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झारखंड पुलिस जांच कर कार्रवाई करेगी या भरत तिवारी जैसी किसी घटना का इंतजार !

कांग्रेस के पूर्व प्रदेश महसचिव और युवा इंटक के राष्ट्रीय महसाचिव सह प्रदेश अध्यक्ष ऋषिकेश मिश्र ने फेसबुक पर एक टिप्पणी लिखी है. उन्होंने अपने गृह जिला गिरिडीह में पुलिसिया कार्रवाइयों व अफसरों की कथित मनमानी पर सवाल उठाये हैं. अवैध कारोबार को संरक्षण देने से लेकर बेकसूरों को परेशान करने तक के तथ्य लिखे हैं. अपने पोस्ट को उन्होंने झारखंड पुलिस को भी टैग किया है. पता नहीं झारखंड पुलिस मुख्यालय इन टिप्पणियों, तथ्यों को पढ़ती भी है या नहीं. पर यह सवाल तो है ही कि क्या झारखंड पुलिस जांच करके कार्रवाई करेगी या बिहार के भोजपुर में जिस तरह भरत तिवारी को मार दिया गया और एक तूफान खड़ा हो गया, वैसी ही किसी घटना का इंतजार करेगी. 
पढ़ें, Rishikesh Mishra की पोस्ट....



हमारे गृह जिला में भी कुछ पुलिस ऑफिसर खुद को इनकाउंटर स्पेशलिस्ट समझने लगे हैं. आम जनता को जेल भेजने और गोली मारने को धमकी आए दिन देते रहते हैं. दुख इस बात की है कि इनकी ट्रेनिंग के दौरान इनको पुलिस मैनुअल नहीं पढ़ाया जाता है अथवा अगर पढ़ाया जाता है तो ये पुलिस अधिकारी पढ़ना नहीं चाहते और अगर पढ़ लिए हैं तो अपने आप को पुलिस से ऊपर समझते हैं. ऐसे ही एक डीएसपी ने एक साल पूर्व गिरिडीह प्रखंड की एक पंचायत के पंचायत समिति सदस्य, कांग्रेस कार्यकर्ता व हमारी यूनियन के पदाधिकारी को मुफ्फसिल थाना में बैठा दिया. पंचायत समिति सदस्य के साथ बर्बरता पूर्ण मारपीट भी डीएसपी व एक दारोगा ने की थी. बाद में राज्य सरकार के मंत्री के काफी दबाव देने पर पंचायत समिति सदस्य को छोड़ा गया था. 


जब मामला मानवाधिकार आयोग व एसटीएससी आयोग गया तो पुलिस के वरीय अधिकारियों ने अपने डीएसपी व एक दरोगा को बचाने के लिए पूरी ताकत लगा दी. अंततः न्याय नहीं मिला पंचायत समिति सदस्य को और जीत हुई उसी डीएसपी और दरोगा की. 


उसके बाद देखिए डीएसपी का आत्मविश्वास और बढ़ गया. उसी डीएसपी द्वारा एक सप्ताह पहले मेरे बचपन के मित्र जिले के सम्मानित नेता व सामाजिक कार्यकर्ता के साथ भी उसी तरह का व्यवहार किया गया. मुझे मालूम है न्याय इनको भी नहीं मिलेगा. क्योंकि सिस्टम ही खत्म हो गया है. जो इस सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाएगा उसको सिस्टम के लोगों द्वारा झूठे मुकदमे में जेल भेज दिया जाएगा. 


ऐसा ही हुआ सीसीएल कब्रीबाद खदान में. लड़ाई हुई दो गुटों में. मामला दूसरा था, लेकिन जेल सीसीएल के ईमानदार अधिकारी को जाना पड़ा. भेजने वाला यही पुलिस अधिकारी था. किसके प्रेसर में पुलिस अधिकारी ने सीसीएल अधिकारी को जेल भेजा यह सभी जानते हैं.  उसी मामले में दो युवकों को जेल भेज दिया गया, दोनों बालिग ही हुए थे. अगर प्रशासन उनसे संवाद करता, तो शायद वो बातों को समझते. उनको भी समय नहीं दिया गया. बिना जांच के जेल भेज दिया गया.


इसी प्रकार एक आदिवासी महिला की जमीन पर करोड़ों का अवैध कोयला कारोबार चल रहा है. महिला ने अपनी बातों को बताते हुए मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक को पत्र भेजा, जांच भी हुई. जांच करने वाला वही भ्रष्ट पुलिस अधिकारी, जो हर दिन वहां से अपना हिस्सा उठाता है. उसने मामले को रफा-दफा कर दिया. 


सबडिवीजनल मजिस्ट्रेट ने उक्त जमीन पर 144/163 की प्रोसीडिंग भी चलाई. उक्त जमीन पर किसी भी तरह के कार्य करने पर रोक लगी. परंतु पुलिस के मदद से उक्त जमीन पर कोयला का अवैध कारोबार चलता रहा. बेचारे सब डिविजनल मजिस्ट्रेट भी मूकदर्शक बन गए. 


हम जैसे लोग सत्ता की लोलुपता में अथवा डर से खुल कर आवाज भी नहीं उठा सकते. क्योंकि लालच इस बात का कि सत्ता में अपनी सरकार के खिलाफ आवाज कैसे उठायें. अगर किसी ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाई, तो उसे पूर्व मंत्री स्वर्गीय ददई दुबे के समान पार्टी से निष्कासित कर दिया जाएगा. अथवा योगेंद्र साव के समान पार्टी से निष्कासित कर दिया जाएगा. सोचिये हम तो ठहरे अदना सा कार्यकर्ता. इसी बात का लाभ नौकर सब उठाते हैं. 
हां, ईमानदार पुलिस अधिकारी भी हैं, जिनको संटिंग पोस्ट पर बैठा दिया जाता है. बेईमानों को कोयला, लोहा, जमीन, मांस का अवैध कारोबार से पैसा तसीलने के लिए लगा दिया जाता है. अगर कोई युवा इन लोगों के विरुद्ध आवाज उठाता है अथवा जन संघर्ष करता है, तो उनका एनकाउंटर कर दिया जायेगा.


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