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किनको और किनके खिलाफ उकसा रहे हैं डोभाल?

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श्रीनिवास

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल का 10 जनवरी (शनिवार) को युवा दिवस पर युवाओं से आह्वान चर्चा में है. श्री डोभाल ने कहा था, 'इतिहास हमें एक चुनौती देता है. हर युवक के अंदर वो आग होनी चाहिए. प्रतिशोध शब्द अच्छा तो नहीं है लेकिन प्रतिशोध भी अपने आप में भारी शक्ति है. हमें अपने इतिहास का प्रतिशोध लेना है.' उनके इस आह्वान का जो भी निहितार्थ हो, पर यह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के दायित्व का हिस्सा नहीं हो सकता! उनका जिम्मा सरकार या प्रधानमंत्री को सलाह देना है, देश की सुरक्षा के संबंध में. तो वे किनको और क्यों यह 'सलाह' दे रहे थे? इसका देश की सुरक्षा से क्या रिश्ता है?

 

आगे बात करने से पहले जान लें कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) पद का सृजन 1998 में हुआ, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के कार्यकाल में. राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय भी वर्ष 1998 में ही स्थापित हुआ. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड उसके अधीन काम करता है!

 

एक सहज सवाल है कि उसके पहले- नेहरू, शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी इत्यादि को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जरूरत महसूस क्यों नहीं हुई? क्या सचमुच आज देश ज्यादा सुरक्षित है?

 

वाजपेई जी के शासन काल में गंभीर सुरक्षा चूक के अनेक उदाहरण हैं! संसद पर हमला हुआ, विमान अपहरण हुआ, कारगिल में पाकिस्तानी सेना हमारी सीमा में महीनों तक घुसी रही, बंकर बनाती रही, हमारे खुफिया तंत्र को कुछ पता नहीं चला! स्थानीय चरवाहों (जिन्हें, मोदी जी के अनुसार ‘कपड़ों से पहचाना जा सकता है’) ने बताया, तब सेना जगी. पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए हुई सैन्य कार्रवाई, जिसमें सेना को एलओसी लांघने की इजाजत नहीं थी (क्योंकि वह घोषित युद्ध नहीं था), जिस कारण हमारी सेना को काफी नुकसान भी हुआ. मगर सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व की उस विफलता पर खेद जताने के बजाय भारी कीमत चुका कर अपनी खोई जमीन हासिल करने को ‘कारगिल विजय’ के रूप में प्रचारित ही नहीं किया गया, अगले चुनाव में उस नाम पर वोट भी मांग लिया गया.

 

तब (पहले) एनएसए थे ब्रजेश मिश्रा (नवंबर 1998-2004). उसके बाद जेएन दीक्षित (मई 2004), एमके नारायणन और शिव शंकर मेनन (प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह). 2014 से अब तक अजित डोभाल इस पद पर काबिज हैं! अब उनकी उम्र 81 वर्ष है, मगर जमे हुए हैं! इनके रहते पुलवामा हुआ, उरी हुआ, पहलगाम हुआ! मगर इनकी काबलियत का डंका बजता रहा. मणिपुर जलता रहा. डोभाल साहब को पता नहीं चला कि वहां क्या होने वाला है! होने के बाद भी इनको वहां जाना, जमीन पर जाकर स्थिति को देखने, संभालने, खुफिया तंत्र को चुस्त करने की जरूरत महसूस नहीं हुई! वैसे जब मोदी जी भी मणिपुर पर चुप्पी साधे रहे, तो डोभाल को क्या पड़ी थी! पड़ोसी मित्र देशों- बांग्लादेश और नेपाल- में उपद्रव हुआ, तख्ता पलट  हो गया, मगर हमारे खुफिया तंत्र को कोई भनक तक नहीं लगी! 

 

उनके 'जेम्स बॉन्ड' होने के तमाम किस्से प्रचलित हैं, मगर इनकी विफलताओं की चर्चा कोई नहीं करता! फिर भी मोदी जी (और संघ) को डोभाल पसंद क्यों हैं? इसलिए कि ये मूल रूप से, मन-मिजाज से संघी हैं. यह बात कोई रहस्य भी नहीं है. विवेकानंद मेमोरियल संस्थान संघ का ही (अघोषित) प्रोजेक्ट है, डोभाल जिसके सर्वेसर्वा हैं, जिसे भरपूर सरकारी फंड दिया जाता रहा है. फिर भी डोभाल का वह रूप अब तक थोड़े परदे में रहा था, 10 जनवरी को वे बेपर्द हो गये! भारत के युवाओं (जाहिर है, हिंदू युवाओं) को एक हजार साल पहले हुए कथित जुल्मों का, मंदिर तोड़े जाने का ‘बदला लेने’ का आह्वान कर वे खुल कर मैदान में आ गये. क्या वे अनजाने में वह सब बोल गये? ऐसा लगता नहीं. मेरे खयाल से सोच- समझ कर बोले. प्रधानमंत्री, गृह मंत्री सहित भाजपा के किसी बड़े नेता ने डोभाल के उस 'ओजस्वी' भाषण से न असहमति जतायी है, न उसे गैरजरूरी बताया है. तो इरादा क्या है और हो सकता है? 

 

प्रसंगवश, खालिस्तान आंदोलन की पृष्ठभूमि पर 1996 में सम्मानित फिल्मकार- कवि गुलजार ने एक संवेदनशील फिल्म बनायी थी- माचिस. साप्ताहिक ‘रविवार’ के संपादक उदयन शर्मा (अब दिवंगत) की लिखी उसकी समीक्षा का शीर्षक था- ‘कहां आग लगाना चाहते हैं गुलजार?’ उसी तर्ज पर आज पूछा जाना चाहिए कि किनको और किनके खिलाफ उकसा रहे हैं डोभाल? और इस ‘संकट की घड़ी’ में मोदी जी ‘डमरू’ (विध्वंस के देवता शिव का एक प्रतीक) क्यों बजा रहे हैं?   

 

यह आशंका (जैसा की कई लोग जता रहे हैं) अकारण नहीं है कि आनेवाले दिनों में सांप्रदायिक उपद्रव- बड़े पैमाने पर हिंसा भड़काने की कोई योजना तो नहीं बन चुकी है! ‘विकास’ के दावे फेल! तीसरी या चौथी अर्थव्यवस्था बन जाने का गर्व नाकाम? बस (हिंदुओं का) ‘खून खौलाने’ के प्रोजेक्ट से ही सत्ता में बने रहने और दूरगामी लक्ष्य (हिंदू राष्ट्र) को हासिल करने की तैयारी! क्या पता! 

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