Brijendra Dubey इंडिया गठबंधन में 14 न्यूज एंकरों के बहिष्कार की घोषणा करके एक नई बहस छेड़ दी है. लेकिन मुझे लगता है कि जिनके नाम छूट गए हैं, उनको बड़ा अफसोस होगा. बहस तो इस पर होनी चाहिए. उनकी जिंदगी भर मेहनत पर पानी फिर गया. बेचारे टॉप 14 में नाम तक नहीं ला पाए. क्या सोचेंगे आका, कैसे मुंह दिखाएंगे आका को. फिलहाल पिछले नौ सालों से न्यूज चैनलों पर जो चल रहा है, उसे देख कर लगता है कि यह देर से लिया गया एक सही फैसला है. विपक्षी गठबंधन `इंडिया` ने एक अभूतपूर्व क़दम उठाते हुए आखिरकार भाजपा समर्थक 14 टीवी एंकरों की एक सूची जारी कर दी, जिनके किसी भी कार्यक्रम में उनका प्रतिनिधि शामिल नहीं होगा. गठबंधन ने कहा है कि उसने ‘नफ़रत भरे’ न्यूज़ डिबेट चलाने वाले इन टीवी एंकरों के कार्यक्रमों से असहयोग करने का फ़ैसला किया है. हम नफरती एजेंडे का हिस्सा नहीं बनना चाहते. इंडिया गठबंधन का कहना है कि हर शाम कुछ चैनलों पर नफ़रत का बाज़ार सज जाता है. पिछल नौ साल से यही चल रहा है. हमने इन्हें सुधरने का पूरा मौका दिया, लेकिन जब पानी सिर के ऊपर आ गया, तो मजबूरन ऐसा कदम उठाना पड़ा. इंडिया गठबंधन का कहना है अलग-अलग पार्टियों के कुछ प्रवक्ता इन नफरत के बाज़ारों में आते हैं. कुछ एक्सपर्ट होते हैं, कुछ विश्लेषक…..लेकिन सच तो ये है कि हम सब वहां उस नफ़रत बाज़ार में ग्राहक के तौर पर जाते हैं. हम आगे से इसका हिस्सा नहीं बनेंगे. गठबंधन के बहिष्कार के फैसले पर एक बड़ा सवाल भी पैदा हो रहा है. सवाल यह है कि एंकर जो भी करते हैं, न्यूज चैनलों के धन्नासेठ मालिकों की शह पर होता है. मालिक का सरकार के साथ सीधा संवाद होता है, असली फायदा तो वही उठाता है. ऐसे में न्यूज एंकरों की बजाय इनके न्यूज चैनलों के बहिष्कार की ही घोषणा की जाती. इस संबंध में कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा से पूछा भी तो उन्होंन बड़ी साफगोई से कहा, देखिए हम किसी से नफरत नहीं करते, हम तो चाहते हैं कि एंकर जिस तरह के सवाल हम से कर रहे हैं या इससे पहले मनमोहन सरकार से करते थे, उसी तरह के सवाल मोदी सरकार से भी करें. उन्होंने कहा कि हम किसी का बहिष्कार नहीं कर रहे, हम तो नफरत की दुकान चलाने वालों के साथ असहयोग कर रहे हैं. हम कुछऔर तो कर नहीं सकते, लेकिन इतना तो कर ही सकते हैं कि हम इनके एजेंडे का हिस्सा न बनें. इसी लिए इंडिया गठबंधन ने फैसला किया है कि उसके प्रतिनिधि देश के 14 न्यूज एंकरों के किसी कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेंगे. इंडिया गठबंधन के इस फैसले पर न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एंड डिज़िटल एसोसिएशन (एनबीडीए) और भाजपा की तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं. एनबीडीए के अध्यक्ष अविनाश पांडे ने इस फ़ैसले पर कहा, यह मीडिया का गला घोंटने जैसा है. जो गठबंधन लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है, वो खुद इसे ख़त्म करता दिख रहा है. लेकिन हम अपने हर शो में सभी को बुलाएंगे. गठबंधन के इस फ़ैसले से पीड़ा हुई है और वो इसे लेकर चिंतित हैं. उधर भाजपा ने भी गठबंधन के इस फ़ैसले की कड़ी आलोचना की है. भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा, न्यूज़ एंकरों की इस तरह लिस्ट जारी करना नाजियों के काम करने का तरीक़ा है, जिसमें ये तय किया जाता है कि किसको निशाना बनाना है. अब भी इन पार्टियों के अंदर इमरजेंसी के वक़्त की मानसिकता बनी हुई है. इस बीच, कुछ संगठनों और प्रबुद्ध लोगों ने एनबीडीए और भाजपा को उनके पुराने दिन याद दिलाए हैं. शिवसेना (यूबीटी) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने ट्विटर पर लिखा, सालों तक तो बीजेपी एनडीटीवी (अडानी युग से पहले) का बहिष्कार करती रही. उस समय उन्हें ये दर्द सुनाई नहीं पड़ा. पिछले कई सालों से कुछ ‘पत्रकार’ विभाजनकारी, नफ़रत से भरे प्रोग्राम चलाते रहे. इनके नतीजे साफ़ तौर पर दिखे. उस समय किसी ने ये निर्देश नहीं पढ़े थे? उन्होंने लिखा, ``पिछले कई सालों से टीवी न्यूज़टेनमेंट मीडिया बराबरी का मौक़ा देने से इनकार करता रहा. उस समय उन्हें अपने इस क़दम के विरोध की आवाज़ सुनाई नहीं पड़ी. लेकिन `इंडिया` ने अब ऐसे डिबेट शो में हिस्सा न लेने का तय किया है क्योंकि प्रेस की आज़ादी खतरे में हैं. एनडीटीवी के एंकर रहे रवीश कुमार ने भी ट्विटर पर इस फ़ैसले पर टिप्पणी करते हुए लिखा, सात साल बहिष्कार झेला है. ऐसा लग रहा है कल प्रधानमंत्री पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ही देंगे. प्रेस की आज़ादी की रक्षा के लिए. जहां ये सारे लोग सवाल पूछते नज़र आएंगे. उसके बाद ये सारे लोग सना इरशाद मट्टू से इसके लिए माफ़ी मांगने भी जाएंगे. रवीश ने लिखा, फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीक़ी के मारे जाने के बाद दो शब्द नहीं कहा गया. किसने नहीं कहा, क्या आप उनका नाम जानते हैं? मनदीप पुनिया का पेज रोकने के लिए नोटिस किस सरकार ने भेजा था? क्या नाम जानते हैं? गोदी मीडिया भारत के लोकतंत्र के लिए ख़तरा है. विपक्ष को अपनी हर रैली में जनता को बताना चाहिए. अगर वह यह काम नहीं करता है, तो लोकतंत्र के भविष्य को लेकर गंभीर नहीं है. पत्रकार प्रणंजय गुहा ठाकुरता ने इंडिया के फैसले पर एनबीडीए के बयान को ट्वीट करने वाले पत्रकार राहुल कंवल के ट्वीट को री-ट्वीट करते हुए लिखा है, क्या आप इस लिस्ट में ख़ुद को न पाकर ख़ुश हैं या दुखी हैं. क्या ये मामला वैसा ही है, जिसमें एक गुनहगार दूसरे को गुनहगार ठहरा रहा है. पत्रकार सागरिका घोष ने ट्विटर लिखा, अच्छा है कि इस तरह के चैनलों से पूरी तरह दूर रह कर उनके पैसे के स्रोत को बंद कर दिया जाए. आख़िरकार देश के कई राज्यों में ‘इंडिया’ का शासन है ही. क्यों न उनके विज्ञापन बंद कर दिए जाएं. राजनीति विज्ञानी सुहास पलशीकर ने ट्विटर पर लिखा, इस तरह का चुनिंदा मीडिया बहिष्कार दुविधा और अपशकुन दोनों की निशानी है. दुविधा इसलिए कि जिन चैनलों या एंकरों का बहिष्कार किया जाना है, पलशीकर लिखते हैं, ``दूसरी ओर नज़रअंदाज या अपमानित किया जाना भी ऐसा विकल्प नहीं है जिसे मंजूर किया जा सके. हालांकि इस बात की संभावना रहती है कि चैनलों पर जाएं और अपना असर छोड़ें. आज न्यूज़ चैनलों में जो ध्रुवीकृत बहसें चलाई जाती हैं, उससे डिबेट शो कहे जाने वाले इस तरह के प्रोग्राम राजनीति से जुड़े प्रोग्राम नहीं रह जाते. ये मुर्गों और सांडों की लड़ाई में बदल जाते हैं. तो क्या अब हमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कार्यक्रमों की री-स्ट्रक्चरिंग पर बहस करनी चाहिए. 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जिनके नाम छूट गए, उनका क्या होगा
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