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क्यों और कैसे गुम हो रही गंगा-जमुनी तहजीब!

Nishikant Thakur बांग्लादेश देश 1947 तक तो भारत का ही अंग था, लेकिन बंटवारे के दौरान मुस्लिम बहुल होने के कारण पाकिस्तान ने उसे अपने में समेट लिया. ऐसे में बहुत दिनों तक वह पाकिस्तान का अंग रहा. लेकिन, बाद में पाकिस्तान की उच्छृंखलता ने भारत को मजबूर कर दिया कि वह मामले में हस्तक्षेप करे. ऐसे में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और जनरल मानिक शाह की नीति और दूरदर्शिता ने उस पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश बना दिया. जाहिर है, पहले भारत का हिस्सा रहने के कारण वहां हिन्दू भी थे और भारत के अन्य धर्मावलंबी भी रहते थे. देश के बंटवारे के कई कारण थे, जिनमें एक कारण मोहम्मद अली जिन्ना की जिद थी कि उन्हें मुस्लिम राष्ट्र चाहिए. उनकी तो मांग संयुक्त बंगाल भी था, जिसमें कलकत्ता (वर्तमान का कोलकता) तक शामिल था. जबकि महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और सरदार बल्लभभाई पटेल कभी नहीं चाहते थे कि भारत का विभाजन हो. ऐसा इसलिए क्योंकि देश के ये तीनों तत्कालीन सर्वाधिक मान्य, शक्तिशाली और देशहित के सर्वमान्य नेता थे और जिन्होंने देश की आजादी के लिए पुलिस के डंडे सहे. इन्हें जेलों में अपने जीवन के महत्वपूर्ण भाग बिताने के लिए अंग्रेजों ने मजबूर कर दिया. सभी उच्च शिक्षित थे. हालांकि, पढ़े—लिखे और बैरिस्टर तो मुहम्मद अली जिन्ना भी थे, लेकिन उनका सपना देश को खंड-खंड बांटने और कायदेआजम बनने का था. महात्मा गांधी ने तो बंटवारे के लिए कहा था कि यदि भारत का बंटवारा होगा तो उनके शरीर का बंटवारा करना होगा. भले ही आज लोग गांधीजी, नेहरूजी को कोसते हों, लेकिन उनको कोसने के पीछे की वजह देश के इतिहास और सच्चाई से बेखबर होना ही है. भारत के बंटवारे पर असंख्य इतिहासकारों ने किताबें लिखीं और अनेक रहस्योद्घाटन किया है, इसलिए उसपर कुछ लिखना अनावश्यक है. बंटवारे के समय देश में 565 रियासतें थीं, जिनमें हैदराबाद और कश्मीर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रियासतें थीं. अंग्रेजों ने आजादी देते समय सभी रियासतों को पूरी आजादी दी थी कि जो चाहे भारत में या फिर पाकिस्तान में शामिल हो सकते हैं. साथ ही इंग्लैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री चर्चिल ने भारतीय नेताओं पर तंज कसते हुए स्वतंत्रता सेनानियों के लिए कहा था कि कुछ ही दिनों में इन नेताओं के कारण भारत खंड-खंड में विभाजित हो जाएगा और भारत नाम ही विलीन हो जाएगा . लेकिन, हमारे देश के नेताओं के लिए यह एक सीख थी और अपमान था. इसलिए उन्होंने हर हाल में भारत को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठा लिया. फिर आजादी के समय जिस भारत के लिए चर्चिल ने तंज कसा था, यदि आज चर्चित जीवित होता , तो वह भारत की प्रगति को देखकर संभवत: आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता . यहां इस बात का उल्लेख करना अनिवार्य होगा कि आज के भारत को गढ़ने का काम किसी व्यक्ति विशेष ने नहीं, बल्कि राजनेताओं के दिशा-निर्देशन में जनता ने जी-जान लगाकर किया है. भारत को कभी मुस्लिम आक्रांताओं ने लूटा था, लेकिन जब अंग्रेजों का भारत पर शासन कायम हुआ, तो उसने चूसना और अपने लंदन के खजाने को भरना शुरू दिया. जबकि, मुस्लिम यहीं रहकर समर्पित हो गए. उदाहरण के लिए एक विवरण काफी है, जिसे इतिहासकार आचार्य चतुरसेन ने अपनी पुस्तक में लिखा है- `गवर्नर जनरल के कहने पर अंडर सेक्रेटरी ने विवरण सुनाया, तो सबकी आंखें फैल गईं. तीस मन हीरे, छह करोड़ रुपये नकद, दो सौ मन सोना और आठ सौ मन चांदी के अतिरिक्त दिल्ली के मुगल शहंशाह का जग विख्यात तख्ते-ताऊस भी वहां रखा था, जिसकी कीमत सात करोड़ रुपये थी.` जिसे लंदन भेजा जाना था. यह तो एक बानगी है. अंग्रेजों ने भारत को अपने हिसाब से कंगाली के किनारे खड़ा कर दिया. अब जिस पर आज घमासान मचा हुआ है, वह यह कि आजादी काल में हिंदुओं का प्रतिशत पाकिस्तान में 20.05 फीसदी था, लेकिन अब यह प्रतिशत बहुत गिर गया है. अब पाकिस्तान में कुल हिंदुओं की संख्या 1.6 प्रतिशत रह गई है. इसी तरह बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी का लगभग 7.95 प्रतिशत है. वर्ष 2022 में जनगणना के अनुसार, बांग्लादेश में हिंदुओं की संख्या एक करोड़ तीस लाख है. बांग्लादेश में सरकारी कामकाज में ऊंचे पदों पर हिंदुओं को समान अवसर दिया जाता था, लेकिन अब जब से वहां बवाल हुआ, तब से हिन्दुओं के लिए खतरा पैदा हो गया है. रोज हिंदुओं के साथ मार-काट की जा रही है, उनके घर जलाए जा रहे हैं. यह दुखद है. इस मारकाट को ही शेख हसीना को भागकर भारत में शरण लेने का कारण बताया जा रहा है, वहीं कुछ विश्लेषकों का कहना है कि भारत में हिन्दुओं द्वारा मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार की प्रतिक्रियास्वरूप मुसलमानों द्वारा ऐसा अत्याचार बंगला देश में किया जा रहा है. चूंकि बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में भारत ने पूर्ण सहयोग दिया था, इसलिए भारत का अपने पड़ोसी देश होने के कारण सहानुभूति थी. लेकिन, जिस तरह से बांग्लादेश में अब अत्याचार किया जा रहा है, निश्चित रूप से उस पर भारत सरकार को कठोर बात करनी चाहिए. क्योंकि, पाकिस्तान का जन्म ही भारत के विरोध के परिणामस्वरूप हुआ है, इसलिए उससे किसी दोस्ती की बात करना बेमानी होगी. लेकिन, जिस बांग्लादेश को स्वतन्त्रता दिलाने में जीते हुए देश को स्वतंत्र राष्ट्र बना दिया, वहां के शासक से हिन्दुओं पर इस तरह के अत्याचार करने की बात तक सोची नहीं जा सकती. अभी पिछले सप्ताह तो अनियंत्रित सैकड़ों उपद्रवियों की भीड़ चटगांव में जुमे की नवाज के बाद मंदिरों पर टूट पड़ी और ईंट-पत्थर फेंकने लगे. पत्थरबाजी में घायल मिशन के चिन्मय कृष्ण से जेल में मिलने गए दो और संतों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. वैसे, संयुक्त राष्ट्र में बांग्लादेश के स्थायी प्रतिनिधि ने दावा किया है कि देश में अल्पसंख्यकों पर कोई व्यवस्थित हमला नहीं किया गया है. इधर, भारत में हिन्दुओं को खतरे का एहसास कराया जा रहा है और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत नागपुर की एक सभा को संबोधित करने के दौरान कहते हैं कि हर दंपति को कम-से-कम तीन बच्चे पैदा करने की जरूरत है. यदि ऐसा नहीं हुआ, तो कुछ ही वर्षों में देश हिंदू विहीन हो जाएगा . वैसे, अमेरिका के एक अध्ययन में कहा गया है कि 2100 तक भारत विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश होगा. उसके बाद नाइजीरिया होगा. भारत और नाइजीरिया, दोनों चीन को पीछे छोड़ देंगे. चीन की मौजूदा जनसंख्या अब भारत से भी कम हो गई है. इस अध्ययन की भविष्यवाणी है कि चीन की आबादी चार साल में 1.4 अरब हो जाएगी, इसके बाद गिरावट आएगी फिर 73 करोड़ रह जाएगी. भारत की आबादी, जो आज 138 है, 2100 में गिरकर 109 करोड़ रह जाएगी. अतः संघ प्रमुख मोहन भागवत का फिलहाल सोचना तो ठीक है, लेकिन लंबे समय तक यह चल पाएगा, यह असंभव लगता है. वैसे, उन्होंने इशारों—इशारों में देश को आगाह कर दिया है कि यदि हिंदुओं की जनसंख्या कम होगी, तो सनातन विलुप्त हो जाएगा. संघ प्रमुख का देश की जनता को यह आगाह करना कहां तक उचित है और देश का बंटवारा हिंदू-मुसलमानों के बीच क्यों किया जा रहा है? यदि हम बांग्लादेश में उपद्रवियों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का बदला लेने के उद्देश्य से कर रहें हैं, तो यह कतई उचित नहीं है. ऐसा इसलिए, क्योंकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रति हिंदुओं के मन में संरक्षक का भाव है, तो मुसलमानों का भयभीत मन उसे पक्षपाती मानता है. डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं. 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