मामला छोड़ सकती थीं. लेकिन केजरीवाल यह दिखाना या साबित करना चाहते थे कि जज साहिबा उनसे डर गयीं. अति हमेशा वर्जनीय है. लेकिन केजरीवाल आदतन, इरादतन और शरारतन अतिवादी हैं. शायद इसीलिए स्वर्णकांता ने इस मामले से खुद को रिक्युजल से इनकार करते हुए एक रिजंड ऑर्डर जारी कर दिया. केजरीवाल चाहते तो इस आदेश को डबल बेंच या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकते थे. लेकिन वह ठहरे क्रांतिधर्मी. इसलिए उन्होंने अदालत को लिखकर दे दिया कि वह इस मामले में पैरवी नहीं करेंगे, न वकालतन न व्यक्तिगत. उन्होंने इस बाबत प्रेस कांफ्रेंस भी कर दी और गांधी की समाधि पर धरना-सत्याग्रह भी कर दिया. 

 

यह सब कृत्य अदालत की अवमानना या अवहेलना की श्रेणी में आते हैं. तो क्या स्वर्णकांता इस बाबत केजरीवाल को कोई समन जारी करेंगी? लगता तो नहीं है, लेकिन वह कर सकती हैं और सजा भी दे सकती हैं. वह चाहें तो शराब घोटाले की सुनवाई के लिए भी केजरीवाल एंड कंपनी को समन भेज सकती हैं. पहले जमानती और बाद में गैर जमानती. वह चाहें तो कुछ न करें और एकतरफा सुनवाई कर अंतिम फैसला सुना दें. उसके बाद केजरीवाल जो चाहें करें. लेकिन केजरीवाल "चित भी मेरी पट भी मेरी अंटा मेरे बाप का" वाला खेल खेलना चाहते हैं. अगर फैसला उनके पक्ष में आया तो कहेंगे अदालत उनकी पैंतरेबाजी से डर गयी और यदि फैसला खिलाफ आया तो कहेंगे कि यह तो होना ही था. 

 

देखिए, आगे क्या होता है, लेकिन केजरीवाल पर चढ़ी केंचुल की एक और परत उतर गयी है. लेकिन उनकी चिंता यह भी है कि उनके प्रिय कहारों ने ही "आप" की डोली लूट ली है. पार्टी के सात राज्य सभा सदस्यों ने एक साथ भाजपा की सदस्यता ले ली है और महाशय को भनक तक नहीं लगी. इनमें ज्यादातर पंजाब के हैं जहां "आप" की सरकार है. इन सात में से दो संदीप पाठक और राघव चड्डा ऐसे हैं जो रणनीतिकार, व्यवस्थापक और पार्टी के स्तंभ रहे हैं. 

 

चड्डा जहां चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं, वही पाठक आइआइटी में प्रोफेसर रहे हैं. वह ऑक्सफोर्ड से पढ़े लिखे हैं. इन सात में से तीन ऐसे हैं जो पार्टी को गुप्त सहयोग देते रहे हैं. इसके अतिरिक्त उनकी कोई योग्यता नहीं थी. लेकिन वे भी आजिज आ गये थे. केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की प्यास बढ़ती ही जा रही थी. "आप" के बचे-खुचे छोटे-बड़े नेता फुंफकार रहे हैं, लेकिन इसके अतिरिक्त वे कर ही क्या सकते हैं. 

 

अब पंजाब विधायक दल में टूट की आहट सुनायी देने लगी है. यह टूट होगी या नहीं और इसकी आंच में दिल्ली भी पिघलेगी या नहीं, यह पाठक और चड्डा जानें, लेकिन गुजरात निकाय चुनाव में जिस प्रकार पार्टी की भद्द पिटी है, उससे उसका मंसूबा ध्वस्त हो गया है. 

 

ऐसा लगता है कि यदि केजरीवाल का यही रवैया रहा तो इस पार्टी का हश्र भी जनता पार्टी और जनता दल जैसा हो जाएगा. ये दोनों दल भी आंदोलन की उपज थे. जनता पार्टी जहां तीन साल भी नहीं टिक पायी, वहीं चंद्रशेखर अपने हिस्से की पार्टी लेकर कांग्रेस की कृपा से चार महीने प्रधानमंत्री पद पर बने रहे, तो सुब्रह्मणयम स्वामी अकेले एक टुकड़ा ढ़ोते-ढ़ोते भाजपाई हो गये और आज कल केवल मोदी की निंदा में लीन हैं. चरण सिंह का हिस्सा संभाल रहे उनके पोते जयंत चौधरी भाजपा के हमजोली हैं. अलबत्ता वहीं से पैदा हुई भाजपा आज डेढ़ दर्जन राज्यों और केंद्र में सत्तासीन है, क्योंकि उसके पास तब भी विचारधारा थी, अपना मजबूत संगठन था और आज भी है. 

 

यही हाल जनता दल का हुआ. बोफोर्स कांड के विरोध में पैदा-बना यह दल राजद, जद(यू), जद(एस) आदि में बंट चुका है. संभव है अन्ना आंदोलन से पैदा "आप" की "झाड़ू" भी तिनके-तिनके बिखर जाय. यह पार्टी भी ट्रांजेक्शनल है. इसकी न कोई विचारधारा है, न ध्येय, न मुद्दा. सिर्फ एक व्यक्ति इसे अपने हिसाब से हांक रहा है और व्यक्ति केंद्रित दल या तो खत्म हो जाते हैं या वंशवाद की चपेट में आ जाते हैं. कांग्रेस वंशवादी होते हुए भी बची है तो इस वजह से कि उसकी विचारधारा अभी पूरी तरह सूखी नहीं है. लेकिन "आप" का क्या होगा जनाब-ए-आली. 

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