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किसकी नजर लग गई कोडरमा को !

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alt="" width="150" height="150" />DR. Santosh Manav 
शांति के टापू पर अशांति के बीज कौन बो रहा है? यह प्रशासन की असफलता है? रिश्वतखोरी का तांडव ? चुनाव की बदबूदार साजिश या कुछ और? कोडरमा में जो कभी नहीं हुआ, वह क्यों हो रहा है? कौन देगा जवाब? नेता-प्रशासनिक अधिकारी? नहीं, वे अपनी सुविधा के अनुसार बयान देंगे. ऐसा बयान, जहां उनकी गंदगी, असफलता छिपे, दूसरे की दिखे. संयम तो उस जनता को बरतनी है, जो शांति चाहती है, जो दो जून की रोटी के लिए संघर्षरत है. भरे पेट वाले, खाए-पीए अघाए लोग चिंतित नहीं होते. `लुटेरी जमात ` अशांति चाहती है, जो लूट के माल पर निर्भर हैं. जो लूट के लिए साजिश रचते हैं. चुनावी जीत के लिए नफरत की दीवार खड़ी करते हैं. इसलिए भुगतना और संभलना आम लोगों को ही है. शांति भी इन्हें ही चाहिए. रोटी के लिए शांति. अंग्रेजों की व्यवस्था के `तनखैय्या ` कोडरमा में दो दुर्घटनाएं हुई हैं. तीन दिन नफरत की हवा चली. हवा अब भी है. पर गति धीमी हो चली है. पहले रामनवमी जुलूस में `तहलका` मचा रहे डीजे के तार खींचे गए. पत्थर फेंकने के भी आरोप हैं. दूसरे दिन कोडरमा बाजार में सात दुकानों को बरबाद किया गया. बेकसूरों को पीटा गया. और तीसरे दिन प्रतिमा विसर्जन जुलूस में एक कौम को आपराधिक गालियां दी गईं. चौथे दिन एक व्यवसायी को पुलिस वालों ने रिश्वत की खातिर पीट-पीटकर मार डाला. ये पुलिस की जमात ही जालिम है. यहां सज्जन मिल जाएं, तो समझिए सौभाग्यशाली हैं आप. ये थाना लूट के अड्डे हैं. यहां फरियादी हों या अपराधी, थाना में बैठे `बड़ाबाबू` और उनके मातहतों के लिए आप मुर्गा हैं, जिसे वे हलाल करेंगे ही. इनके लिए पैसा ही भगवान हैं. इन्हें शौक से कहिए धनपशु. ये अंग्रेजों की व्यवस्था के `तनखैय्या `-वेतनजीवी बड़ाबाबू और छोटाबाबू कहलाना पसंद करते हैं. गुमान इनके सिर और जुबान पर होता है. ये कड़कड़ाते नोट और पैरवी की भाषा समझते हैं. पैसा ही इनका न्याय-अन्याय है. ऐसे में कोई वीरेंद्र साव यह कहे कि पुलिस वालों ने रिश्वत के लिए उनके पिता की पीट-पीटकर हत्या कर दी, तो अविश्वास का सवाल नहीं उठता. डोमचांच की रिश्वतखोर पुलिस ने ढिबरा व्यवसायी अर्जुन साव को न सिर्फ पीटा, आंखें भी फोड़ दी. खुद को पाक-साफ बताने के लिए शव जंगल में फेंका. अब जबकि पुलिस वालों पर हत्या का मामला दर्ज हो चुका है, न्यायालय से ही दूध-पानी की उम्मीद करनी चाहिए.

शंका-कुशंका, शह-मात का आवरण

अब कोडरमा की बात. कुछ लोग दबी जुबान और नाम न छापने की शर्त पर कह रहे हैं कि जलवाबाद की मस्जिद के सामने जुलूस रोककर राम को याद करना (प्रतिक्रिया में कुछ लड़कों ने डीजे के तार नोचे ), अगले दिन एक कौम विशेष की सात दुकानों पर हमला और तीसरे दिन प्रतिमा विसर्जन में एक जमात को गालियां दिलवाना एक `लो प्रोफाइल के बड़े नेता` की साजिश है. इन नेताजी को नगर पंचायत का चुनाव लड़ना है. उन्हें दो कौम के बीच ध्रुवीकरण चाहिए-कीमत चाहे अशांति क्यों न हो ! लेकिन, किसी साक्ष्य के बिना नेताजी का नाम या पार्टी का नाम लिखना मुनासिब नहीं. सब कुछ शंका- कुशंका, शह-मात के आवरण में है. सतरह हजार वोटर वाले कोडरमा नगर पंचायत में एक कौम के वोटर तेरह हजार तो दूसरी समूह के पांच हजार से थोड़ा कम. आरोप है कि नेताजी को सीधा बंटवारा चाहिए. और इसी बंटवारे के लिए कोडरमा को जलाने की नाकाम कोशिश हुई.

क्या यह प्रशासनिक विफलता है ? 

लेकिन, राय एक -सी नहीं है. ऐसे लोग भी हैं, जो इसे प्रशासनिक विफलता मानते हैं. ऐसे लोग भी हैं, जो एक अधिकारी की हिंदू मानसिकता को दोषी मानते हैं. फिर सच क्या है? पहला सवाल उठा कि मस्जिद के सामने का रुट क्यों तय किया? जवाब हाजिर है कि 37 साल से यही रुट है. दूसरा सवाल कि मस्जिद के सामने 10 मिनट तक जुलूस क्यों रोकी? जवाब है कि इसमें गलत क्या है? साथ में अनुमंडलाधिकारी थे. उन्हें देखना चाहिए था. जवाब यह भी है कि पुलिस-प्रशासन के सामने ही गाड़ी पर चढ़कर डीजे का तार नोंचने की हिमाकत कैसे की? शुरुआत किसने की? क्या किया था-जय श्री राम का नारा ही तो लगा रहे थे ? एक जवाब यह भी है कि अनुमंडलाधिकारी पर सवाल खड़ा करने वाले यह क्यों नहीं देखते कि तल्खी बढ़ने पर उन्होंने ही नौजवानों लड़कों को खुद से धकेल कर जुलूस आगे बढ़ाया. हां, इस सवाल का जवाब नहीं है कि डीजे की मनाही के बावजूद डीजे क्यों था?

नेताओं की पूछपरख बढ़ गई

आज का सच यह है कि नेताओं की पूछपरख बढ़ गई है. किसी पक्ष से ज्यादा तो किसी पक्ष से कम पर तीस से ज्यादा लोग सलाखों के पीछे हैं. सौ से ज्यादा नामजद आरोपी हैं. मां-बाप नेताओं की चिरौरी कर रहे हैं कि बेटे को बचाइए. नौजवान सामाजिक कार्यकर्ता और ओवैसी की पार्टी से जुड़े अली हैदर ने कहा- कुछ लोगों ने गंदा खेल खेला. यह उसी का नतीजा है. एक दैनिक अखबार के संवाददाता संजीव समीर का मानना है कि शांति समिति की बैठक और शांति मार्च के बाद गिरफ्तारी अनुचित है. प्रशासन ने अविश्वास की रेखा खींच दी है. अधिकारी आज न कल चले जाएंगे, भुगतेगी आम जनता. लेकिन, ऐसा नहीं है कि संभलकर बोलने वाले ही हैं. ऐसे लोग भी हैं, जो प्रशासन को, सरकार को सीधे-सीधे हिंदू विरोधी कहते हैं. नगर पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष राजू सिंह ने कहा-` सरकार के निर्देश पर एकतरफा कार्रवाई हो रही है. निर्दोष लोगों को फंसाया जा रहा है. उन्हें भी गिरफ्तार किया, जिनका एक्जाम है. एक की 21 अप्रैल को शादी है. यह हिन्दू विरोधी सरकार है.

जितनी मुंह उतनी बातें  

कोडरमा में ऐसे लोग भी भरे हैं, जो प्रशासन के लिए अच्छे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं. परवेज अहमद पूरे मामले को असामाजिक तत्वों की करतूत कहते हैं. परवेज की नजर में पुलिस-प्रशासन ने मुस्तैदी से अच्छा काम किया. वे कहते हैं : `एसपी साहब का सहयोग मिला. ` परवेज इससे भी इंकार नहीं करते कि यह किसी की साजिश हो सकती है. सामाजिक कार्यकर्ता और आम आदमी पार्टी के नेता हाजी गुलाम जिलानी पूछते हैं कि यह साजिश है, तो इसका मतलब यह हुआ कि पुलिस का सूचना तंत्र कमजोर है. कांग्रेस के नेता सईद नसीम पूरे मामले का ठीकरा अनुमंडलाधिकारी पर फोड़ते हैं. वे कहते हैं कि एसडीओ जिम्मेदार हैं. उन्होंने सरकारी गाइडलाइंस का पालन नहीं करवाया, वहीं कांग्रेस के जिलाध्यक्ष मनोज सहाय कहते हैं कि पत्थर फेंकने वाले, अभद्र नारा लगाने वाले दोषी हैं. बच्चों को बहकाया गया. सरकार निष्पक्ष है. प्रशासनिक अधिकारियों ने बेहतर काम किया.

जीना यहां-मरना यहां 

जितनी जुबान, उतनी बातें. ऐसे भी लोग हैं, जो बोलना नहीं चाहते. ऐसे भी जिन्होंने फोन नहीं उठाए और ऐसे भी जिन्होंने अपना ओपिनियन वाट्सएप पर भेजने की बात की, पर भेजा नहीं. एक-दो की साजिश. भुगत रहे हैं सैकड़ों. अविश्वास की खाईं बनी अलग. इस खाई को भरने में समय लगेगा. बेहतर कि साजिशी चेहरों की पहचान हमें हो. जैसा कि परवेज अहमद ने कहा- साथ खाना है, साथ रहना है. उम्मीद है सब ठीक होगा. हो जाएगा. आमिन ! { लेखक दैनिक भास्कर सहित अनेक अखबारों के संपादक रहे हैं. फिलहाल लगातार मीडिया में स्थानीय संपादक हैं } [wpse_comments_template]

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