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सफेद टी-शर्ट राहुल की ट्रेड मार्क

Brijendra Dubey यूं तो भारतीय राजनीति में कोई ड्रेस कोड नहीं है, लेकिन राहुल गांधी का अपने ट्रेडमार्क सफेद टी-शर्ट पर जोर है. भारतीय राजनीति में कपड़े चुनना एक कठिन प्रक्रिया है, क्योंकि आपके पास इसका कोई खास पैटर्न नहीं होता है. राजनीतिज्ञ खुद को स्वच्छ और नैतिक व आध्यात्मिकता की भावना वाले व्यक्ति के रूप में पेश करते हैं. सफेद रंग इन सभी विशेषताओं से जुड़ा हुआ है. इसलिए, राहुल की सफेद टी-शर्ट एक मजबूत राजनीतिक संदेश देती है और युवाओं से जुड़ाव का प्रतीक है. एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो दिन में चार बार कपड़ा बदलते हैं, वहीं नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, एक सफेद टी शर्ट में आप को हर आम व खास मौकों पर दिखते हैं. भारत जोड़ो यात्रा के बाद से राहुल गांधी की सफेद टी शर्ट भी खूब चर्चा में रही है. आज राहुल गांधी की सफेद टी शर्ट ने देश में एक ब्रांड का रूप ले लिया है. बहुत लोग इसे राहुल गांधी की सादगी भी मानते हैं. इसी सफेद टी शर्ट में देख कर आम लोग भी राहुल गांधी को अपने बीच का आदमी मानने लगे हैं, और उनसे मिलने पर अपनत्व महसूस करते हैं. याद कीजिए, भाजपा के लोगों ने इसी टी शर्ट को लेकर शुरू-शुरू में यह कह कर सवाल उठाया था कि यह तो बहुत महंगी ब्रांड (करीब 41 हजार रुपए की) वाली है. लेकिन लोगों ने उसकी परवाह नहीं की और उन्हें सिर-आंखों पर बिठा लिया. जिस सुलगते मणिपुर में पीएम नरेंद्र मोदी एकबार भी आंसू पोंछने नहीं गए, राहुल गांधी वहां तीन बार जा चुके हैं. अभी हाल ही में वायनाड में हुए जल प्रलय के बाद भी राहुल गांधी बिना देर किए अपनी बहन प्रियंका गांधी के साथ पहुंच गए. वायनाड में दो दिन रुक कर राहुल गांधी ने ज्यादा से ज्यादा पीड़ितों से मुलाकात कर सबको ढाढ़स बंधाया. राहुल गांधी ने कहा- जिस तरह का दुख मुझे अपने पिता राजीव गांधी की मौत पर हुआ था, उससे भी कहीं ज्यादा दुख मुझे वायनाड के आपदा पीड़ितों से मिल कर और उनका दर्द जानकर हुआ है. पहली बार देखने को मिल रहा है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर राहुल गांधी बोलने खड़े होते हैं, तो सत्ता पक्ष में घबराहट दिखती है. राहुल गांधी तथ्यों के साथ पूरी सरकार को जिस तरह घेरते हैं, उससे साफ है कि उनका जनता से जुड़ाव और हर समस्या पर उनकी पारखी नजर का कमाल है ये. दबी जुबान से विरोधी भी राहुल गांधी की वाकपटुता और उनके अंदाज की तारीफ करने लगे हैं. आपको याद होगा कि 4 दिसंबर 2013 को, जब अरविंद केजरीवाल की नई बनी आम आदमी पार्टी ने सभी चुनावी भविष्यवाणियों को गलत साबित करते हुए दिल्ली विधानसभा में 28 सीटें जीतीं, तो राहुल गांधी ने कहा था कि वे केजरीवाल की सफलता से सीखेंगे. लगभग 11 साल बाद, राहुल गांधी अब दिल्ली के मुख्यमंत्री (अरविंद केजरीवाल) की शैली में उनसे बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, बल्कि उनसे भी आगे बढ़ चुके हैं. राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा और भारत जोड़ो न्याय यात्रा करके जन-जन के बीच पहुंच चुके हैं और आज पीएम नरेंद्र मोदी से भी मीलों आगे हैं. विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी लोकसभा के अंदर और बाहर दोनों जगह एक साहसी राजनेता के रूप में उभर कर आए हैं. उन्होंने नाटकीय रूप से दावा किया कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) उनके खिलाफ छापेमारी करने और उनकी गिरफ्तारी की योजना बना रही है. यह दावा उन्होंने हाल ही में आधी रात 1:52 बजे एक माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म एक्स पर किया. यह समय महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि वर्षों से, कई कांग्रेस नेता अक्सर राहुल गांधी की रात 10 बजे से सुबह 10 बजे तक की अनुपलब्धता की शिकायत करते थे. ईडी को अपने खिलाफ कार्रवाई की चुनौती देकर ऐसा लगता है कि राहुल ने कई राजनीतिक गुणा-गणित कर लिए हैं. अगर ईडी ने उन्हें नहीं बुलाया, तो राहुल एक तरह की जीत हासिल करेंगे. अगर एजेंसी आगे बढ़ती है, तो राहुल ईडी के कदम को राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई करार देंगे. इससे भी जरूरी बात यह है कि ईडी से आंतरिक और पूर्व जानकारी होने के राहुल के दावे को विश्वसनीयता मिलेगी. लोकसभा में अपने भाषणों में राहुल गांधी लगातार दो व्यापारिक घरानों के नाम लेते रहे हैं. हर बार, जब अध्यक्ष या सत्तापक्ष की बेंचों से विरोध होता है तो राहुल के आरोप को बल मिलता है कि यह आपसी लाभ का मामला है. राहुल गांधी को राजनीतिक घराने का होने के बावजूद मैं पारंपरिक राजनेता नहीं मानता. राहुल गांधी की टीम के प्रमुख सदस्य एनजीओ और कार्यकर्ता पृष्ठभूमि से आते हैं. भारत जोड़ो यात्रा के दोनों चरणों के दौरान, 21 राज्यों से आए 150 से अधिक सिविल सोसाइटी संगठनों ने राहुल की भारत जोड़ो यात्रा में हिस्सा लिया था. पिछले कुछ महीनों में, राहुल गांधी ने एक लोकप्रिय शख्सियत बनने के बजाय पीएम मोदी के खिलाफ ध्रुवीकरण करने वाला चेहरा बनने की कोशिश की है. राहुल गांधी जनता से सीधे संवाद और बातचीत करते हैं. एक दिन उन्हें लोको पायलटों से मिलते हुए देखा जा सकता है और अगले दिन आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर कुलियों के साथ बातचीत करते हुए, इस सीधे संपर्क और संवाद की धारणा ने राहुल को उन लोगों के मुकाबले बड़ा फायदा दिया है, जो सुरक्षा व्यवस्थाओं और सलाह को प्राथमिकता देते हैं. राहुल गांधी की जोखिम लेने की क्षमता और उनकी स्वतःस्फूर्तता की सफलता की संभावना अधिक है, क्योंकि कांग्रेस की विरासत और प्रभाव किसी भी अन्य राजनीतिक पार्टी से कहीं बड़ा है. इसलिए, यह थोड़ा आश्चर्यजनक है कि अखिलेश यादव ने शैडो कैबिनेट और शैडो प्रधानमंत्री के गठन से संबंधित एक प्रश्न पर कैसी प्रतिक्रिया दी. समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो ने एक साक्षात्कार में पूछा कि क्यों एक ही शैडो प्रधानमंत्री होना चाहिए. हमारे पास दो, तीन या अधिक शैडो प्रधानमंत्री क्यों नहीं हो सकते, अखिलेश ने कहा, मानो अन्य इंडिया गठबंधन के सहयोगियों जैसे टीएमसी, शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी (एसपी), आरजेडी, डीएमके आदि की चिंताओं को दिखा रहे हों. अगर कांग्रेस महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करती है तो विपक्षी पंक्तियों में पहले की तरह राहुल गांधी का उभरना और भी महत्वपूर्ण हो जाएगा. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. 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