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विश्व गौरैया दिवस: अरी ओरी, मेरी भोर की चिरैया गौरैया

Amarnath Pathak कभी आंगन में फुदकते हैं, कभी खिड़कियों पर कलरव करते हैं, शहर में हम कहां जाएं, प्रदूषण, तापमान और तरंगों से इस कदर डरते हैं…जी हां, हम उस नन्हे और प्यारे पक्षी गौरैया की बात कर रहे हैं, जो शनै: शनै: विलुप्ति के कगार पर पहुंच रहे हैं. गांवों में तो फिर भी अनुकूल वातावरण मिल जाता है. लेकिन शहर में बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं, बढ़ते प्रदूषण और मोबाइल टावर की तरंगों ने तो जीना दुश्वार कर दिया है. यही वजह है कि गौरैया के संरक्षण के लिए देशभर में बुद्धिजीवियों ने मुहिम भी छेड़ रखा है. शहर के घर-आंगन में इन दिनों सन्नाटा पसरा रहता है. अटरिया पर चहकने वाली चिड़िया रानी (गोरैया) न जाने कहां गायब हो गई है. बदलते वक्त के साथ इन पर भी शामत आ गई. अपने स्वार्थ के लिए लोग जहां इनका शिकार करने लगे, वहीं कीटनाशक दवाओं के बढ़ते इस्तेमाल ने इनकी दुनिया ही उजाड़ दी.  इस कारण पर्यावरण संतुलन में अहम किरदार निभाने वाली गौरैया लगातार कम हो रही है. गौरैया की छह प्रजातियां https://lagatar.in/wp-content/uploads/2023/03/Untitled-337.jpg"

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शहरी इलाकों में गौरैया की छह प्रजातियां हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसेट स्पैरो, डेड सी स्पैरो और ट्री स्पैरो हैं. इनमें हाउस स्पैरो को गौरैया कहा जाता है. यह गांवों में ज्यादा पाई जाती हैं. आज यह विश्व में सबसे अधिक पाए जाने वाले पक्षियों में से है. लोग जहां भी घर बनाते हैं, देर-सवेर गौरैया के जोड़े वहां रहने के लिए पहुंच ही जाते हैं.

सुपर मार्केट घटा रही संख्या, अब पंसारी की दुकानें कहां https://lagatar.in/wp-content/uploads/2023/03/Untitled-338.jpg"

alt="" width="600" height="400" /> पिछले कुछ वर्षों में शहरों में गौरैया की कम होती संख्या पर फिक्र जताई जा रही है. आधुनिक स्थापत्य की बहुमंजिली इमारतों में गौरैया को रहने के लिए पुराने घरों की तरह जगह नहीं मिल पा रही है. सुपरमार्केट संस्कृति के कारण पुरानी पंसारी की दुकानें घट रही हैं. इससे गौरेया को दाना नहीं मिल पा रहा है. इसके अतिरिक्त मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगों को भी गौरैयों के लिए हानिकारक माना जा रहा है. ये तरंगें चिड़ियां की दिशा खोजने वाली प्रणाली को प्रभावित कर रही हैं और इनके प्रजनन पर भी विपरीत असर पड़ रहा है. इसके परिणाम स्वरूप गौरैया तेजी से विलुप्त हो रही है. बच्चों को कीड़े के रूप में लार्वा नहीं मिल रहा है. फसलों में केमिकल का प्रभाव कीड़ों पर पड़ता है और बच्चे वही मरे हुए कीड़े लार्वा के रूप में खाते हैं. इससे उनका जीवन प्रभावित होता है.  

बढ़ते तापमान से जीना दुश्वार

गौरैया को घास के बीज काफी पसंद होते हैं, जो शहर की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से मिल जाते हैं. ज्यादा तापमान गौरैया सहन नहीं कर सकती. प्रदूषण और विकिरण से शहरों का तापमान बढ़ रहा है. भोजन और घोसले की तलाश में गौरैया शहर से दूर निकल रही हैं और अपना नया आशियाना तलाश लेती हैं. चीन झेल चुका है दंश, रूस से मंगानी पड़ी थी गौरैया https://lagatar.in/wp-content/uploads/2023/03/Untitled-339.jpg"

alt="" width="600" height="400" /> सोशल मीडिया पर जारी एक स्टोरी के अनुसार 1958 में चीन गौरैया के खत्म होने का दंश झेल चुका है. चीन में उस वक्त गौरैया, मच्छर, मक्खी और चूहा मारने का अभियान शुरू हुआ था. 1960 तक चीन से गौरैया पूरी तरह खत्म हो गई. दरअसल माओ का मानना था कि एक गौरैया चार किलोग्राम अनाज बर्बाद करती है. नतीजतन फसलों का उत्पादन घट गया. चीन में भूखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गई. तब चीन के वैज्ञानिकों ने जांच शुरू की और गौरैयों का पोस्टमार्टम किया. उनके पेट से फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले अल्फा और कटवर्म नामक कीड़े मिले. फिर रूस से गौरैयों का आयात किया गया. उसके बाद 1960 में गौरैया मारने का अभियान वापस लिया गया. पर्यावरण को बेहतर बनाने में गौरैया की अहम भूमिका, कहलाते हैं फार्मर फ्रेंड https://lagatar.in/wp-content/uploads/2023/03/Untitled-340.jpg"

alt="" width="600" height="400" /> पर्यावरण को बेहतर बनाने में गौरैया की अहम भूमिका है. गौरैया अल्फा और कटवर्म नामक कीड़े खाती है, जो फसलों के लिए बेहद हानिकारक होते हैं. गौरैया पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के साथ-साथ यह किसानों के मित्र भी हैं. गौरैया का पर्यावरण पर भी सीधा असर पड़ता है. यह ऐसा पक्षी है, जो मनुष्य यानी मानव आबादी के साथ ही रहना पसंद करती है. झारखंड के 182 जगहों पर सर्वेक्षण, संरक्षण की दी नसीहत नियो ह्यूमन फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ सत्यप्रकाश और बनारस सिंह ने झारखंड के 182 जगहों पर गौरैया का सर्वेक्षण किया. यह सर्वेक्षण वर्ष 2005 से किया जा रहा है. डॉ सत्यप्रकाश ने बताया कि रांची, हजारीबाग, झुमरीतिलैया, साहेबगंज के उदवा, जमशेदपुर के दलमा, मैथन समेत 75 जगहों पर उन्होंने गौरैया का सर्वेक्षण किया है. वहीं बनारस सिंह ने 107 जगहों पर सर्वे कर गौरैया की रिपोर्ट तैयार की है. डॉ सत्यप्रकाश कहते हैं कि शहर में मकान के छज्जों पर कूट का घर बनाकर उसमें दाना-पानी का जुगाड़ कर दें. इससे गौरैया आएगी. चूंकि शहर से कुएं का कल्चर भी खत्म हो गया है और छप्पर वाले घर भी गिनती के मिलते हैं. गौरैया इसी परिवेश में रहना पंसद करती है. वह कुएं और छप्पर वाले घरों पर अपना घोसला बनाती है. शहर में उनके अनुकूल वातावरण देने से उनकी संख्या में बढ़ोतरी होगी. दिल्ली और बिहार में राजपक्षी घोषित है गौरैया https://lagatar.in/wp-content/uploads/2023/03/Untitled-341.jpg"

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देश की राजधानी दिल्ली और बिहार में गौरैया राजपक्षी घोषित है. गौरैया के बचाने की कवायद में दिल्ली और बिहार सरकार ने इसे राजपक्षी घोषित किया है. पीएम मोदी ने तो गौरैया संरक्षण के लिए राज्यसभा सांसद बृजलाल के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा, “बहुत खूब ! आपका यह प्रयास हर किसी को प्रेरित करेगा.” राज्यसभा सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी ने ट्विटर पर एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि हमारे आवास में गौरैया. उन्होंने आगे बताया कि उनके आवास में 100 से अधिक गौरैया हैं, जिसपर पीएम मोदी ने उनके ट्वीट पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज की. नीदरलैंड में रेड लिस्ट में गौरैया, 60 से 80 फीसदी तक गिरावट दर्ज वर्ष 2010 से हर साल 20 मार्च को गोरैया दिवस मनाया जाता है. गौरैया की संख्या में बहुत तेजी से कमी आ रही है. पूरे यूरोप में सामान्य रूप से दिखाई पड़ने वाली इन चिड़ियों की संख्या लगातार घट रही है. स्थिति इतनी गंभीर है कि नीदरलैंड ने इन्हें रेड लिस्ट में रखा है. वहीं ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चेक गणराज्य, बेल्जियम, इटली तथा फिनलैंड के शहरी इलाकों में भी गिरावट दर्ज की गई है. वर्तमान में गौरैया की संख्या में 60 से 80 फीसदी तक की कमी दर्ज की गई है. डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं.

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