
बैजनाथ मिश्र
असम, केरलम और पुडुचेरी विधानसभाओं के चुनाव संपन्न हो गये हैं. तमिलनाडु में तेईस अप्रैल को वोट पड़ेंगे. बंगाल के मतदाता तेईस और उन्नतीस अप्रैल को अपनी सरकार चुनेंगे. सभी राज्यों के नतीजे चार मई को आयेंगे. लेकिन असम और केरलम में जिस स्तर पर चुनाव प्रचार हुआ, वह संसदीय जनतंत्र के लिए शोचनीय है. लोकलाज तो गायब थी ही, मर्यादाएं भी टूट गयीं.
केरलम में प्रचार करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कह दिया कि यह केरलम है. यहां के लोग पढ़े-लिखे हैं. गुजरात की तरह निरक्षर नहीं हैं जो भाजपा की दाल गल जाएगी. उन्होंने गुजरात के साथ कुछ अन्य राज्यों का भी उल्लेख किया, लेकिन किसी का नाम नहीं लिया. माना जा रहा है कि उनका इशारा उत्तर प्रदेश, बिहार की ओर था. इन राज्यों में भी कांग्रेस दशकों से फिसड्डी है. खरगे के इस बयान पर बवाल बढ़ा तो उन्हें अपनी गलती का भान हुआ और उन्होंने माफीनामा जारी कर दिया. यह माफीनामा राहुल गांधी के उस बयान पर चपत है जिसमें उन्होंने कहा था कि हम लोग गांधीवादी हैं सावरकरवादी नहीं जो माफी मांगेंगे.
हालांकि अपनी गलती के लिए माफी मांगना बड़प्पन है. अकड़ मुर्दों में होती है. लचीलापन जीवंतता का प्रमाण होता है. फिर भी बात जुबान से और तीर कमान से निकलने के बाद वापस नहीं आते हैं. रहीम ने ठीक ही कहा है- "बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय, रहिमन फाटे दूध को मथै न माखन होय." खरगे जी शायद ताव में यह भूल गये कि अगले साल गुजरात और उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं. कांग्रेस अध्यक्ष के नाते वह प्रचार करने वहां जायेंगे ही. तब वह अपने उपर्युक्त बयान पर क्या जवाब देंगे? वैसे भी इस तरह के बयान राष्ट्र की एकता-अखंडता के प्रतिकूल है.
खरगे ने केरलम से भी उम्दा विचार असम में व्यक्त किया. उन्होंने मजहबी जमात को संबोधित करते हुए कुरान का एक सबक सिखा दिया. उन्होंने कहा कि यदि आप नमाज पढ़ रहे हों और सामने एक जहरीला सांप दिखाई दे तो नमाज कुर्बान कर दो और सांप को मार डालो. खरगे की मानें तो ऐसा कुरान में लिखा है. पता नहीं, ऐसा कुरान में लिखा है या नहीं, लेकिन उन्होंने आगे कहा कि भाजपा और आरएसएस भी जहरीले सांप हैं. ये दिख जायें तो नमाज छोड़कर भी इन्हें मार डालो. खरगे साहब ने यह नहीं बताया कि निजाम हैदराबाद के रजाकारों ने कुरान की कौन सी आयत पढ़कर उनका गांव जला दिया था और उनके पूरे परिवार को मार डाला था.
सवाल यह है कि खरगे के उपदेश को किस रुप में लिया जाय? क्या यह सांप्रदायिक विद्वेष या दंगा फैलाने की कुटिल नसीहत नहीं है? खरगे केवल कांग्रेस अध्यक्ष ही नहीं हैं वह राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष हैं. उनका संसदीय जीवन लंबा है. फिर भी ऐसी वाणी! अगर वह उकसाने वाली बात नहीं बोलते, तब भी वह इंगित जमात भाजपा के साथ नहीं जाती. फिर उन्होंने अपना मुंह खराब क्यों किया और अपने पद तथा गरिमा का ख्याल क्यों नहीं रखा?
आरएसएस सौ साल का हो गया है. वह निरंतर मजबूत हो रहा है. कांग्रेस उस पर तीन बार प्रतिबंध लगा चुकी है और अदालतों में मुंह की खा चुकी है. जितनी गालियां संघ को दी गयी हैं, जितने हमले उस पर होते रहे हैं, उनसे अविचलित रहते हुए वह अपने काम में साधनारत है और आज आलम यह है कि कांग्रेस जैसी पार्टी उसके सामने शायद खुद को बौना मानने लगी है.
खरगे के बयान का एक आशय यह भी है कि भाजपा और आरएसएस के आगे कांग्रेस बेबस है, अब आप लोग (जिन्हें संबोधित कर रहे थे) उसे मारिए. खैर, खरगे के इस बयान पर प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है और भाजपा ने भी उनकी ठीक ठाक लानत मलामत कर दी है. लेकिन बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुबहानअल्ला. ये छोटे मियां हैं- पवन खेड़ा. उन्होंने दस्तावेज दिखाते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंता विस्वा शर्मा की पत्नी रिनिकी भुइयां शर्मा के खिलाफ दिल्ली और गुवाहाटी में गंभीर आरोप लगा दिया है.
पवन खेड़ा कांग्रेस के प्रवक्ताओं के हेडमास्टर हैं. उनका दावा है कि रिनिकी के पास तीन विदेशी पासपोर्ट हैं और विदेश में उनके पास लाखों-करोड़ों की संपत्ति है. यह दावा उन्होंने मतदान (नौ अप्रैल) से चार दिन पहले किया. हो सकता है कि उन्हें सूचना और दस्तावेज विलंब से मिले हों और उन्हें जारी करते-करते मतदान की तारीख नजदीक आ गयी हो. यानी उन्हें इस आरोप से मुक्त किया जा सकता है कि उन्होंने चुनाव प्रभावित करने के लिए ऐसा किया है. लेकिन सवाल यह है कि यदि आरोप सही है और दिखाये गये दस्तावेज आरोपों की पुष्टि करते हैं तो पवन खेड़ा खम ठोंककर सामने क्यों नहीं आ रहे हैं और हिमंता की बोलती बंद क्यों नहीं कर रहे हैं? उनका परिदृश्य से अचानक ओझल हो जाना उनके आरोपों की हकीकत पर संदेह पैदा करता है.
सवाल यह भी है कि यदि आरोप तथ्य पर आधारित हैं तो उसका खुलासा असम कांग्रेस के वर्तमान कर्णधार गौरव गोगोई ने क्यों नहीं किया? क्या गोगोई इसलिए आगे नहीं आये कि गलत आरोप लगाने पर वह भाग नहीं पाते, क्योंकि वह चुनाव लड़ रहे हैं? यदि गोगोई अपात्र थे तो फिर राहुल गांधी ने स्वयं यह भंडाफोड़ क्यों नहीं किया जो चुनावी मंच से हिमंता को सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री बता रहे थे, वह तो उन्हें पंद्रह साल जेल में सड़ाने की घोषणा कर रहे थे और यह भी कह रहे थे कि उनके बब्बर शेर हिमंता को छोड़ेंगे नहीं?
अभी तक कांग्रेस के किसी भी नेता ने खेड़ा के आरोपों के समर्थन में एक धेला सबूत पेश नहीं किया है जबकि मीडिया के जरिये आ रही खबरों से ऐसा लगता है कि दिखाये गये कागजात या तो फर्जी हैं या एआई जेनरेटेड हैं. तभी तो हिमंता की पत्नी ने प्राथमिकी दर्ज करा दी और असम पुलिस खेड़ा को दबोचने उनके दिल्ली स्थित आवास पहुंच गई. खेड़ा को इसकी भनक लग गयी होगी और वह फरार हो गये. वह तो चुनौती दे रहे थे कि गुवाहाटी में ही बैठा हूं, दर्ज करो प्राथमिकी. ऐसा लग रहा था कि खेड़ा को बलि का बकरा बनानेवाले कांग्रेसी यह मान कर चल रहे थे कि जब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पर अनाप-शनाप आरोप लगाने के बावजूद कुछ नहीं होता है तो हिमंता भी प्राथमिकी दर्ज कराने की हद तक नहीं जायेंगे. कांग्रेस से यहीं चूक हो गई.
कांग्रेस को बिना मांगे सुझाव है कि भाजपा के तीन मुख्यमंत्रियों से पंगा मत लीजिए. ये हैं हिमंता, आदित्यनाथ और देवेंद्र फडनवीस. इनमें हिमंता बददिमाग भी हैं और बदजुबान भी. इसी प्रकरण में उन्होंने खेड़ा के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया है, उसे लिखा नहीं जा सकता है.
एक प्रश्न यह भी उठ रहा है कि कांग्रेस को आधारहीन कहानी गढ़ने और उसे सार्वजनिक रुप से परोसने की क्या जरूरत थी? दरअसल, पिछले छह महीनों से हिमंता गौरव गोगोई की पत्नी एलिजाबेथ पर पाकिस्तानी एजेंट होने का आरोप लगा रहे हैं. लेकिन गोगोई या उनकी पत्नी ने हिमंता के खिलाफ एक भी प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई है और ना ही गोगोई ने कोई विश्वसनीय सफाई दी है. शायद इसीलिए कांग्रेस के रणनीतिकारों ने एक योजना के तहत हिमंता की पत्नी को भी दुबई, मिस्र और कुछ अन्य देशों से जोड़ते हुए घसीट लिया. लेकिन यह दांव उलटा पड़ गया और पवन खेड़ा फंस गये. हालांकि कांग्रेस के पास दिग्गज वकीलों की फौज है और वह खेड़ा को जेल जाने से बचाने की योजना पर काम कर रही होगी.
खेड़ा पहले भी अपनी बदजुबानी के कारण दिल्ली एयरपोर्ट पर जहाज से उतार लिये गये थे. उन्हें हिरासत में ले लिया गया था. वह छूटे तभी जब कोर्ट से बेल मिली. पवन खेड़ा इस बार राज्य सभा जाते-जाते रह गये. इस बाबत जब उनसे पूछा गया कि उनका पत्ता कैसे कट गया तो उन्होंने कहा कि शायद तपस्या में कुछ कमी रह गयी होगी. हो सकता है कि वही कमी पूरी करने के लिए वह जेल यात्रा के लिए तैयार हो गये हों. जेल यात्रा इसलिए कि जिन आरोपों में प्राथमिकी दर्ज हुई है उनमें दस साल तक की सजा हो सकती है.
राजनीति में एक परंपरा है कि नेता संकट के समय अपनी पार्टी के शासन वाले राज्यों में छिप जाते हैं और वहीं अपनी मुक्ति की राह तलाशते हैं. आजकल तेलंगाना कांग्रेसियों के लिए सबसे मुफीद राज्य है. खेड़ा वहीं पहुंच गये और संकट मोचन अनुष्ठान में लीन हो गये. तेलंगाना उनकी ससुराल भी है. नेताओं को ऐसे मौके कम ही मिलते हैं. देखिए इस प्रकरण में आगे क्या होता है. लेकिन खरगे हों या खेड़ा दोनों ने बखेड़ा तो खड़ा कर ही दिया है.
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