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CO को कहां से मिलती है हिम्मत? आदेश के बाद भी क्यों नहीं छोड़ना चाहते कुर्सी?

 
Vinit Abha Upadhyay Ranchi  :  झारखंड में किसी अंचल में सीओ के पद पर नियुक्ति के बाद अधिकारियों को अपनी कुर्सी से बहुत ज्यादा ही मोह होने लगता है. खास कर कमाई वाली कुर्सी और मलाईदार पोस्टिंग हो तो अफसर कुर्सी से ऐसे चिपक जाते हैं कि ट्रांसफर होने के बाद भी कुर्सी नहीं छोड़ना चाहते. ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि सरकार के आदेश के बावजूद चार्ज लेने के दौरान ऐसी घटनाएं हुई हैं. इसके बाद से इस बात की चर्चा होनी शुरू हो गयी है कि क्या अधिकारी किसी खास जगह पर लंबे समय तक बने रहना चाहते हैं? आखिर सरकारी आदेश के बाद प्रभार के आदान-प्रदान में आनाकानी करने की हिम्मत किसी अधिकारी में कैसे आ जाती है. पहला मामला :  राज्य सरकार ने लोकसभा चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर अंचल अधिकारियों का तबादला किया था. तबादले की इस सूची में ओरमांझी सीओ के पद पर तैनात नितिन गुप्ता को हटाकर उज्जवल सोरेन को ओरमांझी अंचल का सीओ नियुक्त किया गया था. लेकिन गुप्ता जी ने सोरेन जी को चार्ज देने के लिए इतने पापड़ बेलवाये कि पूछिए मत. दिन भर चले ड्रामे के बाद उज्जवल सोरेन को स्वत: चार्ज लेना पड़ा था. उस वक़्त यह घटना चर्चा का मुद्दा बना था. दूसरा मामला :  सरकार ने 28 सितंबर को कई सीओ का तबादला किया. इस लिस्ट में नामकुम सीओ के पद पर रामप्रवेश कुमार को नियुक्त किये जाने की अधिसूचना जारी की गयी. लेकिन सीओ प्रभात भूषण ने सभी आदेशों को ठेंगे पर रखते हुए नये सीओ को चार्ज नहीं दिया. इसके बाद सीओ रामप्रवेश कुमार ने सरकारी ऑफिस का ताला तोड़कर चार्ज ले लिया. अब सवाल ये उठता है कि सरकारी आदेश के बाद भी अधिकारी अपनी कुर्सी क्यों नहीं छोड़ना चाहते और ऐसा करने की हिम्मत उन्हें कहां से मिलती है?
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