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धार्मिक संस्था या गुरु का अनुयायी होना तलाक का आधार नहीं : झारखंड हाईकोर्ट

  • पति की तलाक अपील खारिज

Ranchi :  झारखंड हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के तलाक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि किसी धार्मिक संस्था, गुरु या सत्संग का अनुयायी होना तलाक का आधार नहीं हो सकता, जब तक यह साबित न हो कि इससे वैवाहिक जीवन पर गंभीर और प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है.

 

कोर्ट ने पति द्वारा लगाए गए मानसिक क्रूरता के आरोपों को प्रमाणित न मानते हुए उसकी तलाक की अपील खारिज कर दी. हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया. 

 

यह मामला राकेश कुमार सिंह (बदला हुआ नाम) बनाम सरीता देवी (बदला हुआ नाम) से संबंधित है, जिसमें पति ने फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की थी. 

 

पति ने पत्नी पर लगाए कई आरोप

पति का आरोप था कि शादी के बाद पत्नी ने केवल दो दिन ससुराल में रहकर वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं होने दिए. पति का कहना था कि पत्नी ने दावा किया कि वह देवघर के सत्संग संगठन की अनुयायी है और विवाह संबंध स्थापित करने के लिए उसे वहां से अनुमति लेनी होगी. 

 

पति ने यह भी आरोप लगाया कि शादी के तुरंत बाद पत्नी ने मायके में रहना शुरू कर दिया. उसने उस पर सत्संग में दीक्षा लेने का भी दबाव बनाया. आरोप लगाया कि पत्नी ने माता-पिता से अलग रहने की मांग की और वैवाहिक दायित्वों का पालन नहीं किया. 

 

पत्नी ने आरोपों को झूठा बताया

वहीं पत्नी ने पति द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को  झूठा बताया. उसने कहा कि विवाह के शुरुआती दिनों में संबंध स्थापित हुए थे. वह किसी सत्संग की अनुयायी नहीं है. वह हमेशा पति के साथ रहने को तैयार रही. पति और उसके परिवार ने ही उसे वापस आने नहीं दिया.  

 

कोर्ट ने कहा-पति द्वारा लगाए गए आरोप प्रमाणित नहीं हो सके

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पति द्वारा लगाए गए मानसिक क्रूरता के आरोप प्रमाणित नहीं हो सके. कोर्ट ने यह भी माना कि पत्नी ने वैवाहिक जीवन बचाने का प्रयास किया था, लेकिन पति पक्ष ने उसे साथ रखने से इनकार किया.

 

ऐसे में तलाक का कोई वैध आधार नहीं बनता. इसके बाद कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखते हुए पति की तलाक याचिका को खारिज कर दिया. 

 

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