- भारत की चुप्पी किसी भी तरह से मोरल सरेंडर (नैतिक आत्म समर्पण) नहीं है.
- आज के Multipolar World में भारत मल्टी-अलाइनमेंट की नीति पर चल रहा है.
- विदेश नीति नैतिक भाषणबाजी का मंच नहीं है.
- शशि थरूर ने आलोचकों से कहा कि भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र बेहद अहम है.
New Delhi : अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर हमला किये जाने को लेकर भारत की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए अधिकतर विपक्षी दल मोदी सरकार पर लगातार हमलावर हैं. खास कर सोनिया गांधी ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की एयर स्ट्राइक में मारे जाने की निंदा न करने पर सरकार पर खूब बरसी थीं. लेकिन कांग्रेस के सीनियर लीडर और तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद शशि थरूर के सुर कांग्रेस (सोनिया गांधी) से अलग हैं.
थरूर के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी जंग पर भारत की चुप्पी किसी भी तरह से मोरल सरेंडर (नैतिक आत्म समर्पण) नहीं है. शशि थरूर ने भारत की चुप्पी को सोची-समझी और जिम्मेदार कूटनीति करार दिया है. शशि थरूर ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने लेख में कहा है कि भारत का यह रुख भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय व्यावहारिक कूटनीतिक संतुलन को दर्शाने वाला है.
हालांकि थरूर ने माना है कि अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर किया गया सैन्य हमलाअंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं है. हमला संप्रभुता, आक्रामकता-विरोध और शांतिपूर्ण समाधान जैसे उन सिद्धांतों के खिलाफ है, जिनका भारत ऐतिहासिक रूप से समर्थन करता रहा है. इसके बावजूद शशि थरूर ने मोदी सरकार की आलोचना करने से इनकार किया है. उनके अनुसार हर स्थिति में सार्वजनिक निंदा एकमात्र विकल्प नहीं हो सकती.
अहम बात यह है कि इंडियन एक्सप्रेस में ही कुछ दिन पूर्व सोनिया गांधी ने लेख लिखकर अयातुल्ला अली खामेनेई और ईरान की संप्रभुता पर आक्रमण की स्ष्ट निंदा न करने के लिए भारत सरकार कड़ी आलोचना की थी. शशि थरूर ने अपने लेख में कहा है कि भारत की विदेश नीति हमेशा सिद्धांत और व्यवहारिकता के बीच संतुलन पर आधारित रही है. आज के Multipolar World में भारत मल्टी-अलाइनमेंट की नीति पर चल रहा है.
भारत का रुख अलग-अलग शक्तियों के साथ संबंध बनाये रखते हुए अपने हितों को प्राथमिकता देना है. शशि थरूर ने भारत सरकार की नीति की आलोचना करने वालों पर निशाना साधते हुए कहा कि वे यह भूल जाते हैं कि भारत ने अतीत में भी कई बार राष्ट्रीय हितों के चलते चुप्पी साधी है. याद दिलाया कि 1956 में हंगरी में, 1968 में चेकोस्लोवाकिया में और 1979 में अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के दौरान भी भारत ने खुलकर विरोध नहीं किया था.
शशि थरूर ने आलोचकों से कहा कि भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र बेहद अहम है. कहा कि यहां से हर साल लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार होता है. देश की ऊर्जा जरूरतें काफी हद तक खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर हैं 90 लाख से अधिक भारतीय वहां काम करते हैं. शशि थरूर ने लिखा कि इस समय किसी एक पक्ष के खिलाफ कड़ा सार्वजनिक रुख अख्तियार करना इन संबंधों को प्रभावित कर सकता है.
थरूर ने अमेरिका के साथ भारत के रणनीतिक रिश्तों का भी जिक्र करते हुए कहा कि मौजूदा अमेरिकी नेतृत्व (ट्रंप) अक्सर अपने हितों के खिलाफ जाने वालों पर सख्त रुख अपनाते हैं. ऐसे में भारत के लिए अमेरिका के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना जरूरी है. उन्होंने स्पष्ट कहा कि विदेश नीति नैतिक भाषणबाजी का मंच नहीं है. विदेश नीति में सिद्धांत और शक्ति के बीच संतुलन साधना पड़ता है. अकारण किसी बड़ी शक्ति की खुलकर आलोचना करना व्यावहारिक नहीं है.
शशि थरूर ने कहा कि भारत की चुप्पी का मतलब यह नहीं समझा जाना चाहिए है कि वह युद्ध का समर्थन करता है. इसे रणनीतिक विकल्प करार देते हुए कहा कि यह देश को अपने हितों की रक्षा करते हुए कूटनीतिक संवाद के रास्ते खुले रखने में मदद करता है.
कहा कि चुप्पी भी एक रणनीति हो सकती है, जो अनावश्यक टकराव से बचाते हुए शांति की दिशा में काम करने का अवसर देती है. श्री थरूर ने आलोचकों को सलाह देते हुए कहा कि वे नैतिक आदर्शवाद और वास्तविक कूटनीतिक जरूरतों के बीच फर्क समझें.
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