Hazaribagh News: हजारीबाग के केरेडारी प्रखंड स्थित पगार बिरहोर टोला में आठ लोगों की मौत के मामले में जिला प्रशासन की संयुक्त जांच रिपोर्ट पर सवाल उठाए गए हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) में दाखिल शिकायत में सामाजिक कार्यकर्ता मंटू सोनू ने मौत, बीमारी और खनन गतिविधियों के बीच संबंध की स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच की मांग की है. शिकायत में हजारीबाग उपायुक्त समेत संबंधित विभागों की भूमिका और अब तक की जांच प्रक्रिया की भी समीक्षा की मांग की गई है.
शिकायत के मुताबिक, चट्टी बरियातू क्षेत्र में भारी खनन 25 अप्रैल 2022 से शुरू हुआ. बिरहोर बस्ती खनन क्षेत्र से करीब 50 मीटर की दूरी पर है. ब्लास्टिंग के बाद धूल उड़ने की शिकायत भी सामने आई है. प्रशासनिक रिपोर्ट में भी खनन क्षेत्र की बस्ती से नजदीकी और धूल की समस्या का उल्लेख होने का दावा किया गया है.
स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्ट में आंखों के संक्रमण, श्वास नली से जुड़ी बीमारी, त्वचा रोग, गंभीर एनीमिया और कुपोषण का उल्लेख है. लेकिन शिकायतकर्ता का सवाल है कि खनन से निकलने वाले धूल-कणों का इन बीमारियों और मौतों पर कितना प्रभाव पड़ा, इसका वैज्ञानिक अध्ययन क्यों नहीं कराया गया. खनन शुरू होने से पहले और बाद के स्वास्थ्य आंकड़ों की तुलना नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाया गया है.
शिकायत में आठ मौतों का उल्लेख है. इनमें बिरराज बिरहोर, किरण कुमारी, आकेश बिरहोर, दुर्गा बिरहोर, गीता देवी, ननकी देवी, रूपा कुमारी और करीब दो माह के नवजात की मौत शामिल है. इन मामलों में पोस्टमार्टम नहीं होने को भी जांच का महत्वपूर्ण सवाल बताया गया है. शिकायतकर्ता ने मौत के वास्तविक कारणों की स्वतंत्र चिकित्सकीय और मेडिको-लीगल समीक्षा की मांग की है.
जांच में स्वतंत्र विशेषज्ञों की भूमिका पर भी सवाल है. शिकायत में पूछा गया है कि झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण विशेषज्ञ, महामारी विशेषज्ञ और फॉरेंसिक विशेषज्ञों से स्वतंत्र सत्यापन क्यों नहीं कराया गया. केवल प्रशासनिक रिपोर्ट के आधार पर मामले को अंतिम रूप नहीं देने की मांग की गई है.
सबसे गंभीर सवाल जिला स्तरीय समिति की कथित अनुशंसा को लेकर है. शिकायत के अनुसार, समिति ने कहा था कि बिरहोर समुदाय का सुरक्षित और उपयुक्त पुनर्वास सुनिश्चित होने तक क्षेत्र में खनन करना उचित नहीं है. इसके बावजूद खनन जारी रहने पर सवाल उठाया गया है.
शिकायतकर्ता ने पूछा है कि यदि पुनर्वास को खनन से पहले जरूरी माना गया था, तो इस अनुशंसा पर अमल क्यों नहीं हुआ.
शिकायत में यह भी कहा गया है कि केवल वैकल्पिक मकान बना देना पुनर्वास की पूर्ण प्रक्रिया नहीं है. बिरहोर समुदाय की आजीविका जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है. इसलिए पुनर्वास में आवास के साथ रोजगार, आजीविका, सामाजिक जीवन, संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच को भी शामिल किया जाना चाहिए.
NHRC से आठों मौतों की स्वतंत्र फॉरेंसिक समीक्षा, विशेषज्ञों की बहु-विषयक समिति बनाने, PM10 और PM2.5 की स्वतंत्र जांच कराने तथा ब्लास्टिंग और कंपन के प्रभाव का तकनीकी आकलन कराने की मांग की गई है. शिकायतकर्ता ने स्वतंत्र जांच और सुरक्षित पुनर्वास पूरा होने तक बस्ती के आसपास खनन व ब्लास्टिंग गतिविधियों को सीमित करने पर विचार करने की मांग भी की है.
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