यह संगोष्ठी नई दिल्ली स्थित भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर), भारतीय वैश्विक परिषद (आईसीडब्ल्यूए) तथा कोलकाता स्थित मौलाना अबुल कलाम आज़ाद एशियाई अध्ययन संस्थान (एमएकेआईएएस) के संयुक्त अनुदान से आयोजित की जा रही है.
देशभर से विभिन्न विषयों के 200 से अधिक विद्वान, शिक्षाविद्, नीति-निर्माता, शोधार्थी और छात्र इस संगोष्ठी में भाग ले रहे हैं. उद्घाटन सत्र की शुरुआत सीयूजे के रजिस्ट्रार के. कोसला राव द्वारा स्वागत भाषण से हुई. इसके पश्चात प्रार्थना एवं दीप प्रज्ज्वलन किया गया. संगोष्ठी के संयोजक एवं शिक्षा विद्यालय के डीन प्रो. तपन कुमार बसन्तीआ ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के आलोक में शिक्षक एवं शिक्षक शिक्षा की पुनर्कल्पना की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपराओं और वैश्विक शैक्षिक विमर्श के समन्वय से ही शिक्षक शिक्षा को सशक्त बनाया जा सकता है.
मुख्य अतिथि प्रो. एससी पांडा (पूर्व प्राचार्य, आरआईई भुवनेश्वर एवं पूर्व परामर्शदाता, एनसीटीई) ने विद्यार्थियों में चिंतनशील क्षमता के विकास पर बल दिया. उन्होंने कहा कि शिक्षक शिक्षा को केवल तकनीकी प्रशिक्षण तक सीमित न रखते हुए मूल्य, नैतिकता और भारतीय बौद्धिक परंपरा से जोड़ा जाना चाहिए.
विशिष्ट अतिथि डॉ. संजीव कुमार (आईसीडब्ल्यूए, नई दिल्ली) ने शिक्षा के वैश्विक आयामों पर चर्चा की, जबकि प्रो. गुरमीत सिंह (पूर्व कुलपति, पॉन्डिचेरी विश्वविद्यालय) ने मातृभाषा में शिक्षा सहित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की प्रमुख विशेषताओं पर अपने विचार रखे.
अध्यक्षीय संबोधन में सीयूजे के कार्यवाहक कुलपति प्रो. आरके डे ने कहा कि शिक्षक किसी भी शैक्षिक सुधार की रीढ़ होते हैं और नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए निरंतर संवाद और अनुसंधान आवश्यक है.कार्यक्रम का समापन डॉ. शशि सिंह द्वारा धन्यवाद ज्ञापन एवं राष्ट्रगान के साथ हुआ. संगोष्ठी का दूसरा दिन 22 जनवरी को शोध पत्र प्रस्तुतिकरण और विषयगत विमर्शों के साथ जारी रहेगा.



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