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झारखंड पुलिस का सूचना तंत्र क्यों हुआ कमजोर, जानें, सिर्फ एक माह में 4800 से अधिक आपराधिक मामले

 Ranchi :  झारखंड में लगातार कमजोर होते पुलिस सूचना तंत्र का असर अब साफ तौर पर दिखाई देने लगा है. पिछले 4 वर्षों में मुखबिर नेटवर्क कमजोर पड़ने के कारण अपराधियों की गतिविधियों की समय पर जानकारी पुलिस तक नहीं पहुंच पा रही है.

 

यही वजह है कि राज्य में केवल एक महीने के भीतर 4800 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं, जिसने पुलिस व्यवस्था और कानून-व्यवस्था दोनों पर सवाल खड़े कर दिये हैं.

 

पहले जहां किसी बड़ी वारदात से पहले ही पुलिस को भनक लग जाती थी, वहीं अब कई मामलों में अपराध होने के बाद भी पुलिस को समय पर सटीक सूचना नहीं मिल रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह पुलिस का कमजोर होता मुखबिर नेटवर्क माना जा रहा है.

 

सूत्रों के अनुसार पहले हर थाना स्तर पर 5 से 6 सक्रिय मुखबिर (स्पाई) हुआ करते थे. इन लोगों को थाना स्तर से हर महीने 5 से 6 हजार रुपये तक दिये जाते थे, जबकि एसपी स्तर से भी करीब 10 हजार रुपये तक प्रोत्साहन राशि मिलती थी.

 

इसी व्यवस्था के कारण पुलिस को अपराधियों की गतिविधियों, अवैध कारोबार, गैंग की हलचल और संभावित घटनाओं की पहले से जानकारी मिल जाया करती थी.

 

लेकिन पिछले करीब चार वर्षों से राज्य के दो तीन जिले छोड़कर मुखबिरों को मिलने वाली राशि लगभग बंद हो चुकी है. क्योंकि झारखंड में नक्सल मुक्त होने के कारण मुखबिरी का पैसा केंद्र सरकार देना बंद कर दिया है,

 

आर्थिक सहयोग बंद होने के बाद अधिकांश लोगों ने मुखबिरी का काम छोड़ दिया. नतीजा यह हुआ कि पुलिस का जमीनी सूचना तंत्र धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया.

 

बताया जा रहा है कि फिलहाल कई थानों में केवल एक-दो मुखबिर ही बचे हैं. सूत्र बताते हैं कि इनमें से कुछ लोग बालू, शराब और अन्य अवैध धंधों से जुड़े लोगों के संपर्क में रहते हैं. ऐसे में निष्पक्ष और मजबूत सूचना नेटवर्क लगभग खत्म होने की स्थिति में पहुंच गया है.

 

पुलिस सूत्रों का कहना है कि पहले अपराध होने से पहले अपराधियों की गतिविधियों, हथियारों की सप्लाई, रंगदारी नेटवर्क और गैंग मूवमेंट तक की जानकारी समय पर मिल जाती थी. अब वही सूचनाएं पुलिस तक नहीं पहुंच पा रही हैं. इसका सीधा असर अपराध नियंत्रण पर पड़ रहा है.

 

हालांकि कुछ थाना प्रभारी अभी भी अपने स्तर से निजी खर्च पर एक-दो मुखबिरों को सक्रिय रखे हुए हैं, लेकिन उनका उपयोग अधिकतर स्थानीय स्तर के काम और सीमित सूचनाओं तक ही सिमट कर रह गया है। बड़े आपराधिक संगठनों और अंतरजिला गिरोहों की गतिविधियों पर निगरानी पहले जैसी मजबूत नहीं रह गयी है.

 

जानकारों का मानना है कि यदि पुलिस को फिर से मजबूत सूचना तंत्र खड़ा करना है तो मुखबिर नेटवर्क को व्यवस्थित तरीके से पुनर्जीवित करना होगा. क्योंकि किसी भी राज्य में अपराध नियंत्रण की सबसे मजबूत कड़ी जमीनी खुफिया सूचना ही मानी जाती है.

 

 

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