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क्या ‘जीत की मशीन’ को मिलेगी चुनौती!

Shyam Kishore Choubey पटना में 23 जून को प्रस्तावित बैठक 2014 के बाद विपक्षी एकजुटता के लिए सबसे बड़ा प्रयास है. 2024 के अप्रैल-मई में होनेवाले लोकसभा चुनाव के लिहाज से विपक्षी दलों का यह प्रयास सफल रहा तो ‘जीत की मशीन’ भाजपा को चुनौती देता नजर आएगा. 2024 से पहले हिमाचल और कर्नाटक में भाजपा की हार और मणिपुर में डबल इंजन की सरकार की विफलता ‘जीत की गारंटी वाली मोदी-शाह की जोड़ी’ पर सवालिया निशान लगा चुकी है. शायद इसीलिए संघ के मुख पत्र ऑर्गनाइजर में इसके संपादक प्रफुल्ल केतकर ने क्षेत्रीय नेतृत्व को बढ़ावा देने की पैरोकारी करते हुए हाल ही में लिखा है, ‘चुनाव जीतने के लिए मोदी का करिश्मा और हिंदुत्व काफी नहीं’. वे यहीं नहीं रुके और ‘कर्नाटका रिजल्ट्स : ऑपर्ट्यून टाइम फॉर इन्ट्रोस्पेक्शन’शीर्षक आलेख में आगाह भी किया ‘पिछले नौ सालों में ऐसा पहली बार हुआ, जब विधानसभा चुनाव में भाजपा को भ्रष्टाचार के आरोपों के सामने खुद का बचाव करना पड़ा’. उधर विपक्षी एकजुटता के प्रयास और इधर हर दिन चुनाव के लिए तैयार रहने की बातें करनेवाली भाजपा को पुराने संगी-साथियों की आ रही याद में काफी एकरूपता है. जदयू अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह ‘ललन’ ने बैठक के भागीदार 17 दलों के नाम 11 जून को गिनाये. इन नामों से प्रतीत होता है कि टीएमसी, आप, सपा, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी आदि के जो क्षेत्रीय क्षत्रप अपने प्रभावक्षेत्र में दूसरे दलों से ताल ठोंकते नजर आते हैं, वे भी भाजपा के विरोध में इस बैठक में आएंगे. टीएमसी की ममता दीदी को तकलीफ कांग्रेस से है, लेकिन बंगाल में भाजपा उनको कड़ी चुनौती पेश कर रही है. इसलिए वे कांग्रेस के प्रति थोड़ा नरम रवैया अपना सकती हैं. अखिलेश यादव कांग्रेस को मित्र नहीं मानते, लेकिन जदयू से उनकी दोस्ती जरूर है. टीडीपी वाले चंद्रबाबू नायडू कभी इधर, कभी उधर की नीति पर चलते हैं. इस बैठक में ओवैसी के आने की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि उनकी राजनीति भाजपा को ही अधिक फायदा पहुंचाती रही है. जो इस बैठक में नहीं आएंगे, उनमें बीजद के नवीन पटनायक प्रमुख हैं. उन्होंने नीतीश-तेजस्वी से पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वे भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी बरतते हैं. नवीन एकला चलो की नीति पर अमल करते नजर आते हैं, लेकिन उनका एक सिरा भाजपा के लिए हमेशा खुला रहता है. संसद में वक्त-जरूरत वे भाजपा का समर्थन करते रहे हैं. बदले में केंद्र से ओडिशा के लिए ‘रिटर्न गिफ्ट’लेते रहे हैं. फिर भी उनको अधिक डर भाजपा से ही है. हाल ही जिला परिषद चुनाव में उन्होंने डोर थोड़ी ढीली छोड़ दी तो भाजपा ने अपने लिए जगहें बना ली. उड़ती खबर यह भी है कि ओडिशा में ऑयरन ओर के अवैध खनन और समुद्री रास्ते से निर्यात का कच्चा चिट्ठा केंद्रीय एजेंसियों के हाथ लगा है, जिससे भी बीजद बैकफुट पर है. ऐसा ही किस्सा कभी भाजपा के खिलाफ आग उगलनेवाले बीआरएस के केसीआर (के. चंद्रशेखर राव) का है. आप पार्टी जब बरास्ता दिल्ली पंजाब और गुजरात पहुंच गई तो उन्होंने भारत विजय के गुमान में पिछले साल अपने दल टीआरएस का नाम बदलकर भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) कर दिया था. उन्होंने दिल्ली में बड़ा सा दफ्तर बनवाया और महाराष्ट्र में रैलियां की. उनको लगा कि पूरा देश तेलंगाना या आंध्र है. इसी बीच दिल्ली के बहुप्रचारित शराब घोटाले के तार उनकी बेटी कविता से भी जोड़ दिये गये. ईडी के रडार पर बेटी के आते ही कविता के पिता टूट गये. अब उनको भाजपा की बी टीम कहा जाने लगा है. वे पूरे महाराष्ट्र के बजाय कांग्रेस के प्रभुत्व वाले विदर्भ पर केंद्रित हो गये हैं. भाजपा के साथ बतौर एनडीए जुड़े अकाली, शिंदे-सेना, महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी आदि इस बैठक में आएंगे नहीं. कर्नाटक की जेडीएस को लगने लगा है कि कांग्रेस उसको खा गई. इसी कारण वह भाजपा के संग विपक्ष में है. हरियाणा की जेजेपी भाजपा के ही साथ है. आंध्र में सत्ताधारी जगन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के कई केस ईडी के हाथों में हैं. बसपा वाली बहनजी यदि पटना आतीं तो उनकी फाइलें फिर से खुलने का अंदेशा बन जाता. विपक्षी दलों की पटना बैठक चुनाव पूर्व एकजुटता कायम कर पाएगी, ऐसा आवश्यक नहीं है, लेकिन एनडीए पर प्रेशर जरूर बनायेगी. ऐसे भी 2024 के चुनाव में वन टू वन चुनौती देने में कई दलों का हित टकराएगा. जो वामदल बंगाल में कांग्रेस के साथ हैं, वे केरल में क्या करेंगे? 2019 याद करें तो 545 के मुकाबले कांग्रेस भले ही 55 सीटें जीत पाई थी, लेकिन 220 सीटों पर वह एनडीए के सामने रही थी. ऐसे में वह 220 के बाद की सीटों पर सामंजस्य की बातें करे शायद. इसलिए इस बैठक के परिणाम पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसे एक शुरुआत तो माना ही जा सकता है. इतना जरूर है कि दिसंबर तक मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, मिजोरम में होनेवाले चुनावों में विपक्षी दलों का स्वार्थ आड़े नहीं आएगा. इन चुनावों में एनडीए को नुकसान होता है तो बाद के तीन-चार महीनों में होनेवाले लोकसभा चुनाव के लिए माहौल जरूर बन जाएगा. भाजपा के पास मनी, मीडिया, मसल पावर, मशीनरी और मोदी जैसे पांच तत्व हैं. इधर? इसी सवाल का जवाब इस बैठक से निकल सके तो 2024 का चुनाव दिलचस्पी की हदों तक जा पहुंचेगा. अब 2014 और 2019 वाला न तो विपक्ष है, न ही कांग्रेस. फिर भी सवाल है, ‘बोल राधा बोल, संगम होगा कि नहीं’. यूं, कर्नाटक चुनाव ने दिखा दिया कि असुरक्षा की भावना बढ़ने पर आदमी किस कदर हनुमान चालीसा पढ़ने लगता है. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]

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