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लौटे कांग्रेसी विधायक करेंगे क्या

Shyam Kishore Chaubey तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ईडी द्वारा गिरफ्तारी के बाद झामुमो नेतृत्ववाली इंडिया सरकार के गठन के साथ ही कांग्रेस में उपजे विक्षोभ का 20 फरवरी को जो हश्र हुआ, वह स्थायी है या तात्कालिक, कहा नहीं जा सकता. स्थानीय नेतृत्व के प्रति गुस्सा और यहां तक कि बगावत दर्शाने की नीयत से आठ विधायकों का दिल्ली कूच खोदा पहाड़ चुहिया तक न निकलने जैसा साबित हुआ. दिल्ली गये कुमार जयमंगल, इरफान अंसारी, दीपिका पांडेय सिंह, अंबा प्रसाद, भूषण बाड़ा, सोनाराम सिंकू, उमाशंकर अकेला और राजेश कच्छप पर पार्टी प्रमुख मल्लिकार्जुन खरगे की कौन कहे, राहुल गांधी तक ने कान न दिया. बहुत कोशिश के बाद पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल से नसीहत पा वे 21 फरवरी को रांची लौट आये. वे सरकार का, खासकर अपने दल के चारों मंत्रियों का साथ देंगे या झामुमो के विक्षुब्ध लोबिन हेम्ब्रम की नाईं अपना अलग राग अलापेंगे, फिलहाल नहीं कहा जा सकता. रांची में लाख समझाइश के बावजूद जिस तेवर से वे दिल्ली गये थे और जिस बुझे मन से वापस लौट आये, उससे लगता यही है कि तत्काल वे अपनी औकात में रहेंगे. झारखंड में कांग्रेस के फिलहाल 17 विधायक हैं, जिनमें चार हेमंत सरकार में मंत्री थे और वे ही चार चंपाई सरकार में भी मंत्री हैं. इससे 12 विधायकों में विक्षोभ था, लेकिन दिल्ली गमन आठ ने ही किया था. वे मंत्री बनना चाहते थे और चाहते हैं भी. विधायक की यह चाहना होती ही है. अब कुछ ज्यादा होने लगी है. वे देख रहे हैं कि पहली बार चुना गया विधायक/सांसद मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री कुछ भी बन जाने की अर्हता प्राप्त कर लेता है. संविधान में ऐसा कुछ लिखा है नहीं कि इन महिमामंडित पदों के लिए कितना अनुभव जरूरी है. व्यवस्था यहां तक है कि बिना चुने भी छह महीने तक ये पद पाये जा सकते हैं. ऐसी स्थिति में इन आठों में कुछ तो डेढ़ बार के, कुछ दो बार के और कई पहली बार का विधायक होने के नाते मंत्री पद पाने के सर्वथा योग्य हैं. और यह भी कि कांग्रेस आज की भाजपा है नहीं कि विरोध, विक्षोभ प्रदर्शित तक न किया जा सके. सो, इन्होंने अपने अधिकार का प्रदर्शन कर दिया, पार्टी नेतृत्व जैसा उचित समझे. तसल्ली की बात है कि क्या पता कल के गये इनके भी अच्छे दिन हिमंत बिस्वा सरमा की तरह इंतजार कर रहे हों. मा महोदय इसी बिना पर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में चले गये थे कि राहुल गांधी उनसे नहीं मिले. आज का दिन है कि वे असम के मुख्यमंत्री हैं. इन आठ विधायकों में से एक कुमार जयमंगल ने कुछ अरसा पहले कहा था कि सरमा से उनके व्यक्तिगत संबंध हैं. उन्हीं दिनों तीन विधायक इरफान, राजेश और विक्सल उनसे मिलने जाने के रास्ते में कोलकाता के निकट 48 लाख कैश के साथ गिरफ्तार किये गये थे. कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र के नाम पर विरोध का इतिहास पुराना है. इसी कारण वह कितनी बार टूटी, उसको गिनती कर लेनी चाहिए. इसी टूटन ने उसको कमजोर कर दिया, बाकी नेतृत्व कौशल का सवाल भी गुंजायमान है. वह इतनी बार टूटी कि राष्ट्रीय फलक पर शायद ही ऐसा कोई दल हो, जिसमें उसका टूटा धड़ा मौजूद न हो. इस लिहाज से कांग्रेस आज हर जगह है. दुनिया का सबसे बड़ा दल होने का दावा करनेवाली भाजपा के लिए इसी कारण कहा जाने लगा है कि उसका कांग्रेसीकरण हो गया है. कार्य व्यवहार में देखें तो नरेंद्र मोदी और इंदिरा गांधी में कौन बीस है, कहना मुश्किल होगा. यह संयोग भी हो सकता है कि 17 फरवरी को जब झारखंड के नाराज कांग्रेसी विधायक दिल्ली पहुंचे, उसके कुछ घंटे पहले मध्यप्रदेश के विक्षुब्ध पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने सांसद बेटे नकुलनाथ संग वहां धमक चुके थे. इन विधायकों के लिए कहा जा रहा था कि वे अलग गुट बनाकर अपना स्वार्थ साध सकते हैं, जबकि कमलनाथ के लिए नेशनल मीडिया में भी खूब उछाला गया कि वे भाजपा में जाने के लिए दिल्ली विराजे हैं. फिलहाल, दोनों मामलों में कुछ न हुआ. कमलनाथ बड़ा नाम हैं. पिछले दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद उनसे प्रदेश अध्यक्षी छीन ली गई थी, तब से खफा-खफा चल रहे हैं. आगे का अहवाल वे ही जानें. रही बात इन झारखंडी विधायकों की तो इन्होंने अपने दल के मंत्रियों से खुद ही दूरी बढ़ा ली है. उनकी शिकायत रही है कि मंत्री उनको भाव नहीं देते. यह मसला तरीके से सुलझाया जा सकता था, पहले भी सुलझाया गया था. दिल्ली जाकर उन्होंने माहौल खराब कर लिया. इतना ही नहीं अचानक चुनौतियों में फंसे मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन उन पर कितना ध्यान देंगे, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता. वे बतौर मुख्यमंत्री पहली मर्तबा बजट सत्र का सामना कर रहे हैं. 23 फरवरी से प्रारंभ हुआ यह सत्र, हालांकि छोटा ही है, प्रायः हफ्ते भर का, लेकिन बजट सत्र सत्ता पक्ष के लिए विकट होता है. जब सत्ता पक्ष के विधायक मनमुटाव की स्थिति में हों तो यह और विकट हो जाता है. इस स्थिति में मनी बिल पारित कराना आसान नहीं होता. विक्षुब्ध चल रहे कांग्रेसी विधायक सरकार का चाहे पूरा साथ दें, लेकिन उन्होंने पार्टी में और विधायक दल में चल रहे खटराग को उजागर कर दिया. पार्टी संगठन और वरिष्ठ विधायकों/मंत्रियों की जवाबदेही बनती है कि वे सबकुछ ठीकठाक कर लें, लोकसभा चुनाव कभी भी दस्तक दे सकता है. डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]

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