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योग व ध्यान से पारलौकिक शक्तियों की सिद्धि संभव : प्रो. डीके सिंह

महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, आरोग्यधाम में साप्ताहिक योग शिविर एवं कार्यशाला का तीसरा दिन, वक्ता ने माना कि भारतीय अध्यात्म एक उत्कृष्ट विज्ञान और योग आध्यात्मिक ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहर है
Lagatar, Gorakhpur : दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राणी विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डीके सिंह ने कहा कि पूरा विश्व अब यह स्वीकार कर चुका है कि भारतीय अध्यात्म एक उत्कृष्ट विज्ञान है और योग हमारी आध्यत्मिक ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहर है. योग एवं ध्यान से मनुष्य पारलौकिक शक्तियों की सिद्धि प्राप्त कर सकता है. पूरे ब्रह्मांड में कहीं भी यात्रा कर सकता है. विज्ञान इस प्रक्रिया पर काफी शोध कर रहा है. शुक्रवार को महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, आरोग्यधाम में आयोजित साप्ताहिक योग शिविर एवं कार्यशाला के तीसरे दिन योग, अध्यात्म एवं विज्ञान विषय पर विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए प्रो. सिंह ने कहा कि ज्ञान की दो धाराएं हैं. एक है अध्यात्म तो दूसरा है विज्ञान. ये दोनों धाराएं परस्पर एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं.

आध्यात्मिक क्षेत्र के रहस्य वैज्ञानिक आधार पर उजागर

उन्होंने कहा कि 19वी एवं 20वीं सदी में इस मान्यता को लेकर संशय बना रहता था पर, 21वीं सदी के प्रारंभ में वैज्ञानिकों की जिज्ञासाओं ने तर्कशक्ति आधारित अनुसंधान से धीरे-धीरे बहुत से आध्यात्मिक क्षेत्र के रहस्यों को वैज्ञानिक आधार पर उजागर किया.

विज्ञान का अवलंबन भौतिक शक्ति पर है

प्रो. सिंह ने कहा कि अध्यात्म अंतर्ज्ञान, भाव संवेदना तथा विवेक आधारित है, जबकि विज्ञान का अवलंबन भौतिक शक्ति पर है. विज्ञान मात्र परिकल्पना पर आधारित होकर विकसित नहीं हो सकता. यथार्थ को जानने के लिए उसे प्रयोगात्मक स्तर पर आना पड़ता है. अध्यात्म का प्रयोग क्षेत्र चेतना आधारित अंतरंग है, जबकि विज्ञान का प्रयोग क्षेत्र पदार्थ आधारित बहिरंग. इसे भी पढ़ें : सौर">https://lagatar.in/widespread-disturbance-in-the-construction-of-solar-water-tower-maintenance-done-on-paper-itself/">सौर

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विज्ञान के आदि परंपरा के जनक थे भारतीय ऋषि

प्रो. सिंह ने कहा कि भारतीय ऋषियों ने अपनी खोज भीतर से आरंभ की और अपनी तपस्या, अविचल निष्ठा और आस्था द्वारा रहस्यों को जाना. निश्चित ही ये ऋषि विज्ञान की आदि परंपरा के जनक थे. उन्हीं परंपराओं में आज के वैज्ञानिक जिज्ञासाओं के समाधान में लगे हुए हैं. नासा ने एक पार्टिकल `टेकियान` के बारे में पता लगाया है, जो प्रकाश की तेज गति से चलता है और संभवतः मनोजावा पार्टिकल के समान है.

शरीर, मन व आत्मा का मौलिक संतुलित अवस्था में एक होना ही योग

प्रो. सिंह ने योग की सारगर्भित व्याख्या करते हुए कहा कि योग का अर्थ है जुड़ना, समन्वय, एकात्मकता. यह संस्कृत के `युज्यते इति योग` से आया है. इसका अर्थ है, वह जो जोड़ता है. योग का अर्थ जोड़ना है तो यह सवाल आता है कि किस को जोड़ना है? वास्तव में शरीर, मन व आत्मा का अपनी मौलिक संतुलित अवस्था का एक होना ही योग है. [caption id="attachment_334346" align="alignnone" width="600"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/06/4-16-600x375.jpg"

alt="कार्यशाला" width="600" height="375" /> कार्यशाला[/caption]

परम समाधि की अवस्था

उन्होंने कहा कि जब तक हम योग द्वारा उस परम समाधि की अवस्था को प्राप्त न कर लें, जो सृष्टि की रचना के पहले विद्यमान थी, तब तक इस संसार का कुछ भी हमें संतुष्ट नहीं कर सकता. आत्मा का परमात्मा से एकलय होने की अवस्था ही योग है. प्रो. सिंह ने कहा कि योग के बारे में वेदों में सामान्यतया भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक प्रयासों को समेकित करने की विधि बतलाई गई है. यह विधि विभिन्न मार्गों से परिभाषित है जैसे हठयोग, राजयोग, क्रिया योग आदि. हमें यह स्पष्ट रूप से जानना चाहिए कि जीव के लिए परमात्मा को प्राप्त कराने वाला केवल मनुष्य शरीर ही है. उन्होंने विज्ञान, अध्यात्म एवं योग को लेकर विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का भी सरल शब्दों में समाधान किया. इस अवसर पर महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय के कुलपति मेजर जनरल डॉ. अतुल वाजपेयी, कुलसचिव डॉ. प्रदीप कुमार राव समेत विश्वविद्यालय के शिक्षक एवं विद्यार्थियों की सहभागिता रही. इसके पूर्व व्यावहारिक सत्र में विश्वविद्यालय के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने योग की विभिन्न मुद्राओं का अभ्यास किया. इसे भी पढ़ें : खाने">https://lagatar.in/cooking-oil-became-cheaper-many-companies-including-ruchi-soya-reduced-mrp-by-rs-20/">खाने

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