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503.2 करोड़ मजदूरी भुगतान लंबित, मनरेगा या वीबी ग्राम जी में पिस रहे लाखों श्रमिक

अकुशल श्रमिकों के रोजगार संकट से जुड़े आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि झारखंड में ग्रामीण रोजगार की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है. आंकड़ों बताते हैं कि केंद्र सरकार की नीतियां मजदूर विरोधी हैं.
 
  • राज्य में मनरेगा में पंजीकृत परिवारों की कुल संख्या 75.76 लाख
  • श्रमिकों की कुल संख्या 106 करोड़

Ranchi :  अकुशल श्रमिकों के रोजगार संकट से जुड़े आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि झारखंड में ग्रामीण रोजगार की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है. आंकड़ों बताते हैं कि केंद्र सरकार की नीतियां मजदूर विरोधी हैं. 

 

वित्तीय वर्ष 2025-26 में झारखंड में मनरेगा के अंतर्गत पिछले वर्ष अप्रैल माह में जहां 9.51 लाख मानव दिवस सृजित हुए थे, वहीं इस वर्ष अप्रैल माह के अंत तक केवल 45,638 मानव दिवस ही सृजित हो पाए हैं.

 

पिछले वर्ष की तुलना में इस बार मानव दिवस सृजित में लगभग 4.79 प्रतिशत की गिरावट आई है, जो काफी चिंताजनक है.

 

यह विकट स्थिति उत्पन्न होने का कारण केंद्र सरकार द्वारा शीतकालीन सत्र में मनरेगा के स्थान पर “वीबी ग्राम जी” बिल पास कराना है, जिसकी अब तक गजट अधिसूचना जारी नहीं की गई है.

 

ऐसे में मनरेगा को लेकर राज्य सरकारें असमंजस की स्थिति में हैं और मजदूरों के समक्ष रोजगार का भयंकर संकट खड़ा हो गया है. 

 

इसी बीच, ग्रामीण विकास विभाग द्वारा फरवरी से चलाए जा रहे राज्यव्यापी अभियान “मनरेगा का विश्वास, रोजगार से विकास” पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि इसके बावजूद मजदूरों का भरोसा कम होता दिख रहा है.

 

जानकारी के अनुसार, केंद्र से बजट आवंटन में कमी के कारण 11 जनवरी से झारखंड के मजदूरों का लगभग 503.2 करोड़ रुपये का भुगतान लंबित है. वहीं, 12 मार्च से राज्य के मनरेगा कर्मी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं. 

 

इसके अलावा, मनरेगा के 20 वर्षों के इतिहास में पहली बार मजदूरी बढ़ोतरी से संबंधित कोई अधिसूचना 1 अप्रैल तक जारी नहीं की गई है. वहीं, 17 मार्च को झारखंड विधानसभा ने “वीबी ग्राम जी” के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर केंद्र से स्पष्ट किया कि राज्य में मनरेगा ही लागू रहेगा. 

 

28 मार्च से केंद्र सरकार द्वारा एक नई व्यवस्था के तहत कार्यस्थल पर मोबाइल ऐप के माध्यम से श्रमिकों की उपस्थिति और चेहरे की फोटो अपलोड करना अनिवार्य किए जाने को लेकर भी श्रमिकों में असंतोष देखा जा रहा है. 

 

आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में मनरेगा के तहत 75.76 लाख परिवार पंजीकृत हैं और सक्रिय श्रमिकों की संख्या लगभग 35.95 लाख बताई जाती है. वित्तीय वर्ष 2025-26 में इनमें से 26.06 लाख श्रमिकों ने कार्य किया और कुल 12 करोड़ मानव दिवस सृजित किए गए.

 

केंद्र और राज्य सरकार के बीच जारी राजनीतिक टकराव के बीच झारखंड के श्रमिकों के भविष्य को लेकर गंभीर अनिश्चितता बनी हुई है. स्थिति यह है कि ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से जुड़े विकल्पों और नई व्यवस्था को लेकर अब तक स्पष्ट दिशा तय नहीं हो पाई है. 

 

सूत्रों के अनुसार, इस वर्ष के बजट में प्रस्तावित “वीबी ग्राम जी” योजना के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया है. बताया जा रहा है कि केंद्र सरकार की ओर से गजट अधिसूचना जारी न होने के कारण राज्य को मिलने वाले 40 प्रतिशत फंड के आवंटन की प्रक्रिया भी स्पष्ट नहीं हो पाई है, जिससे पूरी वित्तीय व्यवस्था प्रभावित हो रही है. 

 

इस अनिश्चितता के बीच सुझाव दिया जा रहा है कि झारखंड सरकार को केंद्र की योजनाओं पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं का राज्य रोजगार गारंटी कानून लाने पर विचार करना चाहिए. कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री ने भी इस दिशा में संकेत दिए हैं.

 

नए कानून की धारा 30 और संविधान के अनुच्छेद 41 और संबंधित प्रावधानों के तहत राज्य स्तर पर इस तरह की व्यवस्था संभव बताई जा रही है. कर्नाटक सरकार ने इस दिशा में पहल की है. 

 

हालांकि झारखंड के लिए यह राह आसान नहीं होगी, क्योंकि राज्य पहले से ही बड़े वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है.  मुख्यमंत्री मंईयां योजना के तहत 14,065 करोड़ रुपये से अधिक का व्यय किया जा रहा है, जिससे बजटीय संतुलन और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है. 

 

दूसरी ओर, झारखंड में लगभग 35 लाख श्रमिक परिवारों के रोजगार, आजीविका और ग्रामीण परिसंपत्तियों के सृजन को देखते हुए एक दीर्घकालीन और स्थायी रोडमैप की आवश्यकता महसूस की जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि केवल राजनीतिक इच्छा शक्ति के सहारे ही इस संकट का समाधान संभव हो सकता है.

 

 

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