- स्वरा भास्कर फिर निशाने पर!

श्रीनिवास
स्वरा भास्कर फिर से निशाने पर हैं. तात्कालिक कारण/बहाना- स्वरा भास्कर ने ‘जौहर प्रथा’ पर कुछ ऐसा कहा, जो इनको महान हिंदू संस्कृति और परंपरा का अपमान लग गया!
मेरी समझ से मूल कारण- स्वरा भास्कर का विवाह एक मुसलिम से हुआ है, कथित 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' की सदस्य है, अब ‘दिमागी नक्सल.'
दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 31 अगस्त को 'वुमन लाइफ फ्रीडम टॉक' नामक कार्यक्रम में स्वरा भास्कर ने कहा था, ‘जब मैं फिल्म का सीन देख रही थी, जिसमें सभी 800 महिलाएं जौहर करती हैं, तो मैंने सोचा कि यार ईश्वर ना करे लेकिन अगर मैं रेप सर्वाइवर होती तो ये फिल्म आखिर मुझे क्या संदेश दे रही है? मैं कायर जैसा महसूस करती कि मैंने खुद की इज्जत बचाने के लिए अपनी जान, नहीं..’
मुझे नहीं लगा कि स्वरा भास्कर ने कुछ आपत्तिजनक कहा था! इस प्रसंग में कुछ लिखना चाहता था, तो अचानक डॉ लोहिया याद आये. इसलिए भी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विगत 23 मार्च को नई दिल्ली में लोहिया जयंती पर हुए समारोह में उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके विचारों और गरीबों तथा वंचितों के प्रति उनके समर्पण को याद किया था. अनेक ‘लोहियावादी’ अभी मोदी जी के साथ भी हैं! तो लगा, एक बार फिर याद किया जाये कि स्त्री के आदर्श, सती और ‘जौहर’ पर लोहिया क्या सोचते थे. कुछ सामग्री घर में मिली, कुछ ‘गूगल पर!
लोहिया कहते हैं- भारत के पास दो महान स्त्री-आदर्श हैं, पर हमने सिर्फ एक को पूजा, दूसरे को डर के मारे भुला दिया.
सीता- मर्यादा और सहनशीलता का आदर्श. पति-भक्त, मौन, सहने वाली. वो अग्नि-परीक्षा देती है, वनवास झेलती है, धरती में समा जाती है, पर कभी सवाल नहीं करती.
द्रौपदी- विद्रोह और प्रश्न का आदर्श. द्रौपदी 5 पतियों के बीच भी अपनी अस्मिता रखती है, भरी सभा में दुशासन और भीष्म पितामह तक से सवाल करती है- 'धर्म कहां है?' वह रोती नहीं, ललकारती है. कृष्ण से मदद मांगती है, पर भीख नहीं.
लोहिया कहते हैं- द्रौपदी में नारी का ‘अधिकार-बोध’ है. वो अपमान को नियति नहीं मानती, प्रतिशोध और न्याय मांगती है. ‘सीता रुलाती है, द्रौपदी जगाती है, सोचने पर मजबूर करती है.'
मगर लोहिया सीता को नकारते नहीं. कहते हैं- भारत को अगर बंधनों से निकलना है तो सीता के साथ-साथ द्रौपदी को भी अपनाना होगा. सीता के बिना करुणा नहीं आएगी, द्रौपदी के बिना बराबरी नहीं आएगी.’
पर दोनों में से एक चुनना हो, तो नये भारत के लिए द्रौपदी ज्यादा जरूरी है, क्योंकि आज की भारतीय स्त्री को सीता की तरह सहना नहीं, द्रौपदी की तरह सवाल करना सीखना है.
लोहिया का अंतिम निष्कर्ष था- ‘सीता नहीं, द्रौपदी आज की आदर्श है.' ये बातें उन्होंने 1956 में चित्रकूट के रामायण मेले में दिये भाषण में विस्तार से कही, जो बाद में उनकी पुस्तक ‘रामायण पर एक मीमांसा’ में छपी.
सीता अग्नि-परीक्षा खुद देती है, द्रौपदी, अग्नि-परीक्षा की मांग को ही नकारती है, कृष्ण को सखा बनाती है. सीता धरती में समा जाती है, द्रौपदी युद्ध करवाती है, न्याय लेकर ही मानती है.
लोहिया ने कहा- ‘सीता का आदर्श हमें सिखाता है कि औरत को शक की सूरत में खुद को साबित करना चाहिए. द्रौपदी का आदर्श सिखाता है कि मर्द को औरत के सामने जवाबदेह होना चाहिए.’ यह भी कि ‘हिंदुस्तान की औरत को जब तक हर गली में अग्नि-परीक्षा देनी पड़ेगी, तब तक ये देश मर्यादा के नाम पर सड़ता रहेगा.'
लोहिया कहते थे, 1947 के बाद भारत की तीन समस्याएं हैं- गरीबी, जाति और औरत की गुलामी. सीता का मॉडल गरीब और दलित औरत को कुछ नहीं देता, वो सिर्फ सवर्ण घर की बहू को शोभा देता है. इसलिए उनका नारा था- ‘सीता को हृदय में रखो, द्रौपदी को आचरण में लाओ…. मैं द्रौपदी को इसलिए आदर्श नहीं कह रहा कि वो पूर्ण है, बल्कि इसलिए कि उसमें अपूर्णता से लड़ने की हिम्मत है.’
अब जौहर की बात. 'जौहर' पर लोहिया का स्टैंड स्पष्ट और अपने समय के हिसाब से बहुत रेडिकल था. उन्होंने जौहर को कभी ‘सतीत्व’ या ‘वीरता’ के रूप में महिमा मंडित नहीं किया. कहा- ‘जौहर बहादुरी नहीं, पितृसत्ता की मजबूरी थी.’ “मर्द अपना ‘साका’ करता था, युद्ध में मरता था और अपनी औरत को जिंदा जलने के लिए छोड़ जाता था.”
उनके मुताबिक जौहर एक ‘स्वेच्छा’ का काम नहीं था, बल्कि सामंती व्यवस्था का नियम था, जहां औरत की देह को मर्द की इज्जत का गोदाम माना जाता था. हार तय होने पर राजा अपनी संपत्ति (स्त्री) को दुश्मन के हाथ लगने से बचाने के लिए खत्म कर देता था.
वे पद्मिनी-जौहर कथा/प्रथा के सख्त खिलाफ थे. कहते थे- ‘भारत का इतिहास क्षत्रिय, ब्राह्मण और बनिया की कहानियों से लिखा गया है, जिसमें औरत और शूद्र की कोई जगह नहीं.’
उनके मुताबिक “जौहर को ‘राष्ट्रीय गौरव’ बनाना उसी सामंती इतिहास को जिंदा रखना है. अगर हमें नया भारत बनाना है तो हमें चित्तौड़ के जौहर को नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को समझना होगा जिसने औरतों को आग में धकेला.’'
सती, जौहर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. लोहिया के लिए सती प्रथा और जौहर में फर्क नहीं था. दोनों में औरत को मर्द की मृत्यु के साथ खत्म होना पड़ता है. उन्होंने इसे ‘द्विज-पुरुष वर्चस्व’ का सबसे क्रूर रूप कहा.
लोहिया ने कहा, ‘रामायण की सीता और चित्तौड़ की पद्मिनी की अग्नि-परीक्षा पर रोना बंद करो, और आज की औरत को चूल्हे और पर्दे की आग से निकालो. उनके मुताबिक जौहर धर्म नहीं था, युद्ध-अपराध से बचने का त्रासद उपाय था जिसे बाद में वीरता का मिथक बना दिया गया.
स्वरा भास्कर ने भी ‘जौहर’ करने वाली महिलाओं को कायर नहीं कहा, बस इतना कहा कि उनके सामने वैसा मौका आये, तो शायद वह खुदकुशी नहीं कर सकेगी! ऐसा कहना ‘जौहर’ करने वाली रानियों और भरतीय संस्कृति का अपमान है? स्वरा पर नाराज लोग क्या यह मानते हैं कि दुष्कर्म पीड़ित महिलाओं को जीने का अधिकार नहीं.