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वाह लेखन मुंडा... देख नहीं सकते, पर अपनी बांसुरी की तान से कर देते हैं सबको मंत्रमुग्ध

Ranchi :  संगीत की कोई भाषा और सीमा नहीं होती है, इस कहावत को रांची के बड़मु प्रखंड के समुबारुबेड़ा गांव निवासी लेखन प्रकाश मुंडा ने सच कर दिखाया है. लेखन प्रकाश मुंडा दृष्टिहीन होने के बावजूद अपनी बांसुरी की मधुर तान से न केवल झारखंड में, बल्कि दिल्ली, मुंबई, ओडिशा, हरियाणा सहित अन्य राज्यों में अपने हुनर का जादू बिखेरा है. 

 

दिल्ली से राजभवन तक गूंजी लेखन की बांसुरी

आज लेखन प्रकाश मुंडा की बांसुरी की मधुरता राजभवन, विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय मंचों तक पहुंच चुकी है. उन्होंने रांची विश्वविद्यालय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों विशेषकर करम पर्व में अपनी प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया है. 

 

करम पर्व जैसे सांस्कृतिक आयोजनों में लेखन प्रकाश की बांसुरी एक अलग ही समा बांध देती है.  उनकी धुनें न सिर्फ आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत करती हैं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि अंधकार में भी संगीत रौशनी की राह दिखा सकता है.

 

दृष्टिहीनता को नहीं बनने दिया कमजोरी

महज 12 साल की उम्र में आंखों की बीमारी (फुंसी) की वजह से लेखन प्रकाश अपनी दृष्टि खो बैठे, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. इस अंधकार के बीच उन्होंने बांसुरी को जीवन की रौशनी बना ली. 

 

उन्होंने अपनी पढ़ाई की शुरुआत हरमू स्थित नेत्रहीन विद्यालय से की और आगे की पढ़ाई दिल्ली में पूरी की. वर्तमान में वे रांची विश्वविद्यालय से मुंडारी भाषा में पीएचडी कर रहे हैं. लेखन प्रकाश मुंडा ने साल 2008 से बांसुरी बजाना शुरू किया.

 

उन्हें इस राह पर चलने की प्रेरणा अपने बड़े भाई कांडे मुंडा से मिली, जो खुद भी एक अच्छे बांसुरी वादक हैं. आज वह आदिवासी समाज के लिए एक मिसाल बन चुके हैं.

 


संघर्षों भरा जीवन, लेकिन संगीत से समझौता नहीं

लेखन प्रकाश एक साधारण किसान परिवार से आते हैं और उनका जीवन संघर्षों से भरा है. परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं और आज भी उनका जीविकोपार्जन खेती-बाड़ी से ही चलता है. संसाधनों की कमी के बावजूद, उनका संगीत के प्रति समर्पण अटूट है.

 

बांसुरी से फैलाते हैं संस्कृति और उम्मीद की रोशनी

मुंडा जनजाति से तालुख रखने वाले लेखन प्रकाश न केवल बांसुरी, बल्कि मुंडारी गीत, ढोल, नगाड़ा और मांदर जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों के भी माहिर कलाकार हैं. उनकी प्रस्तुतियां आदिवासी संस्कृति को जीवंत करती हैं और युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करती है. 

 

 

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