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आप का क्या होगा जनाब-ए-आली ?

DR. Santosh Manav आम आदमी पार्टी के नेता-मंत्री सत्येंद्र जैन जेल में हैं. दूसरे मंत्री मनीष सिसोदिया पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है, तो क्या अब जनाब-ए-आली यानी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की बारी है? ऐसे में वाजिब सवाल है कि दिल्ली और पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी का भविष्य क्या है? क्या यह पार्टी समाप्त हो जाएगी या कर दी जाएगी? क्या दिल्ली-पंजाब तक सिमट जाएगी? क्या यह उम्मीद के अनुरूप नेशनल पार्टी बन पाएगी या `पिंजरे का तोता` इसे कुतर देगा? पार्टी तोड़ने के आरोप, तंग-तबाह की तोहमत, जाति-धर्म की तुकबंदी के बीच सियासी बयानबाजी जारी है. इस बीच देश के बड़े वकीलों में एक और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने ट्वीट किया है: `आप को खत्म करने के लिए तोता पिंजरे से बाहर है.` इसका मतलब यह निकाल सकते हैं कि केंद्र की बीजेपी सरकार आम आदमी पार्टी को समाप्त करने पर आमादा है. क्या सचमुच ऐसा है या दाल में ही कुछ काला है? इस पूरे एपिसोड पर पांच सच.

गुजरात में दम दिखा है

जुबानी जंग में बीजेपी के नेता, आप सरकार और इसके नेताओं को भ्रष्ट साबित करने पर तुले हैं, वहीं आप का कहना है कि बीजेपी आम आदमी पार्टी को तबाह करने पर तुली है. इसलिए कि गुजरात में अरविंद केजरीवाल को जबरदस्त समर्थन मिल रहा है. गुजरात में मुकाबला बीजेपी बनाम आप हो गया है. इस बात में थोड़ी सच्चाई है. गुजरात के नगर निगम चुनाव में कुछ बड़े शहरों में आप को अच्छा समर्थन मिला था और कहा जा रहा है कि समर्थन बढ़ता जा रहा है. केजरीवाल ने गुजरात का दौरा बढ़ा दिया है. केजरीवाल वहीं जाते हैं, जहां थोड़ी उम्मीद होती है. कांग्रेस गुजरात में कमजोर हो गई है. संभव है कि मुकाबला आप बनाम बीजेपी हो.

जहां-जहां धुआं, वहां-वहां आग

दर्शनशास्त्र में कहा गया है कि जहां-जहां धुआं, वहां-वहां आग यानी बिना धुआं के आग असंभव है. आम आदमी पार्टी के जेलवासी बड़े नेता और मंत्री सत्येंद्र जैन पर आरोप है कि उन्होंने हवाला के जरिए 4.81 करोड़ रूपए लिए. उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पर आरोप है कि उन्होंने शराब ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए शराब कानून में फेरबदल किए. आरोप यह भी है कि सिसोदिया के एक नजदीकी व्यवसायी ने शराब ठेकेदार से एक करोड़ रुपए लिए. इस मामले में CBI ने मनीष सिसोदिया के घर पर छापा मारा. हालांकि चौदह घंटे की पड़ताल में CBI को कुछ नहीं मिला.

पर आरोप तो पहले भी लगे हैं

राजनीति में सब कुछ स्वच्छ नहीं होता है. कहा तो यहां तक जाता है कि राजनीति में जितना गिरोगे, उतना उठोगे. इसलिए आप के आरोपों को सिरे से नकारा भी नहीं जा सकता. सत्ता के खेल में कलंक लगाने का खेल चलता है. पिछले आठ - नौ साल में आप पर कितने प्रहार हुए. देश में किसी मुख्यमंत्री के कार्यालय में पहली बार CBI ने छापा मारा. एक समय आप के दो दर्जन विधायकों पर किसी न किसी बहाने मुकदमे किए गए. एक को छोड़, बाकी कोर्ट से बेदाग निकले. दिल्ली के 2019 के चुनाव में कैसे-कैसे भड़काऊ नारे लगाए गए ! ऐसे में आप नेताओं के इस आऱोप में दम तो है कि केंद्र की सरकार यानी बीजेपी उसे तबाह करना चाहती है. संभव है कि सत्येंद्र जैन बेदाग़ निकल आएं. मनीष भी पाकसाफ हों, जैसे सचिव वाले मामले में केजरीवाल बेदाग रहें. तो क्या प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) पिंजरे के तोते हैं? क्या राजनीतिक विरोधियों को तंग-तबाह करने के लिए इनका इस्तेमाल हो रहा है?

आरोप लगते गए, पार्टी बढ़ती गई

2 अक्टूबर 2012 को गठित आम आदमी पार्टी ने दस साल के अपने जीवनकाल में जबरदस्त तरक्की की है. यह अन्ना आंदोलन से निकली पार्टी है. दिल्ली और पंजाब में उसकी सरकार है. गोवा में सात फीसदी वोट शेयर के साथ उसके दो विधायक हैं. दिल्ली, पंजाब और गोवा में उसे राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा हासिल है. किसी एक और राज्य में राज्य स्तरीय पार्टी बनते ही वह नेशनल पार्टी हो जाएगी. आप को उम्मीद है कि गुजरात चुनाव के बाद यानी इसी साल वह नेशनल पार्टी होगी. देश में चुनाव आयोग से निबंधित 2858 राजनीतिक पार्टियां हैं. इसमें से 45 राज्य स्तरीय पार्टी और आठ नेशनल यानी राष्ट्रीय पार्टी हैं. राष्ट्रीय पार्टियों में बीजेपी, कांग्रेस, टीएमसी, बीएसपी, सीपीआई, सीपीआई (एम), एनसीपी, और नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) शामिल है.यानी नौवां नाम आप का हो सकता है.

छापों से पार्टी समाप्त नहीं होती

इतिहास गवाह है कि छापों और गिरफ़्तारी से कोई पार्टी समाप्त नहीं हुई. गिरफ्तार तो इंदिरा गांधी भी हुई थीं. इसलिए याद रखिए, पार्टियां बनती हैं. बिगाड़ी भी जाती हैं. टूटती और तोड़ी भी जाती हैं. इमेज बनती और बिगाड़ी भी जाती है. आरोपों की आड़ में भ्रष्टाचार भी छिपाए जाते हैं. जाति की आड़ में हमले भी झेले जाते हैं. जाति को मंडी में उतारकर वोट भी पाए जाते हैं. अभी तो गुजरात में चुनाव है. पीएम के `घर` में चुनाव है. इसलिए मानकर चलिए कि दिसंबर तक यानी गुजरात में चुनाव तक पिंजरे का तोता, जाति, धर्म, आरोप, ढाल, सीबीआई और ईडी के किस्से आते रहेंगे. पढ़ने और सुनने के लिए तैयार रहिए. {लेखक दैनिक भास्कर सहित अनेक अखबारों के संपादक रहे हैं. फिलहाल लगातार मीडिया में स्थानीय संपादक हैं } यह भी पढ़ें :">https://lagatar.in/what-does-gadkaris-demotion-mean/">

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