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वतन का क्या होगा अंजाम, बचा लो ए मौला ए राम

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बैजनाथ मिश्र

देश के तीन अपूर्व घटनाक्रमों ने प्रत्येक विचारशील व्यक्ति को सकते में डाल दिया है. इनमें पहला है बंगाल में न्यायिक शासन लगना. वहां सुप्रीम कोर्ट ने जो व्यवस्था लागू की है, वह शब्दशः तो न्यायिक शासन नहीं है, लेकिन व्यावहारिक अर्थों में है वही. वहां मई के पहले हफ्ते तक विधानसभा चुनाव संपन्न होना है. लेकिन उससे पहले निर्वाचन आयोग द्वारा चलाया जा रहा मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण कार्य (एसआईआर) संपन्न होना है. चुनाव प्रक्रिया पूरी होने में कम से कम 45 दिन का समय लगता है. इस लिहाज से देखें तो मार्च के दूसरे हफ्ते से चुनाव प्रक्रिया शुरु हो जानी चाहिए. लेकिन मतदाता सूचियों में करीब अस्सी लाख नामों की विशेष जांच अभी नहीं हो पायी है. 

 

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया शुरु होने के बाद भी यह जांच जारी रहेगी. लेकिन निर्वाचन आयोग के पुनरीक्षण कार्य पर रोक नहीं लगेगी. ऐसी स्थिति क्यों पैदा हुई, इसे समझने के लिए बंगाल सरकार की नीयत, कारगुजारी और निर्वाचन आयोग के संकल्प पर गौर करना जरूरी है. बंगाल की ममता सरकार शुरु से ही एसआईआर के खिलाफ थी. उसे लग रहा था कि एसआईआर ठीक से संपन्न हो गया तो उसके बड़े समर्थक वर्ग के नाम कट जायेंगे. इसलिए उन्होंने अफवाहें फैलाने और पुनरीक्षण कार्य में असहयोग का रास्ता अपनाया. 

 

पहले तो एसआईआर रोकने के लिए हिंसा फैलायी गयी. अधिकारियों-कर्मचारियों को डराया-धमकाया गया. लेकिन काम नहीं बनता देख उन्होंने पुनरीक्षण कार्य रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया. बड़े-बड़े वकील खड़े कर दिये गये, आयोग को प्रतिवेदन दिये गये, प्रदर्शन भी हुए और खुद ममता बनर्जी भी काला गाउन पहनकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गयीं. दलील यह थी कि समय कम है और इतने कम समय में राज्य में एसआईआर का काम पूरा नहीं हो सकता. लिहाजा पुरानी मतदाता सूची से चुनाव करा लिया जाये और चुनाव बाद पुनरीक्षण कार्य संपन्न कराया जाये. 

 

सुप्रीम कोर्ट भला कैसे कह सकता था कि बोगस मतदाताओं को भी मतदान का मौका दे दिया जाय. इसलिए उसने कहा कि पुनरीक्षण कार्य जारी रहेगा और राज्य सरकार इसमें सहयोग करे. आयोग ने कहा कि राज्य सरकार इसके लिए सक्षम अधिकारी ही नहीं दे रही है, इसलिए हमें बाहर से अधिकारी प्रतिनियुक्त करने की अनुमति दी जाये. यह अनुमति मिल जाती तो ममता बनर्जी की मुश्किल और बढ़ जाती. इसलिए राज्य सरकार ने कहा कि राज्य सरकार अपेक्षित अधिकारी-कर्मचारी उपलब्ध कराएगी. 

 

अगली सुनवाई में आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि राज्य सरकार ने जो अधिकारी उपलब्ध कराया है वे ग्रेड वन के नहीं हैं, वे अक्षम हैं, वे आयोग से अधिक राज्य सरकार की हिमायत कर रहे हैं और मतदाता विसंगतियों की जांच नहीं करना चाहते हैं. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट को माजरा समझ में आ गया. उसने कोलकाता हाईकोर्ट को आदेश दे दिया कि वह वरीय जिला जजों को एसआईआर के काम में लगाये और काम पूरा कराये. सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश संविधान प्रदत्त अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त अधिकार के तहत दिया. इसके जवाब में कोलकाता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उनके पास जजों की संख्या करीब पौने तीन सौ है और ये प्रति दिन ढ़ाई सौ विसंगतियां निपटायें तो भी अस्सी दिन लग जायेंगे. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि ओड़िशा और झारखंड से अतिरिक्त जज प्रतिनियुक्त किये जायें, इनके वेतन, ठहराने और खाने पीने का खर्च निर्वाचन आयोग उठायेगा और सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य के डीजीपी की होगी. 

 

स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. लेकिन यह हुआ ममता बनर्जी की खुटचाल, दबंगई और नंगई के कारण. बावजूद इसके विपक्षी गंठबंधन के नेता इस बारे में मौन साधे हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट के उपक्रम के बावजूद क्या बंगाल में एसआईआर समय से पूरा हो पाएगा और विधानसभा चुनाव समय से हो जायेगा या फिर राष्ट्रपति शासन लगेगा या विधानसभा को सुसुप्तावस्था में डालने की नौबत आ जायेगी?

 

दूसरा घटनाक्रम दिल्ली में हुआ. वहां एआई पर अंतरराष्ट्रीय समिट चल रही थी. मौका ताड़कर युवक कांग्रेस के करीब दर्जन भर नेता-कार्यकर्ता बाकायदा डिजिटल प्रवेश पत्र लेकर वहां घुस गये. अंदर जाकर उन्होंने अपनी शर्ट उतार दी और अंदर पहनी स्लोगन लिखी टी शर्ट के साथ प्रदर्शन करना शुरु कर दिया. यानी मोदी कम्प्रोमाइज्ड. यह स्लोगन भारत-अमेरिका के बीच  संभावित व्यापार संधि पर कांग्रेस का आरोप या तंज था. लेकिन जहां नग्न प्रदर्शन किया गया वहां न तो संधि हो रही थी, ना ही उसका मसौदा तैयार हो रहा था. वहां दुनिया के करीब तीन सौ प्रतिनिधि एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) पर विचार-विमर्श कर रहे थे. फिर वहां भारत-अमेरिका डील के खिलाफ भोड़े प्रदर्शन की जरुरत क्या थी? 

 

यह प्रदर्शन वाणिज्य मंत्री और उनके मंत्रालय या फिर प्रधानमंत्री कार्यालय और उनके आवास के बाहर किया जा सकता था. लेकिन प्रदर्शनकारियों को शायद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बटोरने का शौक चर्राया था और इस जुनून में उन्होंने ऐसा कर दिया जिसकी चतुर्दिक भर्त्सना हो रही है. यहां तक कि विपक्षी गंठबंधन के साथी दलों ने भी कन्नी काट ली है. सबने यही कहा कि प्रदर्शन तो ठीक था, लेकिन स्थान और तरीका गलत था. लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें तीन उपाधियों से विभूषित किया है- बब्बर शेर, महात्मा गांधी और भगत सिंह. क्या अहिंसावादी गांधी की हिंसक शेर से तुलना उचित है? क्या गांधी शहीद भगत सिंह के समर्थक थे? क्या गांधी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ गोली, बम चलानेवालों के हिमायती थे? क्या देश का हर नंग-धड़ंग, वस्त्रविहीन गांधी हैं? यह भी कि जब इन बब्बर शेरों को आम लोग लतिया-जुतिया रहे थे तो ये भाग क्यों रहे थे? ये इतने बहादुर और क्रांतिकारी हैं तो पुलिस के डर से यहां-वहां भागे क्यों फिर रहे थे? 

 

बहरहाल, ये प्रदर्शनकारी गिरफ्तार किये जा चुके हैं, मुकदमा लिखा जा चुका है. पता नहीं अदालत पुलिस की कहानी मानकर उन्हें तत्काल जमानत देगी या कुछ दिन लटकायेगी, लेकिन फूहड़ प्रदर्शन को देश ने घटिया माना है. अभी यह साफ नहीं हो सका है कि इसके पीछे कांग्रेस के किस नेता की शह थी, लेकिन ठीकरा तो जिसके सिर फूटना था, फूट ही रहा है. वैसे कहा गया है कि नंगा से भगवान भी डरते हैं. तो क्या यह प्रदर्शन मोदी-सरकार को डराने के लिए था और वह डर गयी है?

 

उपर्युक्त दोनों घटनाओं से बदबूदार है अविमुक्तेश्वरानंद पर पॉस्को एक्ट के तहत दर्ज मुकदमा. अविमुक्तेश्वरानंद ज्योतिर्मठ के स्वस्थापित शंकराचार्य हैं. देश में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी शंकराचार्य पर यौन शोषण का आरोप लगा है. आरोप यह है कि अविमुक्तेश्वरानंद ने दो नाबालिग बच्चों के साथ दुराचार किया है.  

 

स्वामी जी का कहना है कि यह उन्हें बदनाम करने का कुत्सित प्रयास है. इसके पीछे हिस्ट्रीशीटर आशुतोष ब्रह्मचारी और प्रयागराज के पुलिस कमिश्नर की मिलीभगत है. यह सही है कि आशुतोष आपराधिक प्रवृत्ति का है. उस पर कई मामले दर्ज हैं. और वही इस मामले में पैरवीकार है. लेकिन यदि इसमें पुलिस की मिलीभगत होती तो पुलिस थाने में पहले ही प्राथमिकी दर्ज हो गयी होती. अविमुक्तोश्वरानंद के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई है अदालत के आदेश से और वह भी नाबालिग बच्चों के बयान के आधार पर. मेडिकल रिपोर्ट में उनके साथ दुराचार की पुष्टि हो गयी है. लेकिन दुराचार क्या सचमुच अविमुक्तेश्वरानंद ने किया है, इसकी जांच होनी बाकी है. 

 

प्राथमिकी दर्ज होने के बाद स्वामी जी गरज रहे थे कि वह बैठे हैं, पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर ले, लेकिन वह जमानत मांगने हाईकोर्ट चले गये. हाईकोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी पर अगली सुनवाई (मार्च के तीसरे हफ्ते) तक रोक लगा दी है. लेकिन इस मामले की जांच जारी रहेगी और पुलिस उन्हें पूछताछ के लिए बुला सकती है या उनके पास जा सकती है. 

 

इस बीच अविमुक्तेश्वरानंद ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से गुहार लगायी है कि आपके रहते एक शंकराचार्य को कैसे घृणित मामले में फंसाया जा रहा है. उधर, उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने उन्हें ढ़ाढ़स बंधाया है कि पार्टी ऐसा आंदोलन खड़ा करेगी कि सरकार हिल जाएगी. आगे क्या होगा, पता नहीं, लेकिन क्या कोई शंकराचार्य कानून से ऊपर हैं? यदि आम नागरिक पर यही आरोप लग गया होता तो क्या वह गिरफ्तार नहीं हो गया होता? क्या शंकराचार्य को इसलिए छूट मिलनी चाहिए कि पीड़ित बच्चों की ओर से पैरवी एक आपराधिक प्रवृत्ति का व्यक्ति कर रहा है? 

 

उपर्युक्त वर्णित तीनों घटनाओं पर गौर कीजिए कि हम कहां जा रहे हैं, हमारा देश कहां जा रहा है? शायद ऐसी ही घटनाओं से क्षुब्ध होकर किसी ने लिखा था- वतन का क्या होगा अंजाम बचा लो ए मौला ए राम. 

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