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Bengal Election Opinion : ममता बनर्जी ने जो बोया वो काटा

मो जाहिद

भाजपा ने जैसे औरों को निगला, ममता को भी निगल लिया. नवीन पटनायक हों या नीतीश कुमार. एकनाथ शिन्दे हों या हिमंत बिस्व सरमा. दूसरे विरोधियों को निपटाने (या साथ लेने) के लिए भ्रष्टाचार के मामले (और आरोप) काम आए. केजरीवाल आरोप से ही निपटा दिए गए (आप नहीं मानना चाहें तो मत मानिए) और ममता को सत्ता की ताकत से निपटाया गया. इनके बीच में कई और नाम हैं. लेकिन खास ममता बनर्जी ही हैं जो नीतीश की ही तरह भाजपा (और कांग्रेस से भी) दोस्ती और विरोध के दम पर सत्ता में बने रहे. स्वार्थी और दलबदलू राजनीतिज्ञों (और तमाम दूसरों)  की सहायता से मोदी जी सत्ता से चिपके हुए हैं.   

 

ममता बनर्जी ने करीब 29 साल पहले 1997 में कांग्रेस तोड़ कर मुकुल रॉय के साथ मिल कर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बनाई तो उन्होंने CPM , CPI और कांग्रेस को खत्म करने के लिए भाजपा की पश्चिम बंगाल में इंट्री कराई. मुकुल रॉय बाद में भारतीय जनता पार्टी में चले गए. 1999 में ममता बनर्जी भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार में शामिल हो गईं और रेल मंत्री बन गईं.

 

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2001 की शुरुआत में जब आपरेशन वेस्ट एंड के जरिए रक्षा सौदों में रिश्वतखोरी का बड़ा मामला उजागर हुआ तो ममता बनर्जी एनडीए की सरकार से अलग हो गईं.

 

अगस्त 2001 में बीबीसी के एक इंटरव्यू में जब ममता बनर्जी से पूछा गया कि क्या उन की पार्टी के एनडीए में लौटने की कोई संभावना है तो उन्होंने जवाब दिया हां, टीएमसी के घोषणापत्र के मुताबिक भाजपा हमारी ‘स्वाभाविक सहयोगी’ है. 

 

2003 में ममता बनर्जी फिर एनडीए की सरकार में शामिल हो गई, मगर कई महीने बिना विभाग की मंत्री रहीं. 2003 में ममता बनर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य के तत्कालीन संपादक तरुण विजय की कम्युनिस्ट आतंकवाद पर लिखी गई पुस्तक के विमोचन समारोह में शिरकत की. तरुण विजय ने ‘बंगाल की दुर्गा’ कह कर उन का स्वागत किया.

 

भाजपा के राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज ने सदन में बोलते हुए ममता बनर्जी के लिए कहा कि ‘हमारी प्यारी ममता दी साक्षात दुर्गा हैं.’ पुंज का अभी पंद्रह दिन पहले निधन हुआ है. आरएसएस ने भी ममता बनर्जी को ‘बंगाल की दुर्गा’ बताया और वामपंथियों के खिलाफ उन की लड़ाई के पक्ष में ‘ठोस समर्थन’ जताया.

 

ममता बनर्जी ने अपने एक भाषण में आरएसएस के मोहन भागवत, शेषाद्रि चारी और मदन दास देवी का जिक्र करते हुए कहा कि ‘मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बहुत ज़्यादा नेताओं को तो नहीं जानती हूं, मगर उनमें से कुछ से व्यक्तिगत तौर पर मिली हूं. आप लोग सच्चे देशभक्त हैं. मुझे मालूम है कि आप अपने देश से सच्चा प्यार करते हैं.’

 

2012 में आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य ने ममता बनर्जी की सादगीपूर्ण जीवनशैली की तारीफ करते हुए लेख लिखा. कहा कि ‘ममता उन बिरले राजनीतिज्ञों में हैं, जिन्होंने राजनीति का इस्तेमाल पैसा कमाने के लिए नहीं किया. काश कि देश को ऐसे ज्यादा से ज्यादा राजनीतिज्ञ मिलें.’

 

2019 में ममता बनर्जी ने एनआरसी और सीएए के खिलाफ बहुत से आंदोलन किए. मगर जब सीएए पर संसद में मतदान हुआ तो टीएमसी के आठ सांसद रहस्यमयी तरीके से गैरहाजिर रहे और इस वजह से विधेयक पारित हो गया. ममता बनर्जी ने इन सांसदों को माफी बख्श दी. उन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की.

 

27 जनवरी 2020 को जब भाजपा सरकार के तत्कालीन वित राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने अपने भाषण में ‘गोली मारो ... को’ के नारे लगवाए तो टीएमसी के नेता शेख आलम ने सीएए का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों पर मुर्शिदाबाद में गोलियां चला दीं.

 

2017 में भाजपा में चले गए मुकुल रॉय 2021 के विधानसभा चुनावों के पहले टीएमसी में वापस आ गए और ममता रॉय ने उन्हें खुशी-खुशी शामिल कर लिया. चुनावों के दौरान मुकुल ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि बीजेपी इज इक्वल टु टीएमसी.

 

जुलाई 2022 में ममता बनर्जी ने उपराष्ट्रपति के चुनाव में विपक्ष की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा का साथ देने से इनकार कर दिया. बाद में ममता बनर्जी के सांसदों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. एब्सटेन किया. जगदीप धनखड़ जीत गए. ममता बनर्जी ने उन धनखड़ की मदद की, जिन्होंने बंगाल का राज्यपाल रहते हुए उन का जीना हराम कर रखा था.

 

अभी सितंबर 2022 में ममता बनर्जी ने आरएसएस की दिल खोल कर प्रशंसा की. कहा कि संघ में बहुत से बड़े अच्छे लोग हैं. संघ अच्छा संगठन है.

 

2024 के पहले नितीश कुमार द्वारा बनाए INDIA गठबंधन में संयोजक के पद पर नितिश कुमार को नियुक्त करने का ममता बनर्जी ने तीखा विरोध किया, नितीश कुमार खिन्न होकर भाजपा के साथ हो गये.

 

2024 के लोकसभा चुनावों में ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने से इंकार करके अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया. 2024 लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी फिर चुनाव जीत गए.

 

और इस तरह BJD, BSP, SS, JDU, TRS, YSR, PDP, LJP, AAP के बाद TMC को वही अजगर खा गया. ममता बनर्जी जो बोईं वहीं काट रहीं हैं, इंडिया गठबंधन तोड़ कर उन्होंने जो बोया वही काट रहीं हैं. अब उनकी पार्टी के सांसदों का राघव चड्ढा होना तय है. सबकी बुनियाद एक ही है, सत्ता के लिए कुछ भी करेगा. 

डिस्क्लेमरः यह लेखक के निजी विचार हैं और यह टिप्पणी उनके सोशल मीडिया वॉल से लिया गया है. 

 

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