
बैजनाथ मिश्र
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर बेहद गंभीर टिप्पणी की है. कोर्ट का मानना है कि ममता ने आठ जनवरी 2026 को चुनाव एजेंसी आई पैक के दफ्तर में इडी अधिकारियों की जांच प्रक्रिया में जिस तरह बाधा डाली, वह लोकतंत्र के लिए खतरा है. स्वतंत्र भारत में शीर्ष न्यायपालिका ने आज तक किसी भी मुख्यमंत्री के लिए ऐसी टिप्पणी नहीं की है. बावजूद इसके न ममता बनर्जी शर्मसार हैं, न उनके हिमायती और ना ही लोकतंत्र की रक्षा के लिए दिन रात गाल बजाते बुद्धिवादी.
यह टिप्पणी ऐसे समय में आयी है जब बंगाल में चुनाव हो रहे हैं और पहले चरण के मतदान के दौरान जगह-जगह से झड़प की खबरें आयी हैं. झड़प हो भी क्यों न, मुख्यमंत्री खुद कह रही हैं कि यह बदलाव का नहीं, बदला लेने का चुनाव है. उनके राजनीतिक वारिस अभिषेक बनर्जी गृह मंत्री को धमकी दे रहे हैं कि चार मई को दोपहर बाद तक बंगाल में रूककर दिखाओ तो मानूंगा कि तुम अपने बाप की औलाद हो. लेकिन चारों तरफ सूई टपक सन्नाटा है. बोले कौन? कांग्रेस के मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आतंकवादी बता रहे हैं. वामपंथियों को कभी हिंसा से गुरेज रहा ही नहीं है. बंगाल में चुनावी हिंसा की परिपाटी उन्होंने ही शुरु की थी. उन्होंने सरकार और कैडर का भेद मिटाकर इस समृद्ध राज्य को रसातल में पहुंचाया. ममता उन्हीं की राह पर चल पड़ी हैं.
वामपंथियों ने बाकायदा बौद्धिक जुगाली करते हुए बंगाल को साढ़े तीन दशक तक बर्बाद किया. ममता के तो अभी डेढ़ दशक ही हुए हैं. उनका मुकाबला कर रही भाजपा हिंसक चुनावी खेल में टिक ही नहीं सकती. माहौल चाहे जैसा बन जाय, लेकिन बंगाल का चुनाव परिणाम अंततः गुंडे और बमबाज ही तय करते रहे हैं. जब मुख्यमंत्री केंद्रीय जांच अधिकारियों के हाथ से फाइल और सुबूत छीन लेती हैं और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करा देती हैं, तब भला उनके समर्थकों से सभ्य आचरण की अपेक्षा उनके साथ बेमानी ही होगी.
ममता सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं हैं, साम्राज्ञी हैं. उनके लोकतंत्र का मतलब ठोकतंत्र ही होता है. वह कोई नियम कायदा-कानून नहीं मानती हैं. कानून वही है जो वह कहती-करती हैं. इसलिए सुप्रीम कोर्ट में उनकी ओर से पेश अधिवक्ता ने कह दिया कि यह मामला केंद्र-राज्य विवाद से संबंधित है. इसलिए इसकी सुनवाई अनुच्छेद 131 के तहत होनी चाहिए. ममता के वकील का कहना था कि इडी एक सरकारी महकमा है. वह केंद्र के अधीन है. वह अपने मौलिक अधिकारों का दावा नहीं कर सकता और अनुच्छेद 32 के तहत मुकदमा दाखिल नहीं कर सकता. यदि इस दलील को मान लिया जाता तो केंद्र की कोई भी एजेंसी किसी राज्य के मुख्यमंत्री और वहां के आला अधिकारियों की मर्जी के विरूद्ध कोई जांच ही नहीं कर सकती.
यह भी कि किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को यह अधिकार मिल जाता कि वह न केवल केंद्रीय जांच एजेंसियों को खुद रोक दे और उनके खिलाफ ही मुकदमा दर्ज करा दे. कल्पना कीजिए, यदि ऐसा हो जाय तो देश का क्या होगा? हर चोर-चुहाड़, देश विरोधी, आतंकी और भ्रष्टाचारी किसी मुख्यमंत्री की कुर्सी के नीचे छिप जाता या छिप जाएगा और कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा.
खैर, सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील मानने से इनकार कर दिया और इडी अधिकारियों पर बंगाल सरकार के एफआईआर पर रोक लगाते हुए घटना के दिन के सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने ममता के वकील को जवाब देते हुए यह भी कहा है कि इडी अधिकारी भी भारत के नागरिक हैं. यदि उन्हें डराया-धमकाया जाता है या ड्यूटी से रोका जाता है तो यह उनके मौलिक अधिकारों का हनन है. यदि अराजकता की अनुमति मिल जाये तो कोई भी जांच संभव ही नहीं होगी. इस मामले को केंद्र-राज्य का मामला मानकर खारिज नहीं किया जा सकता है. यह कानून के शासन का प्रश्न है. जब एक मुख्यमंत्री वहां घुस जाय जहां जांच अधिकारी काम कर रहे हों, तो पूरा सिस्टम खतरे में पड़ जाता है.
गौरतलब यह भी है कि आठ जनवरी को आई पैक के कार्यालय में ममता बनर्जी अकेले नहीं गयी थीं. उनके साथ राज्य के डीजीपी राजीव कुमार और कोलकाता के पुलिस कमिश्नर के अतिरिक्त पुलिस बल भी पहुंचा था. यही राजीव कुमार ममता की कृपा से राज्यसभा पहुंच गये हैं. वह जब कोलकाता के कमिश्नर थे और सीबीआई एक घोटाले में उनसे पूछताछ करने पहुंची थी, तब बतौर मुख्यमंत्री ममता खुद गयी थीं और धरने पर बैठ गयी थीं. इस गंठजोड़ को क्या नाम दिया जाय? यह जोड़ क्या घोटाले के गाढ़े रसायन से बना है?
आठ जनवरी को भी इडी कोयला घोटाले की जांच के लिए ही आई पैक दफ्तर पहुंची थी. अभी इसी महीने मालदा में इसीआर (मतदाता शुद्धीकरण) में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर काम कर रहे न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया गया था. कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस परेशान हो गये. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस आधी रात तक जगे रहे. न मुख्य सचिव फोन उठा रहे थे, न डीजीपी. काफी मशक्कत के बाद वे छूटे तो उनकी गाड़ियों पर पथराव कर दिया गया.
देश के कई राज्यों में मतदाता शुद्धीकरण का कार्य हुआ है. आगे भी होगा. लेकिन कहीं से भी किसी अप्रिय घटना की जानकारी नहीं आयी. लेकिन यह ममता का बंगाल है. उन्होंने बड़े जतन से इसे संवारा-सजाया है. उनका अपना सिस्टम है. इसे वही हांकती हैं. सुप्रीम कोर्ट देश की चिंता करे, संविधान की चिंता करे, लेकिन बंगाल में होगा वही जो ममता चाहेंगी. वह शर्म-हया धोकर पी गयी हैं. ममता वह हैं जो कांग्रेस नेता के रुप में जयप्रकाश नारायण की गाड़ी के बोनट पर चढ़ गयी थीं और उन्हें काला झंडा दिखायी थीं. माकपा नेता सोमनाथ चटर्जी को भी बेइज्जत कर दिया था. सपा के एक सांसद की कॉलर लोकसभा में ही पकड़ ली थी.
वह वामपंथी गुंडों से लड़ चुकी हैं. वामपंथी सरकार ने उन्हें पीटकर मरणासन्न कर दिया था. वह वहीं से उठी थीं और वामपंथियों की लंका लगाकर आज उन्हीं की अराजक राह पर चल रही हैं. वह मान रही हैं कि बंगाल एक राज्य नहीं, अपने आप में एक देश है. यहां न संविधान की जरुरत है, न देश के कानून की, यहां उनका अपना कानून है. यह कानून उनके दिमाग और जुबान की उपज है. कहीं पढ़ा था "का नहि अबला करि सकै, का न समुद्र समाए, का न पावक जरि सकै, का नहि कालहि खाय." लेकिन ऐसा लगता है कि ममता ने अति कर दी है और अति का अंत भी अवश्यंभावी है.
फिलहाल बंगाल विधानसभा के लिए पहले चरण की वोटिंग हो गयी है. निर्वाचन आयोग ने ऐसी चाक-चौबंद व्यवस्था की थी कि छिटपुट झड़पों के सिवाय कोई बड़ी हिंसक वारदात नहीं हुई. 92 फीसदी वोट पड़े हैं. यह एक रिकार्ड है. इस बंपर वोटिंग से किसे नफा-नुकसान हुआ है, इसकी जानकारी चार मई को मिलेगी. लेकिन बंगाल में 1972 के बाद से पहली बार लोकतंत्र का महापर्व शांतिपूर्ण संपन्न होने जा रहा है. इसका श्रेय निर्वाचन आयोग को जाता है जिसे पी-पाकर गरियाने में समूचा विपक्ष लगा है. दशकों से बंगाल के माथे पर लगा हिंसक चुनाव का कलंक इस बार मिट गया है. पता नहीं इससे ममता बनर्जी खुश हैं या दुखी, लेकिन टैगोर, बंकिम, सुभाष का यह राज्य राहत की सांस जरूर ले रहा है.
चुनाव में ममता हारें या जीतें, उनके विरूद्ध न्यायालय में जिस तरह मुकदमे चल रहे हैं, वे उनकी परेशानी का सबब बनेंगे. सुप्रीम कोर्ट के रुख से तो ऐसा ही लगता है. ऊंट जब तक पहाड़ के नीचे नहीं आता है, तब तक उसे अपनी ऊंचाई का अहसास नहीं होता है.
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