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विपक्ष को काक्रोच क्यों पसंद है

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बैजनाथ मिश्र

इन दिनों काक्रोच जनता पार्टी को मिल रहे समर्थन के ज्वार की खूब चर्चा हो रही है. कहा जा रहा है कि यह पार्टी युवा वर्ग को आकर्षित कर रही है. विश्लेषकों का मानना है कि हालात 1973-75 जैसे बन रहे हैं. 1973 में भी पश्चिम एशियाई देशों ने तेल को हथियार बनाया था और भारत में संकट की स्थिति पैदा हो गयी थी. उससे पहले मानसून ने दगा दिया था. देश में भयंकर सूखा पड़ा था. खेती-बारी चौपट हो चुकी थी. महंगाई का आलम यह था कि मुद्रास्फीति 30 से 35 फीसदी के बीच झूल रही थी.

 

विदेशी ताकतें तब भी सक्रिय थीं. तब लगभग पूरे देश में कांग्रेस का शासन था. उस समय विपक्ष था तो सिर्फ कहने के लिए. ऐसे में गुजरात के हॉस्टल से उठी छात्रों के एक आक्रोश की चिन्गारी ने सरकार के विरुद्ध कोलाहल पैदा कर दिया. जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एक आंदोलन छिड़ा और इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाना पड़ा. उसके बाद हुए चुनाव में सरकार बदल गयी. जो पार्टी सत्ता में आयी उसका नाम जनता पार्टी था. इसलिए वर्तमान सरकार से खिन्न महानुभावों को लग रहा है कि यह काक्रोच पार्टी भी कमाल दिखायेगी और प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक से क्षुब्ध युवाओं को एक मंच प्रदान करेगी.

 

यदि अलनीनो के प्रभाव के कारण इस बार मानसून फेल हो गया तो यकीन मानिए देश में त्राहि-त्राहि मच सकती है. जब एक स्वघोषित अराजक नेता युवाओं का आह्वान करता है कि वे नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे आंदोलनों से सरकार की चूलें हिला दें तो लगता है कि वह कोई स्क्रिप्ट लिख रहा हैं. "झाड़ू" बिखर गया तो काक्रोच का आना या उसे लाना सहज हो सकता है. काक्रोच वहीं जाता है जहां गंदगी होती है. वह सक्रिय भी अंधेरे में ही होता है. इसलिए संभव है कि गंदगी फैलाने का कोई सुनियोजित प्रयास हो. संभव यह भी है कि विकास के कुछ टिमटिमाते प्रकाश स्तंभों को भी गिराने की कोशिश हो.

 

देश के सबसे बड़े प्रतिपक्षी नेता ने तो भविष्यवाणी कर ही दी है कि सरकार सालभर में गिर जाएगी. हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया है कि सरकार गिरेगी कैसे और इसे गिरायेगा कौन. लेकिन ऐसा लगता है कि उन्हें अपने कुछ देशी-विदेशी संपर्क सूत्रों से यह सूचना मिली हो और तदनुरूप तैयारियां भी शुरु हो गयी हों. बहरहाल, इस काक्रोच पार्टी का जन्मदाता अमेरिका में बैठा है. उसके संगी-साथी भी ज्यादातर विदेशी हैं. ये सभी आभासी दुनिया के सिरमौर हैं. आभासी दुनिया माहौल तो बना सकती है, लेकिन यथार्थ के धरातल पर वह बहुत कुछ तब तक नहीं कर पाती है जब तक उसे व्यापक जन समर्थन प्राप्त न हो. सोशल मीडिया के विश्लेषकों के अनुसार इस काक्रोच जनता पार्टी के समर्थकों में से कम ही भारतीय हैं. तो क्या करोडों विदेशी काक्रोची लोग भारत में बदअमनी फैलाने की हैसियत रखते हैं? इंदिरा गांधी जैसी शक्तिशाली नेता हारीं तो अपनी गलतियों और वह भी चुनाव के जरिये. 

 

इस काक्रोच यानी तिलचट्टा पार्टी का उत्प्रेरक "झाड़ू" का समर्थक रहा है. झाड़ू और काक्रोच एक दूसरे के प्रतिगामी हैं. इसलिए वह अमेरिका भाग गया था. अब काक्रोची स्वभाव उभरा है सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश की एक सटायर टाइप टिप्पणी के कारण. उन्होंने एक तरह से फालतू और पालतू विघ्नसंतोषियों को काक्रोच कह दिया था. इससे काक्रोच समूह स्वयं को अपमानित महसूस करने लगा. इस समय जाति सियासत के सिर पर बैठी है. इसलिए सभी काक्रोची जातिवाले भिनभिनाने लगे. यह कुछ ऐसा ही है जैसे जुगनुओं का एक समूह सूरज को ढ़ंकने के लिए कुलकुलाने लगे. फिर भी यह समूह एक भ्रम जाल तो फैला ही रहा है.

 

हालिया खबर यह है कि लालटेन वाले एक सांसद ने झाड़ूवाले एक सांसद के साथ मिलकर हमारी सेना के कामकाज पर हमला बोला है. एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कई षड्यंत्रकारियों के नथूने फूल गये हैं. वे सुप्रीम कोर्ट पर धावा बोल रहे हैं ठीक वैसे ही जैसे खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे. माहौल बनाया जा रहा है. लेकिन माहौल गाढ़ा भी हो जाय तो उसे अवसर में बदलेगा कौन? ये तिलचट्टे! जिनकी पूंछ ही नहीं होती हैं.

 

हालात जरूर 1973-74 जैसे बन रहे हैं, लेकिन न तो मुकाबले के लिए उस समय जैसे विश्वसनीय नेता हैं ना ही सरकार इमरजेंसी लगाने जा रही है. आप चाहें तो सरकार को कायर या डरपोक कह सकते हैं, क्योंकि उसने बारह साल में किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया है. इंदिरा जी बहादुर थीं. वह धड़ाधड़ राज्य सरकारें बर्खास्त करती थीं. एक समस्या यह भी है कि तब विपक्ष में एक से बढ़कर एक कद्दावर और प्रभावशाली नेता थे. तब मोरारजी, अटल जी, जार्ज, चरण सिंह, जगजीवन राम, चंद्रशेखर सरीखे नेता थे. आज विपक्ष में ऐसे नेता ढ़ूंढ़ते रह जाओगे. इसलिए विपक्ष शायद काक्रोचों पर भरोसा कर रहा है. इस पार्टी का रजिस्ट्रेशन कब होगा, इसके कार्यक्रम कब बनेंगे, इसका मुखिया कौन होगा यह सब साफ नहीं हुआ है. लेकिन उसने बदलाव की लौ जलायी है.

 

विपक्ष में ऐसे नेता हैं जो चारा से लेकर जमीन जायदाद तक खा सकते हैं, प्रधानमंत्री को चोर-चुहाड़, गद्दार कह सकते हैं. उनकी कब्र खुदने की कामना कर सकते हैं, लेकिन न सड़क पर सरकार को घेर सकते हैं, न ही संसद में उसकी बोलती बंद कर सकते हैं. तो उपाय क्या है? उपाय यही है कि गंदगी फैलाओ. गंदगी फैलेगी तो काक्रोच आयेंगे. इतनी भारी संख्या में आयेंगे कि सरकार हलकान हो जाएगी. उम्मीद पर दुनिया कायम है. लेकिन यदि सरकार काक्रोच ही गिरायेंगे तो फिर कांग्रेस, सपा, टीएमसी, राजद वगैरह क्या झाल बजायेंगे और भजन गायेंगे? कमल वाले जायेंगे काक्रोच वाले आयेंगे तो क्या बदल जाएगा?

 

विपक्ष जिस तरह काक्रोचियों के अभियान पर मुदित है, उससे तो यही लगता है कि वह पूरे देश में गंदगी फैलाने या कदम-कदम पर कूड़े के ढ़ेर खड़े कर इन काक्रोचों को प्रोत्साहित करेगा. राष्ट्रहित में यह ठीक भले ही न हो, एक अजेय बनती पार्टी से पिंड तो छूटेगा. लेकिन ऐसा करते समय यह भी ध्यान देना होगा कि कमल भी कीचड़ में ही खिलता है. इसलिए यदि गंदगी तालाबों में जमा की गयी और मानसून ने साथ दे दिया तो कमल की पैदावार बढ़ भी सकती है.

 

खैर, जो होगा सामने ही आ जायेगा, लेकिन विपक्ष सरकार की इस मुहिम की काट तो खोजे जिसका नाम है "भाग घुसपैठिया भाग" जो अभी-अभी लांच हुई है. यह मुहिम दो-तीन साल तक चलेगी ही और तब तक चुनाव आ जायेगा. यदि कोई सोच रहा है कि नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे हालात पैदा हो जायेंगे तो उसे भारत में लोकतंत्र की जड़ों की मोटाई और गहराई तथा व्यवस्थागत ढ़ांचे का ज्ञान नहीं है. 

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