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क्या विपक्ष सामूहिक तौर पर भाजपा को चुनौती पेश करने वाली बेहतर रणनीति बना सकेगा !

Faisal Anurag विपक्ष की राजनीति में पिछले एक साल में दो महत्वपूर्ण बदलाव दिख रहे हैं. पहला  जहां भी स्थानीय सांस्कृति सवाल और वंचितों  के आर्थिक हक के सवाल उठे हैं वहां भाजपा को कामयाबी नहीं मिली है. जैसे केरल, तमिलनाडु बंगाल और 2015 में बिहार.  दूसरा बदलाव यह है कि छोटे राज्यों में  विपक्ष को मिली कामयाबी का असर दूसरे छोटे राज्यों पर भी दिख रहा है. बंगाल में जिस गति से भाजपा ने प्रचार किया और हर तरह के हथकंडे अपनाया लेकिन वह ममता बनर्जी की ब्यूहरचना को भेद नहीं पायी. पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत भी गैर मामूली है और आधे अधूरे राज्य की शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रयोगों को विस्तार का मौका मिला है. तमिलनाडु की राजनैतिक कहानी के भी खास निहितार्थ हैं और वह यह है कि एम के स्टालिन ने समाजिक तानेबाने में वंचना के शिकार समुदायों की हिस्सेदारी का वह प्रयोग कर दिखाया है जिसका असर दक्षिण के अन्य राज्यों पर भी पड़ सकता है.ममता बनर्जी तो पहले से ही कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को चुनौती पेश करती रही हैं अब इसके एक और दावेदार उभर कर समाने आ गए हैं. वे हैं अरविंद केजरीवाल. 2013 में अरविंद केजरीवाल पहली बार कांग्रेस के सहयोग से ही मुख्यमंत्री बने थे. तीन महीने बाद ही अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद छोड़ कर संदेश दिया कि वे अकेले ही अपनी पार्टी को सत्ता में लाने का प्रयत्न करेंगें. उन तीन महीनों में जब कि केंद्र में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार थी, उसने केजरीवाल पर किसी तरह का अंकुश नहीं लगाया. लेकिन तीन महीनों में ही केजरीवाल ने यह दिखाया कि भ्रष्टाचार और विकास को लेकर उनके पास ठोस इरादे हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की जबरदस्त जीत हुयी. 2025 के जनवरी फरवरी में दिल्ली विधान सभा के चुनाव हुए तब माना जा रहा था कि दिल्ली की सातों लोकसभा सीट भारी बहुमत से जीत जाने वाली भाजपा के समाने आम आदमी पार्टी धराशायी होगी. लेकिन हुआ उल्टा. नरेंद्र मोदी के अपराजेय छवि को पहली चुनौती दिल्ली में केजरीवाल ने ही दिया. नरेंद्र मोदी और अमित शाह के अपराजेय को दक्षिण के राज्यों के साथ बंगाल, मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान ने भी कालक्रम में दिए. लेकिन इसके पहले बिहार में भी मोदी की यह छवि प्रभावित हुयी. अब तो आम आदमी पार्टी एक आधे अधूरे कम अधिकार वाले राज्य से निकल कर पूर्ण राज्य की सत्ता तक पहुच गयी है. जाहिर है कि 2022 का भारत बहुत बदल चुका है. आम जीवन के इन बदलावों को समझे बगैर भारत की राजनीति में विपक्ष के पास कोई रास्ता नहीं है. नॉबेल पुरस्कार विजेता लोककवि बॉब डिलन के इस पंक्ति से विपक्ष के नेताओं को सीखने की जरूरत है कि ‘जवाब मेरे दोस्त, हवा में तैर रहे हैं’. विपक्ष का जो भी राजनैतिक दल हवा में तैर रहे जबाव को समझने में कामयाब होगा वह आने वाले सालों में भाजपा को चुनौती देगा. भाजपा ने बड़ी सावधानी और सुनियोजित तरीके से परिवारवाद और हिंदू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नरेटिव को खड़ा किया है. अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल में हिंदू अर्थशास्त्र का नरेटिव भी पेश किया गया था. आरएसएस ने अब एक नया नरेटिव भारतीय आर्थिक मॉडल का खड़ कर दिया है. क्या विपक्ष इन तरह के तमाम नरेटिव के बिना समानांतर नरेटिव प्रस्तुत करने का हौंसला और दक्षता दिखा सकता है. इसी के जवाब में भविष्य की राजनीति में नरेंद्र मोदी की अपराजेय छवि को चुनौती दे सकने की संभावना बलबती होगी. द प्रिंट के संपादक शेखर गुप्त ने ठीक ही कहा है ​ कि मोदी की अपराजेय छवि को चुनौदी दी सकती है. लेकिन वह तभी संभव है जब विपक्ष संजीदगी के साथ वोटरों के बीच नए और बेहतर सपने को जगाये. पंजाब में कांग्रेस की आपसी गुटबंदी तो है लेकिन उससे बड़े कारण केजरीवाल का वह दिल्ली मॉडल है जिसे लेकर विपक्ष शासित राज्य कभी सजग नहीं होते. ममता बनर्जी की जीत भी बंगाली राष्ट्रवाद और ममता मॉडल के विकास का ही नतीजा था. यह वह दौर है जब भाजपा अपनी नाकामयाबी को भी कामयाबी बता कर पेश सकती है और लोग उस पर विश्वास करते हैं. हालांकि उत्तर प्रदेश में उसे पचास सीटों का नुकसान उठना पड़ा लेकिन सरकार विरोधी रूझान को भी उसे बड़े तरीके से कामयाबी का सूत्र बना कर पेश कर दिश.यह हुनर बताता है कि भाजपा के पास जीतने की मशनरी 365 दिन सक्रिय है जबकि विपक्ष के ज्यादातर दल चुनाव के ठीक पहले सक्रिय होते हैं. जातियों के वोट को टेकेन फार ग्रांटेड समझने की प्रवृति से भी विपक्ष को जल्द ही बाहर आना होगा. कांग्रेस की कार्यसमिति चुनौतियों को एकबार फिर समझने में नाकायामब रही. कपिल सिब्बल ने तो साफ ही कह दिया कि गांधी परिवार के तीनों व्यक्तियों को छोड़ कर ही किसी को नेतृत्व देना चाहिए और शशि थरूर ने मोदी की सक्रियता की बात कर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर परोक्ष हमला कर दिया है. कार्यसमिति यह समझने में नाकामयाब साबित हो रही है कि आखिर कांग्रेस पिछले आठ सालों में 40 में से 35 चुनाव क्यों हार गयी. दरअसल जमीनी नेताओं की कमी और ठोस हालातों का विश्लेषण करने के साहस का अभाव कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या और वह इस पर खुल कर सामूहिक विचार करने को तत्पर भी नहीं दिख रही है. आम आदमी पार्टी ने गुजरात और हिमाचल प्रदेश के साथ हरियाणा विधानसभा के लिए रणनीति पेश कर दी है. स्पष्ट है कि विपक्ष के पास सामूहिक नरेटिव तैयार करने का हौसला अब तक नहीं दिख रहा है.  

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